उर्वरक उत्पादन में भारी गिरावट, जैविक खेती बनी किसानों के हित का विकल्प

By: Tractor Choice
Published on: 25-Apr-2026
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उर्वरक संकट की वजह

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन में आई रुकावटों का असर अब भारतीय कृषि व्यवस्था पर भी गहराई से दिखाई देने लगा है। देश में जहां एक तरफ खेती का क्षेत्रफल बढ़ रहा है और उत्पादन की मांग भी लगातार ऊंची बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता में कमी किसानों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। उर्वरक उत्पादन में आई गिरावट ने खेती की लागत और भविष्य की फसल दोनों को अनिश्चितता के घेरे में डाल दिया है।

कोर सेक्टर रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने इस संकट को और स्पष्ट कर दिया है। कोर सेक्टर इंडेक्स, जो देश के आठ प्रमुख उद्योगों की स्थिति को दर्शाता है, उसमें मार्च 2026 में 0.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट पिछले डेढ़ साल में सबसे कमजोर प्रदर्शन मानी जा रही है। खास बात यह रही कि यदि उर्वरक क्षेत्र को इस सूचकांक से अलग कर दिया जाए, तो कोई गिरावट देखने को नहीं मिलती। इससे यह साफ हो जाता है कि मौजूदा गिरावट में सबसे बड़ा योगदान उर्वरक उद्योग का ही है।

चार प्रमुख क्षेत्रों पर दबाव

उर्वरक उत्पादन में गिरावट अकेली समस्या नहीं है, बल्कि इसके साथ-साथ कच्चे तेल, कोयला और बिजली जैसे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी उत्पादन घटा है। इन चारों सेक्टरों का देश की अर्थव्यवस्था और कृषि से सीधा संबंध है। वैश्विक परिस्थितियों के चलते इन क्षेत्रों में कच्चे माल की उपलब्धता और उत्पादन लागत दोनों प्रभावित हुए हैं। हालांकि, सबसे अधिक गिरावट उर्वरक उत्पादन में ही दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 24.6 प्रतिशत कम रही।

आंकड़ों में उभरती गंभीर तस्वीर

मार्च 2026 में उर्वरक उत्पादन सूचकांक घटकर 95.7 पर आ गया, जो पिछले पांच वर्षों का सबसे निचला स्तर है। यह गिरावट ऐसे समय पर सामने आई है, जब देश में नई फसलों की बुवाई की तैयारियां शुरू हो रही हैं और उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो किसानों को उर्वरकों की कमी के साथ-साथ बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ सकता है।

आयात पर बढ़ती निर्भरता

भारत पहले से ही अपनी कुल उर्वरक जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। वर्तमान में लगभग 27 प्रतिशत उर्वरक विदेशों से मंगाए जाते हैं। घरेलू उत्पादन में आई गिरावट के कारण यह निर्भरता और बढ़ सकती है। हालांकि सरकार इस स्थिति को संतुलित करने के लिए आयात बढ़ाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चितता इस समाधान को भी चुनौतीपूर्ण बना सकती है।

गैस सप्लाई की भूमिका और सुधार की उम्मीद

उर्वरक उत्पादन में गिरावट का एक अहम कारण प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में कमी भी रही है। उर्वरक उत्पादन के लिए गैस एक महत्वपूर्ण कच्चा माल और ऊर्जा स्रोत दोनों होती है। पहले गैस आपूर्ति को घटाकर 70 प्रतिशत कर दिया गया था, जिससे उत्पादन प्रभावित हुआ। अब इसे बढ़ाकर 95 प्रतिशत कर दिया गया है, जिससे आने वाले महीनों में उत्पादन में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है। यदि यह आपूर्ति स्थिर रहती है, तो स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो सकती है।

उर्वरक की कीमतों में वृद्धि की संभावना

उर्वरक उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत की गिरावट का सीधा असर किसानों पर पड़ने वाला है। बाजार में सप्लाई कम होने से कीमतों में वृद्धि की संभावना बढ़ जाती है, जिससे खेती की लागत में इजाफा होता है। छोटे और सीमांत किसान, जो पहले ही आर्थिक दबाव झेल रहे हैं, इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा, उर्वरकों की कमी से फसल की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है, जिससे आय में कमी की आशंका बढ़ जाती है।

सरकार का जैविक खेती को प्रोत्साहन

इन चुनौतियों के बीच सरकार और कृषि विशेषज्ञ अब किसानों को जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जैविक खेती में रासायनिक उर्वरकों की जगह प्राकृतिक खाद और पारंपरिक तरीकों का उपयोग किया जाता है। इससे न केवल लागत में कमी आती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण संतुलन भी बेहतर होता है। लंबे समय में यह खेती का अधिक टिकाऊ और लाभदायक तरीका साबित हो सकता है।

भविष्य की राह और समाधान

मौजूदा परिस्थितियों ने यह स्पष्ट कर दिया है, कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। सरकार द्वारा गैस आपूर्ति बढ़ाने और आयात के जरिए स्थिति को संभालने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन स्थायी समाधान के लिए खेती के तरीकों में बदलाव जरूरी है। जैविक खेती, मिश्रित कृषि और स्थानीय संसाधनों के उपयोग जैसे विकल्प किसानों को न केवल मौजूदा संकट से उबार सकते हैं, बल्कि भविष्य में भी उन्हें अधिक आत्मनिर्भर बना सकते हैं।

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प्रश्नोत्तरी

प्रश्न: उर्वरक उत्पादन में गिरावट का मुख्य कारण क्या है ?

उत्तर: अंतरराष्ट्रीय संकट, सप्लाई चेन बाधाएं और प्राकृतिक गैस आपूर्ति में कमी से उर्वरक उत्पादन प्रभावित हुआ है।

प्रश्न: कोर सेक्टर इंडेक्स में गिरावट क्यों आई ?

उत्तर: उर्वरक, कोयला, कच्चा तेल और बिजली उत्पादन में कमी के कारण कोर सेक्टर इंडेक्स में गिरावट दर्ज की गई।

प्रश्न: किसानों पर उर्वरक कमी का क्या असर पड़ेगा ?

उत्तर: उर्वरक कमी से खेती की लागत बढ़ेगी, उत्पादन घट सकता है और किसानों की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

प्रश्न: भारत कितना उर्वरक आयात करता है?

उत्तर: भारत अपनी कुल उर्वरक जरूरतों का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है।

प्रश्न: जैविक खेती को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है ?

उत्तर: जैविक खेती लागत घटाती है, मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती है।

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