उत्तर प्रदेश सरकार ने वित्त वर्ष 2026–27 के बजट में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के लिए ₹10,888 करोड़ का प्रावधान किया है। यह आवंटन पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 20% अधिक है, जो राज्य सरकार की कृषि और ग्रामीण विकास के प्रति गंभीर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख कृषि राज्यों में से एक है, जहाँ बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। ऐसे में यह बजट न केवल किसानों की आय बढ़ाने बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
कृषि बजट में लगभग 20% की वृद्धि यह संकेत देती है कि सरकार खेती-किसानी को प्राथमिकता दे रही है। बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन, सिंचाई की चुनौतियाँ और बाजार तक पहुंच जैसी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए यह अतिरिक्त धनराशि दी गई है।
यह वृद्धि आगामी 2027 विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण मतदाताओं को साधने की रणनीति के रूप में भी देखी जा रही है। हालांकि, इसके पीछे दीर्घकालिक विकास का लक्ष्य भी है, जिसमें किसानों की आय बढ़ाना, उत्पादन क्षमता सुधारना और कृषि को टिकाऊ बनाना शामिल है।
कृषि अवसंरचना पर विशेष जोर
इस बजट का बड़ा हिस्सा कृषि अवसंरचना को मजबूत करने पर खर्च किया जाएगा। सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्र मानसून पर निर्भर हैं और बाढ़ से प्रभावित होते हैं, जिससे फसलों को भारी नुकसान होता है। ऐसे में नहरों के विस्तार, जलाशयों के निर्माण और जल प्रबंधन योजनाओं पर निवेश किसानों के लिए राहतकारी साबित हो सकता है।
इसके अलावा, डीजल पंपों को सोलर पंप में बदलने की योजना पर भी जोर दिया गया है। इससे किसानों की लागत घटेगी, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और ऊर्जा की बचत होगी। ग्रामीण भंडारण और वेयरहाउसिंग सुविधाओं को भी सुदृढ़ करने की योजना है ताकि फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
प्राकृतिक और टिकाऊ खेती को बढ़ावा
सरकार ने प्राकृतिक खेती और पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए बजट में विशेष प्रावधान किया है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा। प्राकृतिक खेती से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार, उत्पादन लागत में कमी और बेहतर बाजार मूल्य मिलने की संभावना रहती है। सरकार प्रशिक्षण कार्यक्रमों और वित्तीय सहायता के माध्यम से किसानों को इस दिशा में आगे बढ़ाने की योजना बना रही है। यह कदम जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने में भी मददगार होगा।
किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को सशक्तिकरण
किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत बनाने के लिए भी बजट में धनराशि निर्धारित की गई है। एफपीओ के माध्यम से छोटे और सीमांत किसान सामूहिक रूप से अपनी उपज बेच सकते हैं, बेहतर कीमत प्राप्त कर सकते हैं और लागत कम कर सकते हैं। सरकार द्वारा परिक्रामी निधि और वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी, जिससे ये संगठन बाजार में अपनी पकड़ मजबूत कर सकें। इससे किसानों की आय में स्थिरता आएगी और बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी।
गन्ना किसानों के लिए निरंतर समर्थन
उत्तर प्रदेश देश का प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य है। गन्ना किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने बजट में निरंतर समर्थन का आश्वासन दिया है। पिछले वर्षों में रिकॉर्ड भुगतान का दावा किया गया है, जिससे किसानों में भरोसा बढ़ा है। गन्ना उद्योग की मजबूती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे जुड़े लाखों परिवारों की आय पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
सिंचाई और जल संसाधन प्रबंधन
बजट में सिंचाई परियोजनाओं के विस्तार और बाढ़ नियंत्रण योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्र हर वर्ष बाढ़ से प्रभावित होते हैं, जिससे फसलें नष्ट हो जाती हैं। नहरों की मरम्मत, नई परियोजनाओं का निर्माण और जल संरक्षण योजनाएं किसानों को स्थायी राहत प्रदान कर सकती हैं। बेहतर जल प्रबंधन से फसल विविधीकरण को भी बढ़ावा मिलेगा और किसान उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर रुख कर सकेंगे।
फसल ऋण, बीमा और वित्तीय समावेशन
किसानों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराने और फसल बीमा योजनाओं को मजबूत करने पर भी बजट में जोर दिया गया है। प्राकृतिक आपदा या बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण होने वाले नुकसान से किसानों को बचाने के लिए बीमा सुरक्षा महत्वपूर्ण है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और डिजिटल बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से सब्सिडी और सहायता राशि सीधे किसानों के खातों में भेजी जाएगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार कम होगा।
उत्पादन लक्ष्य और कृषि विकास
राज्य सरकार ने खाद्यान्न और तिलहन उत्पादन के लिए नए लक्ष्य निर्धारित किए हैं। उत्तर प्रदेश पहले से ही गेहूं, धान और गन्ने का बड़ा उत्पादक है। बेहतर बीज, उन्नत तकनीक और सिंचाई सुविधाओं के माध्यम से उत्पादन में और वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है। फसल विविधीकरण से किसानों को अधिक लाभ मिलने की संभावना है और राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था अधिक संतुलित बन सकती है।
व्यापक आर्थिक प्रभाव
₹9.12 लाख करोड़ के कुल राज्य बजट में कृषि क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। कृषि में निवेश से ग्रामीण क्षेत्रों में मांग बढ़ती है, जिससे अन्य उद्योगों और सेवाओं को भी लाभ होता है।
डेयरी, मत्स्य पालन, खाद्य प्रसंस्करण और ग्रामीण परिवहन जैसे क्षेत्रों में भी विकास की संभावनाएं बढ़ती हैं। इस प्रकार कृषि बजट केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण ग्रामीण विकास की नींव रखता है।
निष्कर्ष: ग्रामीण समृद्धि की दिशा में बड़ा कदम
यूपी बजट 2026–27 में कृषि के लिए ₹10,888 करोड़ का प्रावधान राज्य सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। 20% की वृद्धि, सिंचाई पर जोर, प्राकृतिक खेती का प्रोत्साहन, एफपीओ सशक्तिकरण और वित्तीय सुरक्षा उपाय किसानों के लिए सकारात्मक संकेत हैं।
अब सबसे महत्वपूर्ण पहलू इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होगा। यदि सरकार अपने वादों को जमीनी स्तर पर सफलतापूर्वक लागू करती है, तो यह बजट उत्तर प्रदेश के किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
ट्रैक्टरचॉइस प्लेटफॉर्म किसानों को खेती-बाड़ी से जुड़ी सभी जरूरी और ताज़ा जानकारियां उपलब्ध कराता है। यहां ट्रैक्टरों के नए मॉडल, उनकी कीमत, फीचर्स और खेतों में उपयोग से जुड़ी अपडेट नियमित रूप से साझा की जाती हैं। साथ ही स्वराज, महिंद्रा, न्यू हॉलैंड, वीएसटी और कुबोटा जैसी प्रमुख ट्रैक्टर कंपनियों की पूरी और विश्वसनीय जानकारी भी ट्रैक्टरचॉइस पर आसानी से प्राप्त की जा सकती है।
The Indian agricultural landscape is off to a flying start in 2026. The latest tractor retail report from FADA (Federation of Automobile Dealers Associations) is out, and the numbers tell a story of immense growth, rural prosperity, and a clear shift in how India’s farmers are investing in their future.
In January 2026, the industry recorded a staggering 22.9% increase in sales, proving that the demand for modern machinery is stronger than ever.
This year has seen a significant leap in tractor registrations across the country. Here is how the month stacks up against the previous year:
This double-digit growth signals that farmers are not only confident but are also choosing to upgrade to newer, more reliable technology to improve their yields.
The market is becoming increasingly competitive. While established giants continue to lead, several mid-tier brands are growing rapidly.
One of the most interesting takeaways from the January 2026 report is the performance of smaller brands.
The 22.9% growth isn't just a number—it’s a sign of a healthy rural economy. Better crop prices, favorable government schemes, and a strong start to the 2026 season have given farmers the "green light" to invest in powerful new machines.
The tractor market has set a high bar for the rest of 2026. If this trend continues, we are looking at a record-breaking year for Indian agriculture!
ट्रैक्टर आज के समय में खेती का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) द्वारा जारी जनवरी 2026 की रिटेल बिक्री रिपोर्ट के अनुसार, देश में ट्रैक्टर बाजार ने मजबूत वृद्धि दर्ज की है। जनवरी 2026 में कुल 1,14,759 ट्रैक्टरों की रिटेल बिक्री हुई, जबकि जनवरी 2025 में यह संख्या 93,386 यूनिट थी। इस तरह सालाना आधार पर 22.9 प्रतिशत की प्रभावशाली बढ़ोतरी देखने को मिली। बढ़ती मांग के बीच अधिकांश प्रमुख कंपनियों की बिक्री में इजाफा हुआ, हालांकि बाजार हिस्सेदारी के मामले में तस्वीर मिश्रित रही। ट्रैक्टरचॉइस के इस लेख में आज हम ब्रांडवाइज ट्रैक्टर्स की बिक्री प्रदर्शन के बारे में जानेंगे।
महिंद्रा एंड महिंद्रा (ट्रैक्टर डिवीजन)
महिंद्रा एंड महिंद्रा ने जनवरी 2026 में 26,006 ट्रैक्टरों की बिक्री की, जो पिछले वर्ष के 22,073 यूनिट की तुलना में 17.82% अधिक है। हालांकि कंपनी की बिक्री बढ़ी, लेकिन उसका बाजार हिस्सा घटकर 22.66% रह गया, जो एक साल पहले 23.64% था। यानी बाजार की कुल वृद्धि की तुलना में कंपनी की रफ्तार थोड़ी धीमी रही।
स्वराज डिवीजन का दमदार प्रदर्शन
महिंद्रा समूह के स्वराज डिवीजन ने शानदार प्रदर्शन किया। जनवरी 2026 में कंपनी ने 21,920 ट्रैक्टर बेचे, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 17,341 यूनिट था। 26.41% की सालाना वृद्धि के साथ इसकी बाजार हिस्सेदारी भी 18.57% से बढ़कर 19.10% हो गई।
सोनालिका (ITL) की मजबूत बढ़त
इंटरनेशनल ट्रैक्टर्स लिमिटेड (सोनालिका) ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। कंपनी ने जनवरी 2026 में 15,379 ट्रैक्टर बेचे, जो पिछले वर्ष के 12,296 यूनिट से 25.07% अधिक है। बाजार हिस्सेदारी भी बढ़कर 13.40% हो गई, जो पहले 13.17% थी।
टैफे का स्थिर विस्तार
टैफे लिमिटेड ने 13,459 यूनिट की बिक्री के साथ 24.13% की वृद्धि दर्ज की। कंपनी का बाजार हिस्सा मामूली रूप से बढ़कर 11.73% हो गया, जो पिछले साल 11.61% था।
एस्कॉर्ट्स कुबोटा की तेज रफ्तार
एस्कॉर्ट्स कुबोटा ने सबसे तेज वृद्धि दरों में से एक दर्ज की। कंपनी की बिक्री 9,133 यूनिट से बढ़कर 12,313 यूनिट हो गई, यानी 34.82% की सालाना बढ़ोतरी। बाजार हिस्सेदारी भी 9.78% से बढ़कर 10.73% हो गई, जो 0.95% की उल्लेखनीय बढ़त है।
जॉन डियर की बिक्री बढ़ी, शेयर थोड़ा घटा
जॉन डियर इंडिया ने जनवरी 2026 में 8,082 ट्रैक्टर बेचे, जो पिछले साल के 6,614 यूनिट से 22.20% अधिक है। हालांकि बिक्री में इजाफा हुआ, कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 7.08% से हल्की घटकर 7.04% रह गई।
आयशर ट्रैक्टर्स की बढ़ती हिस्सेदारी
आयशर ट्रैक्टर्स ने 31.19% की मजबूत वृद्धि दर्ज करते हुए 7,815 यूनिट बेचे। कंपनी का बाजार हिस्सा 6.38% से बढ़कर 6.81% हो गया, जो 0.43% की बढ़त दर्शाता है।
न्यू हॉलैंड (CNH इंडस्ट्रियल) का प्रभावशाली प्रदर्शन
CNH इंडस्ट्रियल (न्यू हॉलैंड) ने 34.37% की सालाना वृद्धि के साथ 5,387 ट्रैक्टरों की बिक्री की। कंपनी की बाजार हिस्सेदारी भी 4.29% से बढ़कर 4.69% हो गई।
अन्य कंपनियों की हिस्सेदारी घटी
‘अन्य’ श्रेणी की कंपनियों की बिक्री घटकर 4,398 यूनिट रह गई, जो पिछले साल 5,120 यूनिट थी। 14.10% की गिरावट के साथ इनकी बाजार हिस्सेदारी भी 5.48% से घटकर 3.83% रह गई, यानी 1.65% की बड़ी कमी।
कुल मिलाकर, जनवरी 2026 में ट्रैक्टर बाजार ने मजबूत वृद्धि दर्ज की है। एस्कॉर्ट्स कुबोटा, न्यू हॉलैंड, आयशर, स्वराज, सोनालिका और TAFE जैसी कंपनियों ने न केवल बिक्री बढ़ाई बल्कि बाजार हिस्सेदारी भी मजबूत की। वहीं, महिंद्रा और जॉन डियर की बिक्री बढ़ने के बावजूद उनका बाजार हिस्सा थोड़ा घटा। ‘अन्य’ कंपनियों की हिस्सेदारी में गिरावट से स्पष्ट है, कि ग्राहक अब स्थापित और भरोसेमंद ब्रांड्स को प्राथमिकता दे रहे हैं।
भारतीय कृषि क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ते हुए सोनालिका ट्रैक्टर्स ने 6 फरवरी को अपनी बहुप्रतीक्षित सोनालिका गोल्डन सीरीज़ को लॉन्च किया। यह लॉन्च इसलिए खास है, क्योंकि यह सीरीज खास तौर पर भारतीय किसानों की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। ज्यादा पावर, कम डीज़ल खपत और बेहतर परफॉर्मेंस के साथ यह ट्रैक्टर सीरीज़ खेती को और अधिक उत्पादक व किफायती बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। गोल्डन सीरीज़ में Sonalika DI 745 Gold और Sonalika DI 55 III Gold जैसे दमदार मॉडल शामिल हैं, जो आधुनिक तकनीक और प्रीमियम फीचर्स के साथ आते हैं। सोनालीका गोल्डन सीरीज के बारे में जानने के लिए ट्रैक्टरचॉइस के इस लेख को अंत तक पढ़ें।
सोनालीका गोल्डन सीरीज़ का डिज़ाइन पहली नज़र में ही किसानों को आकर्षित करता है। इसका Blazing Blue कलर और Gold Badging ट्रैक्टर को एक प्रीमियम और शाही पहचान देता है। Golden Glow Headlamps न केवल रात में बेहतर रोशनी प्रदान करते हैं, बल्कि ट्रैक्टर के लुक को भी खास बनाते हैं। इसके अलावा Heavy Duty Pro+ बम्पर, Strengthened FAB (Front Axle Bracket), रोबस्ट फेंडर और क्लॉ लैंप डिज़ाइन ट्रैक्टर को ज्यादा मजबूत और सुरक्षित बनाते हैं, जिससे कठिन खेत परिस्थितियों में भी बेहतरीन स्थिरता और भरोसेमंद प्रदर्शन मिलता है।
सोनालीका गोल्डन सीरीज़ में दिया गया नया E3.5 इंजन (3532 cc) इस सेगमेंट का सबसे बड़ा 3-सिलेंडर इंजन है। इसका 107 mm Bore और 131 mm Stroke Length ज्यादा टॉर्क और स्मूद परफॉर्मेंस सुनिश्चित करता है। Sonalika DI 745 Gold में 220 Nm टॉर्क दिया गया है, जबकि Sonalika DI 55 III Gold में 235 Nm टॉर्क मिलता है, जिससे भारी कृषि उपकरणों को आसानी से चलाया जा सकता है। इसके साथ ही एलिप्टिकल साइलेंसर इंजन की आवाज़ को कम करता है और ऑपरेटर को आरामदायक अनुभव देता है।
सोनालीका गोल्डन सीरीज़ में दिया गया Multi Speed Driveline (MSD) सिस्टम किसानों को हर तरह के कृषि कार्य के लिए सही स्पीड चुनने की आज़ादी देता है। इसमें 15 (12+3) और 20 (16+4) गियरबॉक्स विकल्प उपलब्ध हैं। DI 55 III Gold की स्पीड रेंज 1.8 से 34.8 किमी/घंटा है, जबकि DI 745 Gold E3.5 की स्पीड रेंज 2.3 से 35.7 किमी/घंटा तक जाती है। DI 745 Gold में दिया गया Splitter Lever और Double Clutch (IPTO) PTO ऑपरेशन को और ज्यादा आसान व स्मूद बनाते हैं।
खेती के भारी औजारों के लिए सोनालीका गोल्डन सीरीज़ पूरी ताक़त के साथ आती है। इसमें Global PTO के साथ Live 540 / Reverse / Independent Multi-Speed सहित कुल 6 PTO स्पीड्स दी गई हैं। सेगमेंट में सबसे ज्यादा 46.5 HP PTO Power के कारण रोटावेटर, बेलर और सुपर सीडर जैसे औजार आसानी से चलते हैं। Precision 5G Hydraulics के तहत DI 745 Gold में 2000 kg और DI 55 III Gold में 2200 kg की लिफ्ट क्षमता दी गई है, साथ ही फैक्ट्री-फिटेड DC वाल्व और हैवी-ड्यूटी हिच भी मिलते हैं।
लंबे समय तक काम करते समय ड्राइवर की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सोनालिका ने कई एडवांस फीचर्स दिए हैं। Ezzy Lift Bonnet with Gas Strut से मेंटेनेंस आसान हो जाता है। Ergo Steering, Ergo Deck, दोनों तरफ शिफ्ट गियर लीवर, Jetline Throttle और Next Gen Cluster ऑपरेशन को बेहद आरामदायक बनाते हैं। इसके अलावा Mobile Charger और SKY Smart Telematics जैसी स्मार्ट तकनीक से ट्रैक्टर की लोकेशन, परफॉर्मेंस और सर्विस जानकारी आसानी से मिलती है।
सोनालिका गोल्डन सीरीज़ में Standard Rear Ballast Weight, मजबूत बैक-एंड और हैवी-ड्यूटी हाइड्रोलिक लिंकिज दिए गए हैं, जो लंबे समय तक भरोसेमंद परफॉर्मेंस सुनिश्चित करते हैं। DI 55 III Gold में 16.9×28 टायर्स के साथ रियर व्हील वेट्स बेहतर ट्रैक्शन देते हैं। कंपनी इस सीरीज़ पर 6 साल की वारंटी और 400 घंटे का सर्विस इंटरवल देती है। लंबे काम के लिए पर्याप्त फ्यूल टैंक भी दिया गया है—DI 745 Gold में 55 लीटर और DI 55 III Gold में 65 लीटर। कुल मिलाकर, सोनालिका गोल्डन सीरीज़ आधुनिक खेती के लिए एक परफेक्ट और दमदार विकल्प साबित होती है।
जनवरी 2026 के खुदरा बिक्री आँकड़े भारतीय ट्रैक्टर उद्योग में तेज़ बदलाव और कड़ी प्रतिस्पर्धा की कहानी बयां करते हैं। इस वर्ष जनवरी में कुल 1,13,210 ट्रैक्टरों की बिक्री दर्ज की गई, जबकि जनवरी 2025 में यह संख्या 92,337 यूनिट्स थी। यानी साल-दर-साल (YoY) आधार पर ट्रैक्टर बाजार में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। यह बढ़ोतरी न केवल कृषि गतिविधियों में तेजी का संकेत देती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बढ़ते निवेश और किसानों के भरोसे को भी दर्शाती है।
हालांकि, कुल बाजार बढ़ा है, लेकिन सभी कंपनियों के लिए तस्वीर एक जैसी नहीं रही। कुछ ब्रांड्स ने अपनी बाजार हिस्सेदारी मजबूत की है, तो कुछ दिग्गज कंपनियों को गिरावट का सामना करना पड़ा है।
महिंद्रा एंड महिंद्रा एक बार फिर ट्रैक्टर बाजार में नंबर एक स्थान पर बनी हुई है। जनवरी 2026 में कंपनी ने 25,995 यूनिट्स की खुदरा बिक्री की, जो जनवरी 2025 के 22,072 यूनिट्स से कहीं अधिक है। इसके बावजूद, महिंद्रा की बाजार हिस्सेदारी 23.90% से घटकर 22.96% रह गई। यह संकेत देता है, कि भले ही महिंद्रा की बिक्री बढ़ी हो, लेकिन अन्य प्रतिस्पर्धी ब्रांड्स की गति इससे भी तेज रही। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और नए उत्पाद विकल्पों ने महिंद्रा की पकड़ को थोड़ा ढीला किया है, हालांकि कंपनी अब भी स्पष्ट रूप से बाजार की अगुवा बनी हुई है।
स्वराज ट्रैक्टर्स ने जनवरी 2026 में शानदार प्रदर्शन किया है। कंपनी ने 21,911 ट्रैक्टर बेचकर अपनी बाजार हिस्सेदारी 18.78% से बढ़ाकर 19.35% कर ली। यह बढ़त दर्शाती है कि स्वराज किसानों के बीच भरोसेमंद ब्रांड बना हुआ है। ग्रामीण इलाकों में स्वराज की मजबूत डीलरशिप, टिकाऊ मशीनें और सरल तकनीक इसकी लोकप्रियता के प्रमुख कारण माने जा सकते हैं। खासकर मध्यम हॉर्सपावर सेगमेंट में स्वराज की पकड़ लगातार मजबूत होती जा रही है।
तीसरे स्थान पर रही सोनालिका ने जनवरी 2026 में 15,376 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की। बाजार हिस्सेदारी 13.32% से बढ़कर 13.58% हो गई, जो कंपनी के निरंतर विस्तार को दर्शाती है। वहीं मैसी फर्ग्यूसन ने 13,460 ट्रैक्टर बेचकर अपनी हिस्सेदारी 11.74% से बढ़ाकर 11.89% कर ली। दोनों ही ब्रांड्स ने यह साबित किया है कि लगातार गुणवत्ता और किसानों की जरूरतों के अनुसार उत्पाद देने से बाजार में स्थिरता बनी रहती है।
जनवरी 2026 के आंकड़ों में एस्कॉर्ट्स सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन करने वाली कंपनियों में शामिल रही। कंपनी ने 12,311 यूनिट्स की बिक्री की, जो पिछले वर्ष के 9,136 यूनिट्स से काफी अधिक है। इसके साथ ही बाजार हिस्सेदारी 9.89% से बढ़कर 10.87% हो गई।
यह लगभग 1 प्रतिशत की YoY हिस्सेदारी बढ़त दर्शाती है, जो किसी भी बड़े ब्रांड के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। एस्कॉर्ट्स की यह सफलता नए मॉडल्स, बेहतर फाइनेंस स्कीम्स और मजबूत आफ्टर-सेल्स नेटवर्क का परिणाम मानी जा सकती है।
जॉन डियर ने जनवरी 2026 में 7,895 ट्रैक्टर बेचे, जो जनवरी 2025 के 6,488 यूनिट्स से अधिक है। इसके बावजूद, कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 7.03% से घटकर 6.97% रह गई। यह गिरावट बताती है कि जॉन डियर की बिक्री भले ही बढ़ी हो, लेकिन बाजार की कुल वृद्धि दर इससे ज्यादा तेज रही। प्रीमियम सेगमेंट पर अधिक फोकस और सीमित ग्रामीण पहुंच इसका एक कारण हो सकता है।
आयशर (Eicher) के लिए जनवरी 2026 बेहद सकारात्मक रहा। कंपनी ने 7,814 यूनिट्स की बिक्री के साथ अपनी बाजार हिस्सेदारी 6.45% से बढ़ाकर 6.90% कर ली। यह दर्शाता है कि आयशर धीरे-धीरे अपने पैर मजबूत कर रहा है।
वहीं न्यू हॉलैंड (New Holland) ने 5,336 ट्रैक्टर बेचकर अपनी हिस्सेदारी 4.30% से बढ़ाकर 4.71% कर ली। दोनों ब्रांड्स ने यह साबित किया है कि निरंतर सुधार और क्षेत्रीय रणनीति से बाजार में जगह बनाई जा सकती है।
जनवरी 2026 का सबसे बड़ा सरप्राइज ट्रैकस्टार रहा। कंपनी ने 697 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की, जो जनवरी 2025 के 397 यूनिट्स की तुलना में 75.57% की जबरदस्त वृद्धि है।
हालांकि, कुल बाजार हिस्सेदारी अभी सिर्फ 0.62% है, लेकिन इतनी तेज़ ग्रोथ यह साफ संकेत देती है कि छोटे और किफायती ट्रैक्टर सेगमेंट में ट्रैकस्टार तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। सीमांत और छोटे किसानों के लिए यह ब्रांड एक मजबूत विकल्प बनता जा रहा है।
कुबोटा के लिए यह महीना निराशाजनक रहा। बिक्री 1,628 यूनिट्स से गिरकर 184 यूनिट्स पर आ गई, और बाजार हिस्सेदारी में 1.60% की भारी गिरावट दर्ज की गई। वहीं कैप्टन, प्रीत और एसीई जैसे ब्रांड्स को भी हल्की गिरावट का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर एसडीएफ ने भले ही कम संख्या में बिक्री की हो, लेकिन हिस्सेदारी में सकारात्मक बढ़त दर्ज की है।
जनवरी 2026 के ट्रैक्टर बिक्री आंकड़े यह साफ दिखाते हैं कि भारतीय ट्रैक्टर बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही तीव्र हो चुकी है। जहां बड़े ब्रांड्स को अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए नई रणनीतियों की जरूरत है, वहीं छोटे और उभरते ब्रांड्स नए अवसरों का लाभ उठाते नजर आ रहे हैं।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन-सी कंपनियां इस रफ्तार को बनाए रख पाती हैं और कौन बाजार की इस दौड़ में पीछे छूट जाती हैं।
भारत और अमेरिका के बीच होने वाली व्यापारिक डील (Trade Deal) का सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ना तय है। खासकर मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों पर, क्योंकि अमेरिका इन दोनों फसलों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। भारत में भी मक्का और सोयाबीन लाखों किसानों की आय का मुख्य स्रोत हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है, कि भारत-अमेरिका डील से भारतीय मक्का और सोयाबीन किसानों को फायदा होगा या नुकसान।
भारत और अमेरिका की कृषि संरचना में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। अमेरिका आधुनिक तकनीक, बड़े आकार के फार्म, उन्नत बीज, मशीनरी और मजबूत सरकारी सब्सिडी व बीमा व्यवस्था के कारण मक्का और सोयाबीन का कम लागत में बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है और इनका निर्यात भी करता है। इसके विपरीत भारत में मक्का और सोयाबीन मुख्यतः छोटे और मध्यम किसान उगाते हैं, जहां खेती मानसून पर निर्भर रहती है, तकनीक और संसाधन सीमित होते हैं तथा किसान काफी हद तक MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर निर्भर रहते हैं। इसी कारण भारत में उत्पादन लागत अधिक और पैदावार अपेक्षाकृत कम रहती है।
यदि भारत–अमेरिका डील के तहत सस्ते अमेरिकी मक्का का आयात बढ़ता है, तो इसका सीधा असर भारतीय मक्का किसानों पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी मक्का सस्ता होने के कारण घरेलू मंडियों में कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे MSP से नीचे बिक्री का खतरा बढ़ेगा और छोटे किसानों की आय पर दबाव पड़ेगा। हालांकि, दूसरी ओर पशु आहार और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को सस्ता कच्चा माल मिलने से कुछ हद तक लाभ हो सकता है।
अगर डील के अंतर्गत भारत को विशेष शर्तों पर मक्का निर्यात का अवसर मिलता है, तो यह किसानों के लिए सकारात्मक हो सकता है। लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करना, बेहतर भंडारण व्यवस्था और मजबूत लॉजिस्टिक्स जरूरी होंगे। फिलहाल इन क्षेत्रों में भारत अमेरिका की तुलना में कमजोर है, जो एक बड़ी चुनौती है।
सस्ते आयात से स्टार्च, एथेनॉल और पोल्ट्री फीड जैसे मक्का आधारित उद्योगों को लाभ हो सकता है। लेकिन किसानों को इसका वास्तविक फायदा तभी मिलेगा जब सरकार MSP और सरकारी खरीद व्यवस्था को मजबूत करे और किसानों को इन उद्योगों की मूल्य श्रृंखला से जोड़े।
सोयाबीन के मामले में यह डील भारतीय किसानों के लिए और भी संवेदनशील साबित हो सकती है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक और निर्यातक है। यदि आयात शुल्क कम किया गया, तो घरेलू बाजार में सोयाबीन की कीमतों पर दबाव पड़ेगा, जिससे MSP पर सरकारी खरीद का दबाव बढ़ेगा और मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व राजस्थान जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों के किसानों पर सीधा असर पड़ेगा।
भारत पहले से ही खाद्य तेलों के आयात पर काफी निर्भर है। सस्ते अमेरिकी सोयाबीन या सोया तेल के आयात से उपभोक्ताओं को तो राहत मिल सकती है, लेकिन घरेलू सोयाबीन किसानों को नुकसान होगा और तेल मिलों की आयात निर्भरता और बढ़ जाएगी।
सोयाबीन से बनने वाला सोया मील पशु आहार का एक महत्वपूर्ण घटक है। यदि कच्चा माल सस्ता होता है तो उद्योग को फायदा होगा, लेकिन किसानों को इसका लाभ तभी मिलेगा जब उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त हो।
जोखिमों के बावजूद, भारत–अमेरिका सहयोग से किसानों को कुछ फायदे भी मिल सकते हैं। बेहतर बीज, नई तकनीक और आधुनिक खेती पद्धतियां भारत में आ सकती हैं। फूड प्रोसेसिंग, एथेनॉल और पशु आहार उद्योग में निवेश बढ़ने से लंबे समय में उत्पादकता बढ़ने की संभावना है, बशर्ते सरकार प्रशिक्षण और सब्सिडी के जरिए किसानों को तैयार करे।
किसानों की प्रमुख चिंताओं में MSP की कानूनी गारंटी का अभाव, आयात बढ़ने से बाजार कीमतों में अस्थिरता, छोटे किसानों की कम प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और भंडारण व मार्केटिंग की कमजोर व्यवस्था शामिल हैं।
यदि भारत–अमेरिका डील होती है, तो सरकार की भूमिका निर्णायक होगी। सरकार को MSP पर प्रभावी खरीद सुनिश्चित करनी होगी, आयात पर संतुलित नीति अपनानी होगी, किसानों को तकनीक, बेहतर बीज और सिंचाई सहायता देनी होगी तथा मक्का और सोयाबीन आधारित उद्योगों से किसानों को सीधे जोड़ना होगा, ताकि इस डील का लाभ केवल उद्योगों तक सीमित न रहकर किसानों तक भी पहुंचे।
भारत-अमेरिका डील का मक्का और सोयाबीन किसानों पर मिला-जुला प्रभाव पड़ेगा। जहां एक ओर सस्ता आयात किसानों के लिए खतरा बन सकता है, वहीं दूसरी ओर तकनीक, निवेश और उद्योगों के विकास से अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
असल सवाल यह है, कि सरकार किसानों के हितों की रक्षा कैसे करती है। अगर सही नीतियां अपनाई गईं, तो यह डील किसानों के लिए अवसर बन सकती है, लेकिन अगर आयात को बिना सुरक्षा के खोल दिया गया, तो मक्का और सोयाबीन किसानों की आय पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत और अमेरिका के बीच हुआ नया व्यापार समझौता भारतीय कृषि और मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकता है। इस समझौते के तहत अमेरिकी बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों पर लगने वाला टैरिफ 50% प्रतिशत से घटाकर 18% प्रतिशत कर दिया गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारतीय किसान लंबे समय से निर्यात के बेहतर अवसरों की तलाश में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इस समझौते की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे दोनों देशों के लिए लाभकारी बताया। इस डील से किसानों को वैश्विक बाजार से सीधे जुड़ने का अवसर मिलेगा और उनकी आमदनी बढ़ने की संभावनाएं मजबूत होंगी।
टैरिफ में भारी कटौती के बाद अब अमेरिकी बाजार भारतीय कृषि उत्पादों के लिए पहले से कहीं ज्यादा खुला हो गया है। चावल, मसाले, दालें, फल और प्रोसेस्ड फूड जैसे उत्पाद अब कम कीमत पर अमेरिका पहुंच सकेंगे। इससे न सिर्फ इन उत्पादों की मांग बढ़ेगी, बल्कि भारतीय ब्रांड्स की मौजूदगी भी मजबूत होगी। अब किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए केवल घरेलू मंडियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। निर्यात बढ़ने से फसलों के बेहतर दाम मिलने की उम्मीद है, खासकर उन किसानों को जो पहले से ही एक्सपोर्ट क्वालिटी उत्पादन कर रहे हैं।
इस व्यापार समझौते का सीधा फायदा किसानों की आय पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच बढ़ने से फसलों की मांग स्थिर रहेगी और कीमतों में उतार-चढ़ाव कम होगा। इससे किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी। खासतौर पर वे किसान जो ऑर्गेनिक खेती, प्रोसेस्ड फूड या विशेष किस्मों की फसलें उगाते हैं, उन्हें बड़ा फायदा मिल सकता है। यह समझौता किसानों को वैश्विक मानकों के अनुसार उत्पादन के लिए भी प्रेरित करेगा, जिससे कृषि क्षेत्र में आधुनिकता आएगी।
इस समझौते का सबसे बड़ा असर मत्स्य पालन और झींगा निर्यात पर देखने को मिल सकता है। भारत पहले से ही झींगा निर्यात करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों में लाखों किसान इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। पहले 50 प्रतिशत टैरिफ के कारण भारतीय झींगा अमेरिकी बाजार में महंगा पड़ता था, जिससे किसानों को नुकसान होता था। अब टैरिफ घटने से भारतीय झींगा अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा और अमेरिका में इसकी मांग बढ़ने की पूरी संभावना है।
निर्यात बढ़ने का फायदा केवल बड़े निर्यातकों तक सीमित नहीं रहेगा। मत्स्य पालन और कृषि से जुड़े लाखों छोटे किसान, मजदूर, महिलाएं और ग्रामीण युवा इससे लाभान्वित होंगे। अगर अमेरिका से ऑर्डर बढ़ते हैं, तो हैचरी, फीड सप्लाई, प्रोसेसिंग यूनिट, पैकेजिंग और कोल्ड स्टोरेज जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और गांवों से शहरों की ओर पलायन पर भी कुछ हद तक रोक लग सकती है।
हालांकि, इस समझौते से मौके बड़े हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अमेरिकी बाजार में प्रवेश के लिए सख्त गुणवत्ता मानक, फूड सेफ्टी नियम और ट्रेसबिलिटी सिस्टम का पालन करना जरूरी होगा। किसानों और मछली पालकों को अब ज्यादा वैज्ञानिक और आधुनिक तरीकों को अपनाना पड़ेगा। अच्छी बात यह है कि इस समझौते के साथ अमेरिका से नई तकनीक, आधुनिक मशीनें और बेहतर प्रोसेसिंग सिस्टम भारत आने का रास्ता भी खुलेगा, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और क्षमता दोनों में सुधार हो सकता है।
अगर अमेरिका भारत पर 50% प्रतिशत तक भारी टैरिफ लगाता, तो इसका असर बेहद नकारात्मक होता। इतनी ऊंची दर पर भारतीय कृषि उत्पाद और झींगा अमेरिकी बाजार में बहुत महंगे हो जाते। इसके चलते अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों से आयात करना शुरू कर देते और भारतीय निर्यात में भारी गिरावट आती। घरेलू बाजार में अधिक सप्लाई होने से कीमतें गिरतीं और किसानों को दोहरा नुकसान झेलना पड़ता। खासकर झींगा किसानों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक होती, क्योंकि उनकी उत्पादन लागत ज्यादा होती है। ऐसे में मौजूदा समझौता भारतीय किसानों के लिए एक बड़ी राहत और नई उम्मीद बनकर सामने आया है।
एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड एक सुप्रसिद्ध कृषि उपकरण निर्माता ब्रांड है। जनवरी 2026 एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड के लिए ट्रैक्टर कारोबार के लिहाज से बेहद यादगार रहा। कंपनी के एग्री मशीनरी बिजनेस ने इस महीने ज़बरदस्त रफ्तार पकड़ी और कुल 9,799 ट्रैक्टरों की डिलीवरी के साथ मजबूत ग्रोथ दर्ज की। पिछले साल जनवरी में जहां बिक्री 6,669 यूनिट्स पर थी, वहीं इस बार इसमें करीब 47% फीसद की छलांग देखने को मिली। गांवों में बढ़ती खरीदारी, खेतों में तेज़ होती गतिविधियां और अनुकूल ग्रामीण माहौल इस उछाल की बड़ी वजह बने।
देश के भीतर एस्कॉर्ट्स कुबोटा की पकड़ जनवरी 2026 में और मजबूत होती नज़र आई। कंपनी ने घरेलू बाजार में 9,137 ट्रैक्टरों की बिक्री की, जबकि एक साल पहले यही आंकड़ा 6,058 यूनिट्स था। यानी भारतीय बाजार में बिक्री 50% से भी ज्यादा बढ़ी। रबी सीजन की अच्छी शुरुआत, किसानों की आय में सुधार और कृषि क्षेत्र को मिल रहे प्रोत्साहन ने इस ग्रोथ को मजबूती दी।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी कंपनी का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। जनवरी 2026 के दौरान 662 ट्रैक्टरों का निर्यात किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.3% अधिक है। भले ही निर्यात की गति घरेलू बिक्री जितनी तेज न रही हो, लेकिन वैश्विक स्तर पर स्थिर मांग ने निरंतरता बनाए रखी।
चालू वित्त वर्ष 2026 में अप्रैल से जनवरी के बीच एस्कॉर्ट्स कुबोटा ने कुल 1.11 लाख से अधिक ट्रैक्टर बेचे। यह आंकड़ा पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में 16% से ज्यादा की बढ़ोतरी को दर्शाता है। इससे साफ है कि कंपनी की बिक्री पूरे साल स्थिर गति से आगे बढ़ी है।
FY26 के पहले दस महीनों में घरेलू बाजार में कंपनी ने 1.05 लाख से ज्यादा ट्रैक्टर बेचे, जो सालाना आधार पर 15% की वृद्धि है। वहीं दूसरी ओर, निर्यात कारोबार ने और तेज़ी दिखाई। इस अवधि में निर्यात बिक्री 5,525 यूनिट्स तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 47% ज्यादा है। यह संकेत देता है कि कंपनी वैश्विक बाजारों में भी अपनी स्थिति मजबूत कर रही है।
एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड भारत के प्रमुख इंजीनियरिंग समूहों में से एक है, जिसे आठ दशक से अधिक का विनिर्माण अनुभव प्राप्त है। कंपनी कृषि मशीनरी और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए देश के कृषि और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। आधुनिक तकनीक, बेहतर गुणवत्ता और किफायती समाधानों पर कंपनी का फोकस उसे दीर्घकालिक विकास की राह पर आगे बढ़ा रहा है।
ट्रैक्टरचॉइस प्लेटफॉर्म के जरिए किसानों और ट्रैक्टर खरीदारों को खेती से जुड़ी हर जरूरी जानकारी मिलती रहती है। यहां नए ट्रैक्टर मॉडल, उनके फीचर्स और खेतों में उपयोग से जुड़ी ताज़ा अपडेट्स एक ही जगह उपलब्ध कराई जाती हैं।
किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को अधिक लाभकारी बनाने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश सरकार लगातार आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर जोर दे रही है। इसी दिशा में राज्य सरकार ने सूक्ष्म सिंचाई के साथ सेंसर आधारित ऑटोमेशन फर्टिगेशन प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए एक नई योजना शुरू की है। यह योजना खेती को पारंपरिक तरीकों से आगे ले जाकर वैज्ञानिक और तकनीक-आधारित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। सरकार का मानना है कि इस तकनीक के माध्यम से पानी, खाद और श्रम—तीनों की बचत होगी, जिससे किसानों की लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा।
भोपाल स्थित प्रमुख उद्यान (गुलाब गार्डन) में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री नारायण सिंह कुशवाह ने इस योजना की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उद्यानिकी फसलों में सेंसर आधारित ऑटोमेशन फर्टिगेशन प्रणाली बेहद कारगर साबित हो रही है। यह तकनीक फसल की वास्तविक जरूरतों के अनुसार सिंचाई और खाद प्रबंधन सुनिश्चित करती है, जिससे उत्पादन में स्थिरता और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है। मंत्री ने इसे किसानों के लिए “खेती का भविष्य” बताया।
मंत्री कुशवाह ने अपने संबोधन में कहा कि मध्य प्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है और किसानों का सशक्तिकरण राज्य के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है। सीमित जल संसाधन, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती उत्पादन लागत आज खेती की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में आधुनिक तकनीकों को अपनाना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है। सेंसर आधारित सिंचाई प्रणाली न केवल पानी और उर्वरक की बचत करती है, बल्कि फसल को सही समय पर सही मात्रा में पोषण देकर उसकी उत्पादकता भी बढ़ाती है।
यह प्रणाली पूरी तरह से स्मार्ट तकनीक पर आधारित है। खेत में लगाए गए सेंसर मिट्टी की नमी, तापमान और वातावरण की स्थिति पर लगातार नजर रखते हैं। जैसे ही मिट्टी में नमी तय स्तर से कम होती है, सिस्टम अपने आप सिंचाई शुरू कर देता है। इसी तरह फर्टिगेशन यानी सिंचाई के साथ खाद देने की प्रक्रिया भी स्वचालित होती है। पौधों को उतनी ही मात्रा में उर्वरक दिया जाता है, जितनी उन्हें वास्तव में आवश्यकता होती है। इससे खाद की बर्बादी रुकती है और मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बनी रहती है।
इस आधुनिक प्रणाली से किसानों को कई स्तरों पर लाभ मिलता है। सटीक सिंचाई से पानी की खपत में उल्लेखनीय कमी आती है और फसल को जरूरत के अनुसार नमी मिलती है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन से उत्पादन बढ़ता है और फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है। ऑटोमेशन के कारण श्रम की आवश्यकता कम हो जाती है, जिससे मजदूरी लागत घटती है। साथ ही, नियंत्रित सिंचाई के कारण खरपतवार भी कम पनपते हैं। कुल मिलाकर यह तकनीक खेती को अधिक टिकाऊ, कम लागत वाली और लाभकारी बनाती है।
सरकार इस योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पूरे प्रदेश में लागू कर रही है। सेंसर आधारित ऑटोमेशन फर्टिगेशन प्रणाली की एक यूनिट की लागत लगभग 4 लाख रुपये निर्धारित की गई है। इस पर किसानों को 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाएगा, यानी अधिकतम 2 लाख रुपये की सब्सिडी मिलेगी। योजना का लाभ वही किसान उठा सकते हैं, जिनके पास उद्यानिकी फसलों के लिए न्यूनतम 0.250 हेक्टेयर भूमि है। यह योजना एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) के अंतर्गत संचालित की जा रही है।
उद्यानिकी आयुक्त अरविंद दुबे के अनुसार, प्रदेश में 715 चयनित किसानों के खेतों में इस प्रणाली को स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक 597 किसानों के आवेदन विभागीय पोर्टल पर प्राप्त हो चुके हैं। शेष पात्र किसानों को योजना से जोड़ने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। कार्यशाला में अधिकारियों से आग्रह किया गया कि वे किसानों को समय पर मार्गदर्शन दें और आवेदन प्रक्रिया शीघ्र पूरी कराएं। साथ ही, तकनीकी सहायता तुरंत उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया ताकि किसान बिना देरी के इस आधुनिक तकनीक का लाभ उठा सकें।
वीएसटी (VST) ने जनवरी 2026 के लिए अपनी बिक्री रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कंपनी के पावर टिलर और ट्रैक्टर सेगमेंट में शानदार वृद्धि देखने को मिली है। जनवरी 2026 में वीएसटी ने कुल 5,257 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की, जबकि जनवरी 2025 में यह आंकड़ा 3,416 यूनिट्स था। इस तरह कंपनी की कुल बिक्री में 53.9% प्रतिशत की प्रभावशाली बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह प्रदर्शन भारतीय कृषि क्षेत्र में मशीनरी की बढ़ती मांग और छोटे किसानों के बीच आधुनिक उपकरणों को अपनाने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
जनवरी 2026 के दौरान वीएसटी की पावर टिलर बिक्री ने कंपनी के कुल वॉल्यूम में सबसे बड़ा योगदान दिया। इस महीने 4,810 पावर टिलर बेचे गए, जबकि जनवरी 2025 में यह संख्या 3,105 यूनिट्स थी। इस प्रकार पावर टिलर की बिक्री में 54.9 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। छोटे और मध्यम जोत वाले किसानों के लिए पावर टिलर एक किफायती और उपयोगी समाधान साबित हो रहे हैं, जिससे खेतों की उत्पादकता बढ़ रही है और श्रम लागत कम हो रही है।
वीएसटी के ट्रैक्टर सेगमेंट ने भी जनवरी 2026 में बेहतर प्रदर्शन किया। कंपनी ने इस महीने 447 ट्रैक्टर बेचे, जबकि पिछले साल जनवरी में 311 यूनिट्स की बिक्री हुई थी। यह ट्रैक्टर बिक्री में 43.7 प्रतिशत की सालाना वृद्धि को दर्शाता है। हालांकि ट्रैक्टर का वॉल्यूम पावर टिलर की तुलना में कम है, लेकिन यह संकेत देता है कि किसान धीरे-धीरे वीएसटी के ट्रैक्टर उत्पादों पर भी भरोसा जता रहे हैं।
अगर पूरे वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026) की बात करें, तो वीएसटी का प्रदर्शन बेहद मजबूत रहा है। इस अवधि में कंपनी ने कुल 46,868 यूनिट्स की बिक्री की, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 31,432 यूनिट्स था। यानी कुल बिक्री वॉल्यूम में 49.1 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़े बताते हैं कि कंपनी की ग्रोथ केवल एक महीने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष में लगातार बनी हुई है।
अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच वीएसटी की पावर टिलर बिक्री ने नया रिकॉर्ड बनाया। इस अवधि में कंपनी ने 42,184 पावर टिलर बेचे, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 27,124 यूनिट्स की बिक्री हुई थी। इस तरह पावर टिलर सेगमेंट में 55.5 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई। यह दर्शाता है कि भारत में छोटे खेतों और सब्जी उत्पादन जैसे क्षेत्रों में पावर टिलर की उपयोगिता तेजी से बढ़ रही है।
वित्त वर्ष 2026 की YTD अवधि में वीएसटी की ट्रैक्टर बिक्री 4,684 यूनिट्स रही, जबकि वित्त वर्ष 2025 की समान अवधि में यह 4,308 यूनिट्स थी। इस प्रकार ट्रैक्टर बिक्री में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी जरूर है, लेकिन यह बताती है कि ट्रैक्टर सेगमेंट में भी कंपनी धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत कर रही है और भविष्य में इसमें और सुधार की संभावना है।
वीएसटी (VST) भारत की एक प्रमुख कृषि मशीनरी कंपनी है, जो विशेष रूप से पावर टिलर और ट्रैक्टर निर्माण के लिए जानी जाती है। कंपनी छोटे और मध्यम किसानों के लिए आधुनिक, किफायती और भरोसेमंद कृषि उपकरण उपलब्ध कराती है। वीएसटी के पावर टिलर पूरे देश में किसानों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। कंपनी का उद्देश्य किसानों की उत्पादकता बढ़ाना, खेती को आसान बनाना और कृषि कार्यों में यंत्रीकरण को बढ़ावा देना है। जनवरी 2026 और YTD बिक्री आंकड़े यह संकेत देते हैं कि आने वाले महीनों में भी वीएसटी की ग्रोथ मजबूत बनी रह सकती है।
महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट बिजनेस (FEB) ने जनवरी 2026 के लिए अपने ट्रैक्टर बिक्री आंकड़े जारी किए हैं, जो कंपनी के लिए बेहद उत्साहजनक साबित हुए हैं। महिंद्रा ग्रुप की इस प्रमुख इकाई ने जनवरी 2026 में कुल 40,643 ट्रैक्टरों की बिक्री दर्ज की। यह आंकड़ा जनवरी 2025 में बेची गई 27,557 यूनिट्स की तुलना में 47% प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है। यह प्रदर्शन भारतीय कृषि क्षेत्र में बढ़ती मांग, बेहतर ग्रामीण परिस्थितियों और किसानों के बढ़ते भरोसे को साफ तौर पर दर्शाता है।
जनवरी 2026 के दौरान महिंद्रा ट्रैक्टर ने घरेलू बाजार में शानदार प्रदर्शन किया। कंपनी ने इस महीने 38,484 ट्रैक्टर भारत में बेचे, जबकि जनवरी 2025 में यह आंकड़ा 26,305 यूनिट्स था। इस तरह घरेलू बिक्री में 46% प्रतिशत की मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई। अच्छे मानसून, जलाशयों में पर्याप्त पानी और मजबूत रबी फसलों की बुवाई ने किसानों को नई कृषि मशीनरी में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया है, जिसका सीधा लाभ महिंद्रा को मिला है।
महिंद्रा ट्रैक्टर ने न केवल घरेलू बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी जबरदस्त प्रदर्शन किया है। जनवरी 2026 में कंपनी ने 2,159 ट्रैक्टरों का निर्यात किया, जबकि पिछले साल इसी महीने यह संख्या 1,252 यूनिट्स थी। इस प्रकार निर्यात में 72% प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि अफ्रीका, एशिया और अन्य उभरते कृषि बाजारों में महिंद्रा ब्रांड की मजबूत पकड़ और विश्वसनीयता को दर्शाती है।
अगर पूरे वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026) के आंकड़ों पर नजर डालें, तो महिंद्रा का प्रदर्शन लगातार मजबूत बना हुआ है। इस अवधि में कंपनी ने कुल 4,47,235 ट्रैक्टरों की बिक्री की, जबकि वित्त वर्ष 2025 की समान अवधि में यह आंकड़ा 3,64,180 यूनिट्स था। यानी कुल बिक्री में 23% प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो स्थिर और टिकाऊ मांग को दर्शाती है।
अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच महिंद्रा की घरेलू ट्रैक्टर बिक्री 4,30,374 यूनिट रही, जो पिछले वर्ष इसी अवधि की 3,50,632 यूनिट्स से काफी अधिक है। घरेलू बिक्री में 23% प्रतिशत की बढ़ोतरी ने कुल बिक्री में सबसे बड़ा योगदान दिया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार, कृषि आय में बढ़ोतरी और सरकारी योजनाओं के प्रभाव से किसानों का रुझान ट्रैक्टर खरीद की ओर लगातार बढ़ा है।
YTD अवधि में महिंद्रा की निर्यात बिक्री भी मजबूत रही। अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच कंपनी ने 16,861 ट्रैक्टरों का निर्यात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 13,548 यूनिट्स था। इस तरह निर्यात में 24% प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह संकेत देता है, कि वैश्विक स्तर पर महिंद्रा के ट्रैक्टर गुणवत्ता, तकनीक और किफायती कीमत के कारण पसंद किए जा रहे हैं।
महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट बिजनेस के प्रेसिडेंट वीजय नाकरा ने बिक्री प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जनवरी 2026 में घरेलू बाजार में 46% प्रतिशत की वृद्धि कंपनी के लिए उत्साहजनक है। उन्होंने बताया कि अच्छे जलाशय स्तरों के कारण रबी बुवाई मजबूत रही है और आने वाले महीनों में सरकारी समर्थन तथा ग्रामीण खर्च में बढ़ोतरी से कृषि और फार्म मशीनीकरण को और बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, निर्यात बाजारों में 72% प्रतिशत की वृद्धि महिंद्रा के वैश्विक विस्तार की दिशा में एक मजबूत संकेत है।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार, 1 फरवरी 2026 को केंद्रीय बजट 2026 पेश किया। यह बजट 1 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाले वित्तीय वर्ष की दिशा तय करता है। इस बजट में एक बार फिर खेती और ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखा गया है, ताकि किसानों की आय बढ़े, रोजगार के अवसर पैदा हों और उन्हें स्थायी समर्थन मिल सके।
वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि कृषि से जुड़ी हर योजना का सीधा लाभ किसानों और ग्रामीण परिवारों तक पहुँचे। नए सुधारों का उद्देश्य कृषि से जुड़े कार्यों में रोजगार बढ़ाना, फसल उत्पादन में सुधार करना और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाना है। इन प्रयासों से कृषि क्षेत्र में लगभग 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और कई क्षेत्रों में ग्रामीण गरीबी घटी है।
बजट भाषण में वैश्विक चुनौतियों का भी जिक्र किया गया जो भारतीय कृषि को प्रभावित कर रही हैं। इनमें कृषि निर्यात में कमजोरी, बीज और उर्वरक की आपूर्ति में दिक्कतें और सप्लाई चेन में रुकावटें शामिल हैं। साथ ही, प्रिसिजन फार्मिंग और एआई जैसे नए तरीके खेती को बदल रहे हैं, जबकि पानी, ऊर्जा और खनिजों की मांग भी बढ़ रही है।
कृषि को विकास का प्रमुख इंजन मानते हुए सरकार ने इसके लिए बजट समर्थन बढ़ाया है। कृषि और किसान कल्याण विभाग का बजट 2013–14 में ₹21,933.50 करोड़ से बढ़कर 2025–26 में ₹1,27,290.16 करोड़ हो गया है। पीएलएफएस 2023–24 के अनुसार, भारत की लगभग 46.1 प्रतिशत कार्यशील आबादी अब भी खेती और इससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है।
बजट 2026 की एक अहम घोषणा बहुभाषी एआई आधारित कृषि टूल है। यह टूल किसानों को फसल योजना, मौसम की जानकारी, कीट नियंत्रण और बाजार भाव से जुड़ी जानकारी देगा। यह क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध होगा, जिससे किसान समय पर सही फैसले ले सकेंगे।
सरकार ने नारियल, चंदन और अखरोट जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों के लिए विशेष समर्थन की घोषणा की है। चंदन प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर संरक्षण, नियोजित खेती और बेहतर बाजार संपर्क पर काम किया जाएगा। इससे किसानों की आय बढ़ने और वन आधारित समुदायों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
नारियल के लिए एक नई प्रोत्साहन योजना लाई गई है, जिसके तहत पुराने या कम उत्पादन वाले पेड़ों को नए पौधों से बदला जाएगा। प्रमुख नारियल उत्पादक राज्यों में यह योजना लागू होगी। इसके अलावा काजू और कोको के लिए अलग-अलग कार्यक्रम घोषित किए गए हैं, जिनका लक्ष्य आयात घटाना, प्रसंस्करण बढ़ाना और 2030 तक निर्यात को मजबूत करना है।
पशुपालन क्षेत्र में क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी योजना का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही पशुपालक किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को समर्थन दिया जाएगा। इन कदमों से ऋण तक आसान पहुँच, सामूहिक खेती को बढ़ावा और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
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