भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर अपना पहला विस्तृत पूर्वानुमान जारी किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, जून से सितंबर के बीच होने वाली मौसमी वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना जताई गई है। यह अनुमान देश के कृषि क्षेत्र, जल संसाधनों और समग्र अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मानसून भारत की जीवनरेखा है, और इसकी स्थिति सीधे तौर पर करोड़ों किसानों की आजीविका को प्रभावित करती है। ऐसे में यह पूर्वानुमान चिंता बढ़ाने वाला है, खासकर उन क्षेत्रों के लिए जहां खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर करती है।
मौसम विभाग के अनुसार, इस वर्ष देश में कुल मानसूनी वर्षा दीर्घावधि औसत (LPA) का लगभग 92 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसमें ±5 प्रतिशत की मॉडल त्रुटि भी शामिल है, जिसका मतलब है कि वास्तविक वर्षा 87 से 97 प्रतिशत के बीच रह सकती है। 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर भारत का औसत मानसूनी वर्षा स्तर 87 सेंटीमीटर माना जाता है। वैज्ञानिक मानकों के अनुसार, 90 से 95 प्रतिशत के बीच की वर्षा को “सामान्य से कम” श्रेणी में रखा जाता है। इस दृष्टिकोण से देखें तो 2026 का मानसून इस श्रेणी में आने की पूरी संभावना रखता है।
इस वर्ष मानसून के कमजोर रहने की सबसे बड़ी वजह ‘अल नीनो’ मानी जा रही है, जो एक महत्वपूर्ण जलवायु घटना है। अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्र सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण उत्पन्न होता है और इसका प्रभाव वैश्विक मौसम पैटर्न पर पड़ता है। भारत में यह स्थिति अक्सर मानसून को कमजोर करती है। वर्तमान में भूमध्य प्रशांत क्षेत्र में ला नीना की स्थिति समाप्त हो रही है और ENSO तटस्थ अवस्था की ओर बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मानसून के दौरान अल नीनो विकसित हो सकता है, जिससे वर्षा पर नकारात्मक असर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
क्षेत्रवार विश्लेषण के अनुसार, दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों को छोड़कर देश के अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका है। उत्तर भारत और मध्य भारत के कई कृषि प्रधान राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान—में इसका प्रभाव अधिक देखने को मिल सकता है। वहीं, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पूर्वोत्तर राज्यों, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बेहतर वर्षा हो सकती है। यह क्षेत्रीय असमानता किसानों के लिए अलग-अलग रणनीतियों की आवश्यकता को दर्शाती है।
कमजोर मानसून का सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ सकता है, क्योंकि इनकी बुवाई और विकास काफी हद तक वर्षा पर निर्भर करते हैं। धान, मक्का, सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलें पर्याप्त पानी की मांग करती हैं, और कम बारिश की स्थिति में इनकी पैदावार घट सकती है। इसके अलावा, देर से बारिश आने या बीच-बीच में सूखा पड़ने जैसी परिस्थितियां फसल चक्र को भी प्रभावित कर सकती हैं। इससे न केवल किसानों की आय प्रभावित होगी, बल्कि खाद्यान्न उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
मानसून कमजोर रहने का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जल संसाधनों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। जलाशयों में पानी का स्तर कम रह सकता है, जिससे सिंचाई परियोजनाओं पर दबाव बढ़ेगा। भूजल स्तर में गिरावट आने की संभावना भी बढ़ जाती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पहले से ही जल संकट है। इससे पेयजल आपूर्ति और औद्योगिक उपयोग पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए जल प्रबंधन की प्रभावी रणनीति अपनाना इस समय बेहद जरूरी हो जाता है।
मौसम विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह केवल पहला पूर्वानुमान है और इसमें समय के साथ बदलाव संभव है। अगला अपडेट मई के अंत में जारी किया जाएगा, जिसमें और अधिक सटीक जानकारी मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा, मानसून सीजन के दौरान जून, जुलाई और अगस्त के अंत में भी नियमित अपडेट दिए जाएंगे। ये अपडेट किसानों, नीति निर्माताओं और आम जनता को समय रहते निर्णय लेने में मदद करेंगे। इसलिए इन पूर्वानुमानों पर लगातार नजर बनाए रखना आवश्यक है।
कृषि विशेषज्ञों का सुझाव है कि किसानों को इस बार सावधानीपूर्वक योजना बनानी चाहिए। कम पानी वाली फसलों का चयन करना, जैसे बाजरा, दालें और तिलहन, एक अच्छा विकल्प हो सकता है। साथ ही ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को अपनाना पानी की बचत में मदद करेगा। वर्षा जल संचयन और खेत तालाब जैसी तकनीकों का उपयोग भी लाभदायक हो सकता है। इसके अलावा, किसानों को जिला स्तर पर जारी मौसम पूर्वानुमानों पर ध्यान देना चाहिए ताकि वे समय रहते बुवाई, सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों से जुड़े निर्णय ले सकें। सही रणनीति अपनाकर संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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