जनवरी 2026 के खुदरा बिक्री आँकड़े भारतीय ट्रैक्टर उद्योग में तेज़ बदलाव और कड़ी प्रतिस्पर्धा की कहानी बयां करते हैं। इस वर्ष जनवरी में कुल 1,13,210 ट्रैक्टरों की बिक्री दर्ज की गई, जबकि जनवरी 2025 में यह संख्या 92,337 यूनिट्स थी। यानी साल-दर-साल (YoY) आधार पर ट्रैक्टर बाजार में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। यह बढ़ोतरी न केवल कृषि गतिविधियों में तेजी का संकेत देती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बढ़ते निवेश और किसानों के भरोसे को भी दर्शाती है।
हालांकि, कुल बाजार बढ़ा है, लेकिन सभी कंपनियों के लिए तस्वीर एक जैसी नहीं रही। कुछ ब्रांड्स ने अपनी बाजार हिस्सेदारी मजबूत की है, तो कुछ दिग्गज कंपनियों को गिरावट का सामना करना पड़ा है।
महिंद्रा एंड महिंद्रा एक बार फिर ट्रैक्टर बाजार में नंबर एक स्थान पर बनी हुई है। जनवरी 2026 में कंपनी ने 25,995 यूनिट्स की खुदरा बिक्री की, जो जनवरी 2025 के 22,072 यूनिट्स से कहीं अधिक है। इसके बावजूद, महिंद्रा की बाजार हिस्सेदारी 23.90% से घटकर 22.96% रह गई। यह संकेत देता है, कि भले ही महिंद्रा की बिक्री बढ़ी हो, लेकिन अन्य प्रतिस्पर्धी ब्रांड्स की गति इससे भी तेज रही। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और नए उत्पाद विकल्पों ने महिंद्रा की पकड़ को थोड़ा ढीला किया है, हालांकि कंपनी अब भी स्पष्ट रूप से बाजार की अगुवा बनी हुई है।
स्वराज ट्रैक्टर्स ने जनवरी 2026 में शानदार प्रदर्शन किया है। कंपनी ने 21,911 ट्रैक्टर बेचकर अपनी बाजार हिस्सेदारी 18.78% से बढ़ाकर 19.35% कर ली। यह बढ़त दर्शाती है कि स्वराज किसानों के बीच भरोसेमंद ब्रांड बना हुआ है। ग्रामीण इलाकों में स्वराज की मजबूत डीलरशिप, टिकाऊ मशीनें और सरल तकनीक इसकी लोकप्रियता के प्रमुख कारण माने जा सकते हैं। खासकर मध्यम हॉर्सपावर सेगमेंट में स्वराज की पकड़ लगातार मजबूत होती जा रही है।
तीसरे स्थान पर रही सोनालिका ने जनवरी 2026 में 15,376 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की। बाजार हिस्सेदारी 13.32% से बढ़कर 13.58% हो गई, जो कंपनी के निरंतर विस्तार को दर्शाती है। वहीं मैसी फर्ग्यूसन ने 13,460 ट्रैक्टर बेचकर अपनी हिस्सेदारी 11.74% से बढ़ाकर 11.89% कर ली। दोनों ही ब्रांड्स ने यह साबित किया है कि लगातार गुणवत्ता और किसानों की जरूरतों के अनुसार उत्पाद देने से बाजार में स्थिरता बनी रहती है।
जनवरी 2026 के आंकड़ों में एस्कॉर्ट्स सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन करने वाली कंपनियों में शामिल रही। कंपनी ने 12,311 यूनिट्स की बिक्री की, जो पिछले वर्ष के 9,136 यूनिट्स से काफी अधिक है। इसके साथ ही बाजार हिस्सेदारी 9.89% से बढ़कर 10.87% हो गई।
यह लगभग 1 प्रतिशत की YoY हिस्सेदारी बढ़त दर्शाती है, जो किसी भी बड़े ब्रांड के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। एस्कॉर्ट्स की यह सफलता नए मॉडल्स, बेहतर फाइनेंस स्कीम्स और मजबूत आफ्टर-सेल्स नेटवर्क का परिणाम मानी जा सकती है।
जॉन डियर ने जनवरी 2026 में 7,895 ट्रैक्टर बेचे, जो जनवरी 2025 के 6,488 यूनिट्स से अधिक है। इसके बावजूद, कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 7.03% से घटकर 6.97% रह गई। यह गिरावट बताती है कि जॉन डियर की बिक्री भले ही बढ़ी हो, लेकिन बाजार की कुल वृद्धि दर इससे ज्यादा तेज रही। प्रीमियम सेगमेंट पर अधिक फोकस और सीमित ग्रामीण पहुंच इसका एक कारण हो सकता है।
आयशर (Eicher) के लिए जनवरी 2026 बेहद सकारात्मक रहा। कंपनी ने 7,814 यूनिट्स की बिक्री के साथ अपनी बाजार हिस्सेदारी 6.45% से बढ़ाकर 6.90% कर ली। यह दर्शाता है कि आयशर धीरे-धीरे अपने पैर मजबूत कर रहा है।
वहीं न्यू हॉलैंड (New Holland) ने 5,336 ट्रैक्टर बेचकर अपनी हिस्सेदारी 4.30% से बढ़ाकर 4.71% कर ली। दोनों ब्रांड्स ने यह साबित किया है कि निरंतर सुधार और क्षेत्रीय रणनीति से बाजार में जगह बनाई जा सकती है।
जनवरी 2026 का सबसे बड़ा सरप्राइज ट्रैकस्टार रहा। कंपनी ने 697 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की, जो जनवरी 2025 के 397 यूनिट्स की तुलना में 75.57% की जबरदस्त वृद्धि है।
हालांकि, कुल बाजार हिस्सेदारी अभी सिर्फ 0.62% है, लेकिन इतनी तेज़ ग्रोथ यह साफ संकेत देती है कि छोटे और किफायती ट्रैक्टर सेगमेंट में ट्रैकस्टार तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। सीमांत और छोटे किसानों के लिए यह ब्रांड एक मजबूत विकल्प बनता जा रहा है।
कुबोटा के लिए यह महीना निराशाजनक रहा। बिक्री 1,628 यूनिट्स से गिरकर 184 यूनिट्स पर आ गई, और बाजार हिस्सेदारी में 1.60% की भारी गिरावट दर्ज की गई। वहीं कैप्टन, प्रीत और एसीई जैसे ब्रांड्स को भी हल्की गिरावट का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर एसडीएफ ने भले ही कम संख्या में बिक्री की हो, लेकिन हिस्सेदारी में सकारात्मक बढ़त दर्ज की है।
जनवरी 2026 के ट्रैक्टर बिक्री आंकड़े यह साफ दिखाते हैं कि भारतीय ट्रैक्टर बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही तीव्र हो चुकी है। जहां बड़े ब्रांड्स को अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए नई रणनीतियों की जरूरत है, वहीं छोटे और उभरते ब्रांड्स नए अवसरों का लाभ उठाते नजर आ रहे हैं।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन-सी कंपनियां इस रफ्तार को बनाए रख पाती हैं और कौन बाजार की इस दौड़ में पीछे छूट जाती हैं।
भारत और अमेरिका के बीच होने वाली व्यापारिक डील (Trade Deal) का सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ना तय है। खासकर मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों पर, क्योंकि अमेरिका इन दोनों फसलों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। भारत में भी मक्का और सोयाबीन लाखों किसानों की आय का मुख्य स्रोत हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है, कि भारत-अमेरिका डील से भारतीय मक्का और सोयाबीन किसानों को फायदा होगा या नुकसान।
भारत और अमेरिका की कृषि संरचना में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। अमेरिका आधुनिक तकनीक, बड़े आकार के फार्म, उन्नत बीज, मशीनरी और मजबूत सरकारी सब्सिडी व बीमा व्यवस्था के कारण मक्का और सोयाबीन का कम लागत में बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है और इनका निर्यात भी करता है। इसके विपरीत भारत में मक्का और सोयाबीन मुख्यतः छोटे और मध्यम किसान उगाते हैं, जहां खेती मानसून पर निर्भर रहती है, तकनीक और संसाधन सीमित होते हैं तथा किसान काफी हद तक MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर निर्भर रहते हैं। इसी कारण भारत में उत्पादन लागत अधिक और पैदावार अपेक्षाकृत कम रहती है।
यदि भारत–अमेरिका डील के तहत सस्ते अमेरिकी मक्का का आयात बढ़ता है, तो इसका सीधा असर भारतीय मक्का किसानों पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी मक्का सस्ता होने के कारण घरेलू मंडियों में कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे MSP से नीचे बिक्री का खतरा बढ़ेगा और छोटे किसानों की आय पर दबाव पड़ेगा। हालांकि, दूसरी ओर पशु आहार और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को सस्ता कच्चा माल मिलने से कुछ हद तक लाभ हो सकता है।
अगर डील के अंतर्गत भारत को विशेष शर्तों पर मक्का निर्यात का अवसर मिलता है, तो यह किसानों के लिए सकारात्मक हो सकता है। लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करना, बेहतर भंडारण व्यवस्था और मजबूत लॉजिस्टिक्स जरूरी होंगे। फिलहाल इन क्षेत्रों में भारत अमेरिका की तुलना में कमजोर है, जो एक बड़ी चुनौती है।
सस्ते आयात से स्टार्च, एथेनॉल और पोल्ट्री फीड जैसे मक्का आधारित उद्योगों को लाभ हो सकता है। लेकिन किसानों को इसका वास्तविक फायदा तभी मिलेगा जब सरकार MSP और सरकारी खरीद व्यवस्था को मजबूत करे और किसानों को इन उद्योगों की मूल्य श्रृंखला से जोड़े।
सोयाबीन के मामले में यह डील भारतीय किसानों के लिए और भी संवेदनशील साबित हो सकती है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक और निर्यातक है। यदि आयात शुल्क कम किया गया, तो घरेलू बाजार में सोयाबीन की कीमतों पर दबाव पड़ेगा, जिससे MSP पर सरकारी खरीद का दबाव बढ़ेगा और मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व राजस्थान जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों के किसानों पर सीधा असर पड़ेगा।
भारत पहले से ही खाद्य तेलों के आयात पर काफी निर्भर है। सस्ते अमेरिकी सोयाबीन या सोया तेल के आयात से उपभोक्ताओं को तो राहत मिल सकती है, लेकिन घरेलू सोयाबीन किसानों को नुकसान होगा और तेल मिलों की आयात निर्भरता और बढ़ जाएगी।
सोयाबीन से बनने वाला सोया मील पशु आहार का एक महत्वपूर्ण घटक है। यदि कच्चा माल सस्ता होता है तो उद्योग को फायदा होगा, लेकिन किसानों को इसका लाभ तभी मिलेगा जब उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त हो।
जोखिमों के बावजूद, भारत–अमेरिका सहयोग से किसानों को कुछ फायदे भी मिल सकते हैं। बेहतर बीज, नई तकनीक और आधुनिक खेती पद्धतियां भारत में आ सकती हैं। फूड प्रोसेसिंग, एथेनॉल और पशु आहार उद्योग में निवेश बढ़ने से लंबे समय में उत्पादकता बढ़ने की संभावना है, बशर्ते सरकार प्रशिक्षण और सब्सिडी के जरिए किसानों को तैयार करे।
किसानों की प्रमुख चिंताओं में MSP की कानूनी गारंटी का अभाव, आयात बढ़ने से बाजार कीमतों में अस्थिरता, छोटे किसानों की कम प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और भंडारण व मार्केटिंग की कमजोर व्यवस्था शामिल हैं।
यदि भारत–अमेरिका डील होती है, तो सरकार की भूमिका निर्णायक होगी। सरकार को MSP पर प्रभावी खरीद सुनिश्चित करनी होगी, आयात पर संतुलित नीति अपनानी होगी, किसानों को तकनीक, बेहतर बीज और सिंचाई सहायता देनी होगी तथा मक्का और सोयाबीन आधारित उद्योगों से किसानों को सीधे जोड़ना होगा, ताकि इस डील का लाभ केवल उद्योगों तक सीमित न रहकर किसानों तक भी पहुंचे।
भारत-अमेरिका डील का मक्का और सोयाबीन किसानों पर मिला-जुला प्रभाव पड़ेगा। जहां एक ओर सस्ता आयात किसानों के लिए खतरा बन सकता है, वहीं दूसरी ओर तकनीक, निवेश और उद्योगों के विकास से अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
असल सवाल यह है, कि सरकार किसानों के हितों की रक्षा कैसे करती है। अगर सही नीतियां अपनाई गईं, तो यह डील किसानों के लिए अवसर बन सकती है, लेकिन अगर आयात को बिना सुरक्षा के खोल दिया गया, तो मक्का और सोयाबीन किसानों की आय पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत और अमेरिका के बीच हुआ नया व्यापार समझौता भारतीय कृषि और मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकता है। इस समझौते के तहत अमेरिकी बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों पर लगने वाला टैरिफ 50% प्रतिशत से घटाकर 18% प्रतिशत कर दिया गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारतीय किसान लंबे समय से निर्यात के बेहतर अवसरों की तलाश में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इस समझौते की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे दोनों देशों के लिए लाभकारी बताया। इस डील से किसानों को वैश्विक बाजार से सीधे जुड़ने का अवसर मिलेगा और उनकी आमदनी बढ़ने की संभावनाएं मजबूत होंगी।
टैरिफ में भारी कटौती के बाद अब अमेरिकी बाजार भारतीय कृषि उत्पादों के लिए पहले से कहीं ज्यादा खुला हो गया है। चावल, मसाले, दालें, फल और प्रोसेस्ड फूड जैसे उत्पाद अब कम कीमत पर अमेरिका पहुंच सकेंगे। इससे न सिर्फ इन उत्पादों की मांग बढ़ेगी, बल्कि भारतीय ब्रांड्स की मौजूदगी भी मजबूत होगी। अब किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए केवल घरेलू मंडियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। निर्यात बढ़ने से फसलों के बेहतर दाम मिलने की उम्मीद है, खासकर उन किसानों को जो पहले से ही एक्सपोर्ट क्वालिटी उत्पादन कर रहे हैं।
इस व्यापार समझौते का सीधा फायदा किसानों की आय पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच बढ़ने से फसलों की मांग स्थिर रहेगी और कीमतों में उतार-चढ़ाव कम होगा। इससे किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी। खासतौर पर वे किसान जो ऑर्गेनिक खेती, प्रोसेस्ड फूड या विशेष किस्मों की फसलें उगाते हैं, उन्हें बड़ा फायदा मिल सकता है। यह समझौता किसानों को वैश्विक मानकों के अनुसार उत्पादन के लिए भी प्रेरित करेगा, जिससे कृषि क्षेत्र में आधुनिकता आएगी।
इस समझौते का सबसे बड़ा असर मत्स्य पालन और झींगा निर्यात पर देखने को मिल सकता है। भारत पहले से ही झींगा निर्यात करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों में लाखों किसान इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। पहले 50 प्रतिशत टैरिफ के कारण भारतीय झींगा अमेरिकी बाजार में महंगा पड़ता था, जिससे किसानों को नुकसान होता था। अब टैरिफ घटने से भारतीय झींगा अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा और अमेरिका में इसकी मांग बढ़ने की पूरी संभावना है।
निर्यात बढ़ने का फायदा केवल बड़े निर्यातकों तक सीमित नहीं रहेगा। मत्स्य पालन और कृषि से जुड़े लाखों छोटे किसान, मजदूर, महिलाएं और ग्रामीण युवा इससे लाभान्वित होंगे। अगर अमेरिका से ऑर्डर बढ़ते हैं, तो हैचरी, फीड सप्लाई, प्रोसेसिंग यूनिट, पैकेजिंग और कोल्ड स्टोरेज जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और गांवों से शहरों की ओर पलायन पर भी कुछ हद तक रोक लग सकती है।
हालांकि, इस समझौते से मौके बड़े हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अमेरिकी बाजार में प्रवेश के लिए सख्त गुणवत्ता मानक, फूड सेफ्टी नियम और ट्रेसबिलिटी सिस्टम का पालन करना जरूरी होगा। किसानों और मछली पालकों को अब ज्यादा वैज्ञानिक और आधुनिक तरीकों को अपनाना पड़ेगा। अच्छी बात यह है कि इस समझौते के साथ अमेरिका से नई तकनीक, आधुनिक मशीनें और बेहतर प्रोसेसिंग सिस्टम भारत आने का रास्ता भी खुलेगा, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और क्षमता दोनों में सुधार हो सकता है।
अगर अमेरिका भारत पर 50% प्रतिशत तक भारी टैरिफ लगाता, तो इसका असर बेहद नकारात्मक होता। इतनी ऊंची दर पर भारतीय कृषि उत्पाद और झींगा अमेरिकी बाजार में बहुत महंगे हो जाते। इसके चलते अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों से आयात करना शुरू कर देते और भारतीय निर्यात में भारी गिरावट आती। घरेलू बाजार में अधिक सप्लाई होने से कीमतें गिरतीं और किसानों को दोहरा नुकसान झेलना पड़ता। खासकर झींगा किसानों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक होती, क्योंकि उनकी उत्पादन लागत ज्यादा होती है। ऐसे में मौजूदा समझौता भारतीय किसानों के लिए एक बड़ी राहत और नई उम्मीद बनकर सामने आया है।
एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड एक सुप्रसिद्ध कृषि उपकरण निर्माता ब्रांड है। जनवरी 2026 एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड के लिए ट्रैक्टर कारोबार के लिहाज से बेहद यादगार रहा। कंपनी के एग्री मशीनरी बिजनेस ने इस महीने ज़बरदस्त रफ्तार पकड़ी और कुल 9,799 ट्रैक्टरों की डिलीवरी के साथ मजबूत ग्रोथ दर्ज की। पिछले साल जनवरी में जहां बिक्री 6,669 यूनिट्स पर थी, वहीं इस बार इसमें करीब 47% फीसद की छलांग देखने को मिली। गांवों में बढ़ती खरीदारी, खेतों में तेज़ होती गतिविधियां और अनुकूल ग्रामीण माहौल इस उछाल की बड़ी वजह बने।
देश के भीतर एस्कॉर्ट्स कुबोटा की पकड़ जनवरी 2026 में और मजबूत होती नज़र आई। कंपनी ने घरेलू बाजार में 9,137 ट्रैक्टरों की बिक्री की, जबकि एक साल पहले यही आंकड़ा 6,058 यूनिट्स था। यानी भारतीय बाजार में बिक्री 50% से भी ज्यादा बढ़ी। रबी सीजन की अच्छी शुरुआत, किसानों की आय में सुधार और कृषि क्षेत्र को मिल रहे प्रोत्साहन ने इस ग्रोथ को मजबूती दी।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी कंपनी का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। जनवरी 2026 के दौरान 662 ट्रैक्टरों का निर्यात किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.3% अधिक है। भले ही निर्यात की गति घरेलू बिक्री जितनी तेज न रही हो, लेकिन वैश्विक स्तर पर स्थिर मांग ने निरंतरता बनाए रखी।
चालू वित्त वर्ष 2026 में अप्रैल से जनवरी के बीच एस्कॉर्ट्स कुबोटा ने कुल 1.11 लाख से अधिक ट्रैक्टर बेचे। यह आंकड़ा पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में 16% से ज्यादा की बढ़ोतरी को दर्शाता है। इससे साफ है कि कंपनी की बिक्री पूरे साल स्थिर गति से आगे बढ़ी है।
FY26 के पहले दस महीनों में घरेलू बाजार में कंपनी ने 1.05 लाख से ज्यादा ट्रैक्टर बेचे, जो सालाना आधार पर 15% की वृद्धि है। वहीं दूसरी ओर, निर्यात कारोबार ने और तेज़ी दिखाई। इस अवधि में निर्यात बिक्री 5,525 यूनिट्स तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 47% ज्यादा है। यह संकेत देता है कि कंपनी वैश्विक बाजारों में भी अपनी स्थिति मजबूत कर रही है।
एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड भारत के प्रमुख इंजीनियरिंग समूहों में से एक है, जिसे आठ दशक से अधिक का विनिर्माण अनुभव प्राप्त है। कंपनी कृषि मशीनरी और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए देश के कृषि और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। आधुनिक तकनीक, बेहतर गुणवत्ता और किफायती समाधानों पर कंपनी का फोकस उसे दीर्घकालिक विकास की राह पर आगे बढ़ा रहा है।
ट्रैक्टरचॉइस प्लेटफॉर्म के जरिए किसानों और ट्रैक्टर खरीदारों को खेती से जुड़ी हर जरूरी जानकारी मिलती रहती है। यहां नए ट्रैक्टर मॉडल, उनके फीचर्स और खेतों में उपयोग से जुड़ी ताज़ा अपडेट्स एक ही जगह उपलब्ध कराई जाती हैं।
किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को अधिक लाभकारी बनाने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश सरकार लगातार आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर जोर दे रही है। इसी दिशा में राज्य सरकार ने सूक्ष्म सिंचाई के साथ सेंसर आधारित ऑटोमेशन फर्टिगेशन प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए एक नई योजना शुरू की है। यह योजना खेती को पारंपरिक तरीकों से आगे ले जाकर वैज्ञानिक और तकनीक-आधारित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। सरकार का मानना है कि इस तकनीक के माध्यम से पानी, खाद और श्रम—तीनों की बचत होगी, जिससे किसानों की लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा।
भोपाल स्थित प्रमुख उद्यान (गुलाब गार्डन) में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री नारायण सिंह कुशवाह ने इस योजना की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उद्यानिकी फसलों में सेंसर आधारित ऑटोमेशन फर्टिगेशन प्रणाली बेहद कारगर साबित हो रही है। यह तकनीक फसल की वास्तविक जरूरतों के अनुसार सिंचाई और खाद प्रबंधन सुनिश्चित करती है, जिससे उत्पादन में स्थिरता और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है। मंत्री ने इसे किसानों के लिए “खेती का भविष्य” बताया।
मंत्री कुशवाह ने अपने संबोधन में कहा कि मध्य प्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है और किसानों का सशक्तिकरण राज्य के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है। सीमित जल संसाधन, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती उत्पादन लागत आज खेती की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में आधुनिक तकनीकों को अपनाना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है। सेंसर आधारित सिंचाई प्रणाली न केवल पानी और उर्वरक की बचत करती है, बल्कि फसल को सही समय पर सही मात्रा में पोषण देकर उसकी उत्पादकता भी बढ़ाती है।
यह प्रणाली पूरी तरह से स्मार्ट तकनीक पर आधारित है। खेत में लगाए गए सेंसर मिट्टी की नमी, तापमान और वातावरण की स्थिति पर लगातार नजर रखते हैं। जैसे ही मिट्टी में नमी तय स्तर से कम होती है, सिस्टम अपने आप सिंचाई शुरू कर देता है। इसी तरह फर्टिगेशन यानी सिंचाई के साथ खाद देने की प्रक्रिया भी स्वचालित होती है। पौधों को उतनी ही मात्रा में उर्वरक दिया जाता है, जितनी उन्हें वास्तव में आवश्यकता होती है। इससे खाद की बर्बादी रुकती है और मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बनी रहती है।
इस आधुनिक प्रणाली से किसानों को कई स्तरों पर लाभ मिलता है। सटीक सिंचाई से पानी की खपत में उल्लेखनीय कमी आती है और फसल को जरूरत के अनुसार नमी मिलती है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन से उत्पादन बढ़ता है और फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है। ऑटोमेशन के कारण श्रम की आवश्यकता कम हो जाती है, जिससे मजदूरी लागत घटती है। साथ ही, नियंत्रित सिंचाई के कारण खरपतवार भी कम पनपते हैं। कुल मिलाकर यह तकनीक खेती को अधिक टिकाऊ, कम लागत वाली और लाभकारी बनाती है।
सरकार इस योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पूरे प्रदेश में लागू कर रही है। सेंसर आधारित ऑटोमेशन फर्टिगेशन प्रणाली की एक यूनिट की लागत लगभग 4 लाख रुपये निर्धारित की गई है। इस पर किसानों को 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाएगा, यानी अधिकतम 2 लाख रुपये की सब्सिडी मिलेगी। योजना का लाभ वही किसान उठा सकते हैं, जिनके पास उद्यानिकी फसलों के लिए न्यूनतम 0.250 हेक्टेयर भूमि है। यह योजना एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) के अंतर्गत संचालित की जा रही है।
उद्यानिकी आयुक्त अरविंद दुबे के अनुसार, प्रदेश में 715 चयनित किसानों के खेतों में इस प्रणाली को स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक 597 किसानों के आवेदन विभागीय पोर्टल पर प्राप्त हो चुके हैं। शेष पात्र किसानों को योजना से जोड़ने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। कार्यशाला में अधिकारियों से आग्रह किया गया कि वे किसानों को समय पर मार्गदर्शन दें और आवेदन प्रक्रिया शीघ्र पूरी कराएं। साथ ही, तकनीकी सहायता तुरंत उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया ताकि किसान बिना देरी के इस आधुनिक तकनीक का लाभ उठा सकें।
वीएसटी (VST) ने जनवरी 2026 के लिए अपनी बिक्री रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कंपनी के पावर टिलर और ट्रैक्टर सेगमेंट में शानदार वृद्धि देखने को मिली है। जनवरी 2026 में वीएसटी ने कुल 5,257 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की, जबकि जनवरी 2025 में यह आंकड़ा 3,416 यूनिट्स था। इस तरह कंपनी की कुल बिक्री में 53.9% प्रतिशत की प्रभावशाली बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह प्रदर्शन भारतीय कृषि क्षेत्र में मशीनरी की बढ़ती मांग और छोटे किसानों के बीच आधुनिक उपकरणों को अपनाने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
जनवरी 2026 के दौरान वीएसटी की पावर टिलर बिक्री ने कंपनी के कुल वॉल्यूम में सबसे बड़ा योगदान दिया। इस महीने 4,810 पावर टिलर बेचे गए, जबकि जनवरी 2025 में यह संख्या 3,105 यूनिट्स थी। इस प्रकार पावर टिलर की बिक्री में 54.9 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। छोटे और मध्यम जोत वाले किसानों के लिए पावर टिलर एक किफायती और उपयोगी समाधान साबित हो रहे हैं, जिससे खेतों की उत्पादकता बढ़ रही है और श्रम लागत कम हो रही है।
वीएसटी के ट्रैक्टर सेगमेंट ने भी जनवरी 2026 में बेहतर प्रदर्शन किया। कंपनी ने इस महीने 447 ट्रैक्टर बेचे, जबकि पिछले साल जनवरी में 311 यूनिट्स की बिक्री हुई थी। यह ट्रैक्टर बिक्री में 43.7 प्रतिशत की सालाना वृद्धि को दर्शाता है। हालांकि ट्रैक्टर का वॉल्यूम पावर टिलर की तुलना में कम है, लेकिन यह संकेत देता है कि किसान धीरे-धीरे वीएसटी के ट्रैक्टर उत्पादों पर भी भरोसा जता रहे हैं।
अगर पूरे वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026) की बात करें, तो वीएसटी का प्रदर्शन बेहद मजबूत रहा है। इस अवधि में कंपनी ने कुल 46,868 यूनिट्स की बिक्री की, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 31,432 यूनिट्स था। यानी कुल बिक्री वॉल्यूम में 49.1 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़े बताते हैं कि कंपनी की ग्रोथ केवल एक महीने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष में लगातार बनी हुई है।
अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच वीएसटी की पावर टिलर बिक्री ने नया रिकॉर्ड बनाया। इस अवधि में कंपनी ने 42,184 पावर टिलर बेचे, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 27,124 यूनिट्स की बिक्री हुई थी। इस तरह पावर टिलर सेगमेंट में 55.5 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई। यह दर्शाता है कि भारत में छोटे खेतों और सब्जी उत्पादन जैसे क्षेत्रों में पावर टिलर की उपयोगिता तेजी से बढ़ रही है।
वित्त वर्ष 2026 की YTD अवधि में वीएसटी की ट्रैक्टर बिक्री 4,684 यूनिट्स रही, जबकि वित्त वर्ष 2025 की समान अवधि में यह 4,308 यूनिट्स थी। इस प्रकार ट्रैक्टर बिक्री में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी जरूर है, लेकिन यह बताती है कि ट्रैक्टर सेगमेंट में भी कंपनी धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत कर रही है और भविष्य में इसमें और सुधार की संभावना है।
वीएसटी (VST) भारत की एक प्रमुख कृषि मशीनरी कंपनी है, जो विशेष रूप से पावर टिलर और ट्रैक्टर निर्माण के लिए जानी जाती है। कंपनी छोटे और मध्यम किसानों के लिए आधुनिक, किफायती और भरोसेमंद कृषि उपकरण उपलब्ध कराती है। वीएसटी के पावर टिलर पूरे देश में किसानों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। कंपनी का उद्देश्य किसानों की उत्पादकता बढ़ाना, खेती को आसान बनाना और कृषि कार्यों में यंत्रीकरण को बढ़ावा देना है। जनवरी 2026 और YTD बिक्री आंकड़े यह संकेत देते हैं कि आने वाले महीनों में भी वीएसटी की ग्रोथ मजबूत बनी रह सकती है।
महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट बिजनेस (FEB) ने जनवरी 2026 के लिए अपने ट्रैक्टर बिक्री आंकड़े जारी किए हैं, जो कंपनी के लिए बेहद उत्साहजनक साबित हुए हैं। महिंद्रा ग्रुप की इस प्रमुख इकाई ने जनवरी 2026 में कुल 40,643 ट्रैक्टरों की बिक्री दर्ज की। यह आंकड़ा जनवरी 2025 में बेची गई 27,557 यूनिट्स की तुलना में 47% प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है। यह प्रदर्शन भारतीय कृषि क्षेत्र में बढ़ती मांग, बेहतर ग्रामीण परिस्थितियों और किसानों के बढ़ते भरोसे को साफ तौर पर दर्शाता है।
जनवरी 2026 के दौरान महिंद्रा ट्रैक्टर ने घरेलू बाजार में शानदार प्रदर्शन किया। कंपनी ने इस महीने 38,484 ट्रैक्टर भारत में बेचे, जबकि जनवरी 2025 में यह आंकड़ा 26,305 यूनिट्स था। इस तरह घरेलू बिक्री में 46% प्रतिशत की मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई। अच्छे मानसून, जलाशयों में पर्याप्त पानी और मजबूत रबी फसलों की बुवाई ने किसानों को नई कृषि मशीनरी में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया है, जिसका सीधा लाभ महिंद्रा को मिला है।
महिंद्रा ट्रैक्टर ने न केवल घरेलू बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी जबरदस्त प्रदर्शन किया है। जनवरी 2026 में कंपनी ने 2,159 ट्रैक्टरों का निर्यात किया, जबकि पिछले साल इसी महीने यह संख्या 1,252 यूनिट्स थी। इस प्रकार निर्यात में 72% प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि अफ्रीका, एशिया और अन्य उभरते कृषि बाजारों में महिंद्रा ब्रांड की मजबूत पकड़ और विश्वसनीयता को दर्शाती है।
अगर पूरे वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026) के आंकड़ों पर नजर डालें, तो महिंद्रा का प्रदर्शन लगातार मजबूत बना हुआ है। इस अवधि में कंपनी ने कुल 4,47,235 ट्रैक्टरों की बिक्री की, जबकि वित्त वर्ष 2025 की समान अवधि में यह आंकड़ा 3,64,180 यूनिट्स था। यानी कुल बिक्री में 23% प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो स्थिर और टिकाऊ मांग को दर्शाती है।
अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच महिंद्रा की घरेलू ट्रैक्टर बिक्री 4,30,374 यूनिट रही, जो पिछले वर्ष इसी अवधि की 3,50,632 यूनिट्स से काफी अधिक है। घरेलू बिक्री में 23% प्रतिशत की बढ़ोतरी ने कुल बिक्री में सबसे बड़ा योगदान दिया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार, कृषि आय में बढ़ोतरी और सरकारी योजनाओं के प्रभाव से किसानों का रुझान ट्रैक्टर खरीद की ओर लगातार बढ़ा है।
YTD अवधि में महिंद्रा की निर्यात बिक्री भी मजबूत रही। अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच कंपनी ने 16,861 ट्रैक्टरों का निर्यात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 13,548 यूनिट्स था। इस तरह निर्यात में 24% प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह संकेत देता है, कि वैश्विक स्तर पर महिंद्रा के ट्रैक्टर गुणवत्ता, तकनीक और किफायती कीमत के कारण पसंद किए जा रहे हैं।
महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट बिजनेस के प्रेसिडेंट वीजय नाकरा ने बिक्री प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जनवरी 2026 में घरेलू बाजार में 46% प्रतिशत की वृद्धि कंपनी के लिए उत्साहजनक है। उन्होंने बताया कि अच्छे जलाशय स्तरों के कारण रबी बुवाई मजबूत रही है और आने वाले महीनों में सरकारी समर्थन तथा ग्रामीण खर्च में बढ़ोतरी से कृषि और फार्म मशीनीकरण को और बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, निर्यात बाजारों में 72% प्रतिशत की वृद्धि महिंद्रा के वैश्विक विस्तार की दिशा में एक मजबूत संकेत है।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार, 1 फरवरी 2026 को केंद्रीय बजट 2026 पेश किया। यह बजट 1 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाले वित्तीय वर्ष की दिशा तय करता है। इस बजट में एक बार फिर खेती और ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखा गया है, ताकि किसानों की आय बढ़े, रोजगार के अवसर पैदा हों और उन्हें स्थायी समर्थन मिल सके।
वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि कृषि से जुड़ी हर योजना का सीधा लाभ किसानों और ग्रामीण परिवारों तक पहुँचे। नए सुधारों का उद्देश्य कृषि से जुड़े कार्यों में रोजगार बढ़ाना, फसल उत्पादन में सुधार करना और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाना है। इन प्रयासों से कृषि क्षेत्र में लगभग 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और कई क्षेत्रों में ग्रामीण गरीबी घटी है।
बजट भाषण में वैश्विक चुनौतियों का भी जिक्र किया गया जो भारतीय कृषि को प्रभावित कर रही हैं। इनमें कृषि निर्यात में कमजोरी, बीज और उर्वरक की आपूर्ति में दिक्कतें और सप्लाई चेन में रुकावटें शामिल हैं। साथ ही, प्रिसिजन फार्मिंग और एआई जैसे नए तरीके खेती को बदल रहे हैं, जबकि पानी, ऊर्जा और खनिजों की मांग भी बढ़ रही है।
कृषि को विकास का प्रमुख इंजन मानते हुए सरकार ने इसके लिए बजट समर्थन बढ़ाया है। कृषि और किसान कल्याण विभाग का बजट 2013–14 में ₹21,933.50 करोड़ से बढ़कर 2025–26 में ₹1,27,290.16 करोड़ हो गया है। पीएलएफएस 2023–24 के अनुसार, भारत की लगभग 46.1 प्रतिशत कार्यशील आबादी अब भी खेती और इससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है।
बजट 2026 की एक अहम घोषणा बहुभाषी एआई आधारित कृषि टूल है। यह टूल किसानों को फसल योजना, मौसम की जानकारी, कीट नियंत्रण और बाजार भाव से जुड़ी जानकारी देगा। यह क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध होगा, जिससे किसान समय पर सही फैसले ले सकेंगे।
सरकार ने नारियल, चंदन और अखरोट जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों के लिए विशेष समर्थन की घोषणा की है। चंदन प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर संरक्षण, नियोजित खेती और बेहतर बाजार संपर्क पर काम किया जाएगा। इससे किसानों की आय बढ़ने और वन आधारित समुदायों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
नारियल के लिए एक नई प्रोत्साहन योजना लाई गई है, जिसके तहत पुराने या कम उत्पादन वाले पेड़ों को नए पौधों से बदला जाएगा। प्रमुख नारियल उत्पादक राज्यों में यह योजना लागू होगी। इसके अलावा काजू और कोको के लिए अलग-अलग कार्यक्रम घोषित किए गए हैं, जिनका लक्ष्य आयात घटाना, प्रसंस्करण बढ़ाना और 2030 तक निर्यात को मजबूत करना है।
पशुपालन क्षेत्र में क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी योजना का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही पशुपालक किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को समर्थन दिया जाएगा। इन कदमों से ऋण तक आसान पहुँच, सामूहिक खेती को बढ़ावा और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
वीएसटी टिलर्स ट्रैक्टर्स लिमिटेड ने गुजरात के किसानों के लिए अपनी नई FENTM कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर सीरीज लॉन्च कर एक बड़ा कदम उठाया है। इस सीरीज की शुरुआत कंपनी ने गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र से की है, जो खेती और बागवानी के लिए जाना जाता है।
VST पहले से ही भारत में कॉम्पैक्ट कृषि मशीनों के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बना चुकी है और अब इस नई सीरीज के जरिए वह छोटे व मध्यम किसानों की जरूरतों को और बेहतर तरीके से पूरा करना चाहती है। कंपनी का लक्ष्य किसानों को ऐसे ट्रैक्टर उपलब्ध कराना है जो ताकतवर, ईंधन की बचत करने वाले और चलाने में आसान हों। FENTM सीरीज आधुनिक तकनीक और व्यावहारिक डिजाइन का मेल है, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादकता मिल सके।
FENTM ट्रैक्टर सीरीज में कुल पांच मॉडल शामिल किए गए हैं, जिनमें 180 FENTM, 224 FENTM, 225 FENTM, 929 FENTM EX और 929 FENTM VX प्रमुख हैं। ये सभी मॉडल 19 HP से 30 HP की पावर रेंज में उपलब्ध हैं, जो छोटे और मध्यम आकार के खेतों के लिए आदर्श मानी जाती है।
किसानों को इसमें 2WD और 4WD दोनों विकल्प मिलते हैं, ताकि वे अपनी जमीन की बनावट, मिट्टी की स्थिति और खेती के प्रकार के अनुसार सही ट्रैक्टर का चयन कर सकें। इस विविधता के कारण FENTM सीरीज कई प्रकार के कृषि कार्यों जैसे जुताई, बुवाई, छिड़काव और ढुलाई के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
FENTM ट्रैक्टरों को खासतौर पर कॉम्पैक्ट फार्मिंग को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। इनका आकार छोटा और संतुलित रखा गया है, जिससे संकीर्ण खेतों, बागानों, कतार वाली फसलों और सब्जी उत्पादन वाले क्षेत्रों में इन्हें आसानी से चलाया जा सके।
छोटे आकार के बावजूद इनमें पर्याप्त ताकत दी गई है, जिससे ये भारी काम भी कुशलता से कर सकते हैं। इन ट्रैक्टरों में बेहतर कंट्रोल सिस्टम और आरामदायक संचालन की व्यवस्था है, जो किसानों की थकान कम करती है और काम की गति बढ़ाती है। इससे रोजमर्रा के कृषि कार्य कम समय और कम खर्च में पूरे हो पाते हैं।
VST टिलर्स ट्रैक्टर्स के CEO एंटनी चेरुकारा के अनुसार, कंपनी का मुख्य उद्देश्य ऐसे कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर तैयार करना है जो शक्तिशाली होने के साथ-साथ चलाने में सरल हों। उनका कहना है कि FENTM सीरीज किसानों को कम फ्यूल में ज्यादा काम करने की क्षमता देती है, जिससे उनकी उत्पादन लागत कम होती है।
ये ट्रैक्टर लंबे समय तक भरोसेमंद प्रदर्शन देने के लिए बनाए गए हैं और विभिन्न कृषि कार्यों में उपयोगी साबित हो सकते हैं। कंपनी चाहती है कि किसान तकनीक का लाभ उठाकर अपनी आय में बढ़ोतरी करें और खेती को अधिक लाभकारी बना सकें।
FENTM का पूरा अर्थ है “Fuel Efficient and Torque Max”, यानी कम ईंधन में अधिक ताकत। इस सीरीज में लोड सेंसिंग तकनीक का उपयोग किया गया है, जो ट्रैक्टर पर पड़ने वाले काम के दबाव को पहचानती है।
जब काम हल्का होता है, तब इंजन कम डीजल में चलता है और जब काम भारी होता है, तब जरूरत के अनुसार ज्यादा ताकत देता है। इससे न केवल डीजल की बचत होती है, बल्कि इंजन की कार्यक्षमता भी बेहतर बनी रहती है। यह तकनीक किसानों के लिए लागत कम करने और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा देने में सहायक है।
FENTM ट्रैक्टरों का एक बड़ा आकर्षण इनका बेहतर माइलेज और आसान संचालन है। कम ईंधन खपत के कारण किसानों को लंबे समय में बड़ी बचत होती है। साथ ही, इन ट्रैक्टरों में कंट्रोल सिस्टम को सरल और सहज बनाया गया है, जिससे नए किसान भी इन्हें आसानी से चला सकते हैं।
हल्का स्टीयरिंग, आरामदायक सीट और संतुलित डिजाइन इन्हें लंबे समय तक काम करने के लिए सुविधाजनक बनाते हैं। इस कारण ये ट्रैक्टर न केवल कार्यक्षमता बढ़ाते हैं, बल्कि किसानों के शारीरिक श्रम को भी कम करते हैं।
VST की FENTM ट्रैक्टर सीरीज को गुजरात की प्रमुख फसलों जैसे अनार, आम, बाजरा, कपास, मूंगफली, अरंडी, मक्का, गन्ना और विभिन्न सब्जियों की खेती के लिए उपयुक्त बताया गया है। इन ट्रैक्टरों की शक्ति और कॉम्पैक्ट डिजाइन इन्हें बागवानी और कतार वाली फसलों के लिए खास बनाती है।
गुजरात में इस सीरीज की शुरुआत को VST के लिए कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर सेगमेंट में अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे किसानों को आधुनिक, किफायती और भरोसेमंद तकनीक का लाभ मिलेगा।
ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार ने उनकी जरूरत के अनुसार ऋण सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है। यह ऋण आसान और लचीली किस्तों में चुकाने योग्य होगा, जिससे महिलाओं पर किसी प्रकार का आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। इस पहल का मुख्य उद्देश्य यह है कि महिलाएं बिना किसी डर या दबाव के अपने छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर सकें। सिलाई-कढ़ाई, डेयरी, मुर्गी पालन, सब्जी उत्पादन, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण जैसे कार्यों के जरिए वे अपनी आमदनी बढ़ा सकेंगी। जब महिलाओं को वित्तीय सहयोग मिलता है, तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह ऋण सुविधा उन्हें सिर्फ रोजगार ही नहीं देगी, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत और निर्णय लेने में सक्षम बनाएगी।
उत्तर प्रदेश सरकार स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को ग्रामीण विकास की रीढ़ के रूप में विकसित कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में इन समूहों को केवल बचत और ऋण तक सीमित न रखकर, उन्हें विकास के एक सशक्त माध्यम के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। स्टार्ट-अप फंड, रिवॉल्विंग फंड और कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड के माध्यम से महिलाओं को पूंजी उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे वे अपने व्यवसाय को शुरू करने और विस्तार देने में सक्षम हो सकें। स्वयं सहायता समूह महिलाओं को संगठित मंच प्रदान करते हैं, जहां वे आपस में अनुभव साझा करती हैं, नई योजनाएं बनाती हैं और एक-दूसरे का सहयोग करती हैं। इससे गांवों में सामूहिक विकास की भावना पैदा होती है और महिलाएं सामाजिक व आर्थिक रूप से अधिक सशक्त बनती हैं।
सरकार की योजना है कि पात्र गृहस्थी राशन कार्डधारक और अंत्योदय कार्डधारकों के करीब दो लाख परिवारों को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा जाए। इसके साथ ही वीबी जिरामजी कार्डधारकों और जीरो पावर्टी अभियान के तहत चिन्हित 6.67 लाख परिवारों की महिलाओं को भी इन समूहों से जोड़ने की प्रक्रिया तेज की जा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समाज का कोई भी कमजोर वर्ग विकास की मुख्यधारा से पीछे न रह जाए। जब अधिक से अधिक परिवार समूहों से जुड़ेंगे, तो उन्हें न केवल वित्तीय सहायता मिलेगी, बल्कि सरकारी योजनाओं की जानकारी और उनका लाभ भी सीधे प्राप्त होगा। यह पहल ग्रामीण समाज में समानता और समावेशी विकास को बढ़ावा देगी।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत महिलाओं को विभिन्न जिम्मेदार भूमिकाएं दी जाएंगी, जैसे समूह सखी, बैंक सखी, ड्रोन सखी और आजीविका सखी। ये भूमिकाएं महिलाओं को न केवल रोजगार के अवसर देंगी, बल्कि उन्हें गांव के विकास कार्यों में सक्रिय भागीदार भी बनाएंगी। बैंक सखी के माध्यम से महिलाएं बैंकिंग सेवाओं को गांव तक पहुंचाएंगी, जिससे वित्तीय लेन-देन आसान होगा। ड्रोन सखी खेती में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देंगी, जबकि आजीविका सखी ग्रामीण परिवारों को स्वरोजगार के नए अवसरों से जोड़ेंगी। इन सभी जिम्मेदारियों से महिलाओं की आमदनी बढ़ेगी और उनका सामाजिक सम्मान भी मजबूत होगा।
योगी सरकार ने महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है। इसका लक्ष्य है कि अधिक से अधिक ग्रामीण महिलाएं इस व्यवस्था का हिस्सा बनें और विकास की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं। गांव-गांव जाकर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएंगे, जिससे महिलाओं को समूहों की उपयोगिता और लाभों की जानकारी दी जा सके। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि वे सामाजिक रूप से भी अधिक जागरूक और सशक्त बनेंगी। यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।
प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों में महिलाओं को समूह से जोड़ने के लिए एक व्यापक मेगा कैंपेन चलाया जाएगा। इस अभियान के माध्यम से हर पंचायत में शिविर लगाकर महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों की जानकारी दी जाएगी और उन्हें इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाएगा। पंचायत स्तर पर इस तरह के प्रयासों से महिलाओं तक सीधी पहुंच बनेगी और योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन संभव होगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में संगठित महिला शक्ति का निर्माण होगा, जो सामाजिक और आर्थिक बदलाव की वाहक बनेगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का स्पष्ट मानना है कि जब महिला सशक्त होती है, तो पूरा परिवार मजबूत बनता है, और जब परिवार मजबूत होता है, तो गांव और प्रदेश अपने आप सशक्त हो जाते हैं। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को सीधे बाजार से जोड़ने की योजना है, ताकि स्थानीय उत्पादों को सही मूल्य मिल सके। इससे किसानों और महिलाओं को अपने परिश्रम का उचित लाभ मिलेगा। यह पहल न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देगी, बल्कि “विकसित उत्तर प्रदेश” के लक्ष्य को भी नई गति प्रदान करेगी। सशक्त महिला, सशक्त परिवार, सशक्त गांव और सशक्त प्रदेश—यही इस पूरी योजना की मूल भावना है।
बकरी पालन (Goat Farming) आज के समय में ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। कम लागत में शुरू होने वाला यह व्यवसाय कम समय में अच्छा मुनाफा देने की क्षमता रखता है। बकरी के दूध और खाद दोनों की बाजार में लगातार मांग बनी रहती है, जिससे यह एक स्थायी और सुरक्षित आय का स्रोत बन जाता है। बहुत से किसान और युवा बकरी पालन को अपनाकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं और अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं। बकरी पालन से किसानों की आय में बढ़ोतरी के साथ-साथ गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं। इन्हीं सभी फायदों को देखते हुए राज्य सरकार ने बकरी एवं भेड़ पालन को प्रोत्साहन देने के लिए एक विशेष योजना शुरू की है, जिसके तहत फार्म खोलने पर भारी सब्सिडी दी जा रही है। आइए जानते हैं इस योजना के उद्देश्य और लाभ के बारे में।
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और पशुपालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बिहार सरकार द्वारा “समेकित बकरी एवं भेड़ विकास योजना” चलाई जा रही है। इस योजना के तहत निजी क्षेत्रों में बकरी व भेड़ पालन फार्म की स्थापना को प्रोत्साहित किया जा रहा है। जो किसान या युवा स्वरोजगार शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए यह योजना एक सुनहरा अवसर है। सरकार ने इस योजना के लिए इस वर्ष कुल 1293.44 लाख रुपये का प्रावधान किया है। योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, पशुपालन क्षेत्र को विकसित करना और बेरोजगार युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। इसके अंतर्गत चयनित लाभार्थियों को सब्सिडी के साथ-साथ प्रशिक्षण की सुविधा भी दी जाती है, जिससे वे वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन कर सकें।
इस योजना के तहत बकरी एवं भेड़ पालन फार्म खोलने के लिए 60 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को इकाई लागत का 50 प्रतिशत अनुदान मिलता है, जबकि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लाभार्थियों को 60 प्रतिशत तक सब्सिडी का लाभ दिया जाता है। राज्य सरकार द्वारा तीन प्रकार के प्रोजेक्ट मॉडल तय किए गए हैं—20 बकरी व 1 बकरा, 40 बकरी व 2 बकरा और 100 बकरी व 5 बकरा। इन सभी मॉडल में लाभार्थियों को बैंक लोन की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है, जिससे वे आसानी से अपना फार्म शुरू कर सकें। सब्सिडी की राशि सीधे लाभार्थी के खाते में भेजी जाती है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है।
यदि कोई व्यक्ति छोटे स्तर पर बकरी पालन शुरू करना चाहता है, तो 20 बकरी और 1 बकरा का फार्म उसके लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है। इस मॉडल की इकाई लागत विभाग द्वारा 2.42 लाख रुपये निर्धारित की गई है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को इस पर 50 प्रतिशत यानी अधिकतम 1.21 लाख रुपये की सब्सिडी मिलेगी। वहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लाभार्थियों को 60 प्रतिशत या अधिकतम 1.45 लाख रुपये तक का अनुदान दिया जाएगा। यह मॉडल उन किसानों और युवाओं के लिए आदर्श है, जो सीमित संसाधनों में स्वरोजगार शुरू करना चाहते हैं और धीरे-धीरे अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
मध्यम स्तर के व्यवसाय के लिए 40 बकरी और 2 बकरा का फार्म एक बेहतर विकल्प माना जाता है। इस फार्म की अनुमानित लागत 5.32 लाख रुपये तय की गई है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को इसमें लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 2.66 लाख रुपये की सब्सिडी दी जाएगी। वहीं SC और ST वर्ग के लाभार्थियों को 60 प्रतिशत या अधिकतम 3.19 लाख रुपये तक का अनुदान मिलेगा। इस मॉडल से अच्छी आय की संभावना होती है और कम समय में निवेश की भरपाई संभव हो जाती है। यह उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो पशुपालन को मुख्य व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं।
बड़े स्तर पर व्यवसाय शुरू करने वालों के लिए 100 बकरी और 5 बकरा का फार्म मॉडल उपलब्ध है। इसकी अनुमानित लागत 13.04 लाख रुपये तय की गई है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को इसमें 50 प्रतिशत या अधिकतम 6.52 लाख रुपये का अनुदान मिलेगा, जबकि SC और ST वर्ग के लाभार्थियों को 60 प्रतिशत या अधिकतम 7.82 लाख रुपये तक की सब्सिडी दी जाएगी। भूमि की बात करें तो 20 बकरी और 1 बकरा के लिए चारा भूमि की अनिवार्यता नहीं है, लेकिन 40 बकरी और 2 बकरा के लिए 50 डिसमिल तथा 100 बकरी और 5 बकरा के लिए 100 डिसमिल भूमि होना जरूरी है। यह भूमि लीज पर भी ली जा सकती है, जिसके लिए 1000 रुपये के नॉन-ज्यूडीशियल स्टांप पर सात वर्षों की लीज अनिवार्य है।
यह योजना बिहार सरकार द्वारा संचालित की जा रही है, इसलिए केवल बिहार राज्य के निवासी ही इसमें आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के लिए आधार कार्ड की फोटो कॉपी, जाति प्रमाण पत्र (SC/ST के लिए), पासपोर्ट साइज फोटो, बैंक खाता विवरण, भूमि या लीज से संबंधित दस्तावेज और प्रशिक्षण प्रमाण पत्र आवश्यक होंगे। इच्छुक लाभार्थी state.bihar.gov.in/abh वेबसाइट पर जाकर आधार या वोटर आईडी से पंजीकरण कर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। सभी दस्तावेजों की स्कैन कॉपी ऑनलाइन अपलोड करनी होगी। एक व्यक्ति केवल एक ही आवेदन कर सकता है और सरकारी सेवा में कार्यरत व्यक्ति का आवेदन मान्य नहीं होगा। लाभार्थियों का चयन “पहले आओ, पहले पाओ” के आधार पर किया जाएगा, जिसमें स्व-लागत से फार्म खोलने और प्रशिक्षण प्राप्त आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी। अधिक जानकारी के लिए संबंधित पशुपालन अधिकारी के कार्यालय से संपर्क किया जा सकता है।
मध्यप्रदेश सरकार किसानों को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रधानमंत्री कुसुम-बी योजना को प्रदेश में “प्रधानमंत्री कृषक मित्र सूर्य योजना” के रूप में लागू किया गया है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों की बिजली पर निर्भरता को समाप्त करना, सिंचाई को आसान बनाना और उन्हें अतिरिक्त आय का अवसर देना है। इसके तहत 52 हजार किसानों के खेतों में सोलर पंप लगाए जाएंगे, जिससे वे न केवल अन्नदाता बल्कि ऊर्जादाता भी बन सकेंगे।
योजना के अंतर्गत अब तक 34,600 लेटर ऑफ अवार्ड जारी किए जा चुके हैं और लगभग 33 हजार कार्यादेश किसानों के खेतों में सोलर पंप स्थापना के लिए दिए जा चुके हैं। सोलर पंप लगने के बाद किसान सिंचाई के लिए बिजली बिल से मुक्त हो जाएंगे। साथ ही वे अपने खेतों में उत्पादित अतिरिक्त सौर ऊर्जा को सरकार को बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त पंप की स्थापना के बाद 5 वर्षों तक रखरखाव की जिम्मेदारी संबंधित कंपनी की होगी, जिससे किसानों को किसी प्रकार की तकनीकी चिंता नहीं रहेगी।
कुसुम-बी योजना के अंतर्गत 1 HP से 7.5 HP तक की क्षमता के सोलर पंप पर लगभग 90% तक अनुदान दिया जाएगा। किसान को कुल लागत का केवल लगभग 10% ही देना होगा। लगभग 60% राशि कृषक ऋण के रूप में होगी, जिसका ब्याज सहित भुगतान राज्य सरकार करेगी। शेष 30% राशि भारत सरकार द्वारा बेंचमार्क लागत के आधार पर अनुदान के रूप में दी जाएगी। यह सब्सिडी व्यवस्था सभी वर्गों SC, ST, OBC और सामान्य वर्ग के किसानों के लिए समान रूप से लागू होगी।
योजना के अंतर्गत 1 HP से लेकर 7.5 HP तक के विभिन्न प्रकार के सोलर पंप उपलब्ध कराए जाएंगे। उदाहरण के तौर पर 1 HP DC सरफेस पंप पर किसान को लगभग ₹12,427 देना होगा, वहीं 3 HP DC सबमर्सिबल (नॉर्मल कंट्रोलर) पंप पर ₹20,968 का अंशदान तय किया गया है। 5 HP DC सबमर्सिबल पंप के लिए किसान अंश ₹30,289 और 7.5 HP DC सबमर्सिबल पंप पर ₹41,537 देना होगा। यदि किसान USPC कंट्रोलर वाला पंप चुनते हैं, तो उनका अंशदान कुछ अधिक रहेगा। इससे किसानों को अपनी आवश्यकता और क्षमता के अनुसार पंप चुनने की सुविधा मिलेगी।
इस योजना का लाभ वही किसान उठा सकते हैं जो मध्यप्रदेश के स्थायी निवासी हों। किसान के पास कम से कम 3 हेक्टेयर भूमि होना अनिवार्य है और पंप की क्षमता 3, 5 या 7.5 HP होनी चाहिए। किसान के पास अस्थाई विद्युत कनेक्शन होना जरूरी है। जिस भूमि पर सोलर पंप लगाया जाएगा, वहां भविष्य में किसी भी प्रकार के विद्युत पंप पर अतिरिक्त अनुदान नहीं मिलेगा। इसके साथ ही किसान को स्व-प्रमाणीकरण देना होगा कि संबंधित खेत पर पहले से कोई विद्युत पंप चालू नहीं है। गलत जानकारी देने पर किसान को योजना से वंचित किया जा सकता है।
सोलर पंप के लिए आवेदन करने हेतु किसान को अस्थाई विद्युत कनेक्शन की रसीद, आधार कार्ड, जमीन के कागजात, बैंक पासबुक, मोबाइल नंबर और पासपोर्ट साइज फोटो की आवश्यकता होगी। आवेदन पूरी तरह ऑनलाइन माध्यम से https://cmsolarpump.mp.gov.in वेबसाइट पर किया जा सकता है। आवेदन के बाद संबंधित विभाग द्वारा खेत का निरीक्षण किया जाएगा। स्वीकृति मिलने पर सोलर पंप स्थापित किया जाएगा और अनुदान की राशि सीधे किसान के बैंक खाते में DBT के माध्यम से भेजी जाएगी।
इस योजना से किसानों को बिजली बिल से मुक्ति मिलेगी, सिंचाई के लिए स्वतंत्रता मिलेगी और अतिरिक्त ऊर्जा बेचकर आय बढ़ाने का अवसर प्राप्त होगा। खेतों में स्वच्छ और स्थायी ऊर्जा प्रणाली उपलब्ध होगी, जिससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। 5 साल तक मुफ्त रखरखाव से किसानों को तकनीकी परेशानियों से राहत मिलेगी। योजना की अधिक जानकारी के लिए किसान मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड की वेबसाइट https://cmsolarpump.mp.gov.in पर विजिट कर सकते हैं या अपने नजदीकी बिजली निगम कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।
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