किसान साथियों, रबी सीजन की फसलों की कटाई का समय चल रहा है। किसान अब अपनी गेहूं की फसल की कटाई करने के लिए तैयार हैं। किसान अपने खाली खेत में मूंग की बुवाई कर काफी शानदार आय अर्जित कर सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी के सीजन में मूंग की खेती किसानों के लिए काफी फायदेमंद सिद्ध हो रही है। काफी किसान मूंग की खेती करने में अपनी रूचि दिखा रहे हैं।
यह समय मूंग की खेती के लिए काफी अच्छा माना जाता है, क्योंकि इस वक्त प्राकृतिक आपदाओं जैसे– बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि, बाढ़, सूखा इत्यादि की संभावना काफी कम रहती है।
इस वजह से मूंग की खेती इस समय किसान के लिए अच्छा विकल्प है। मूंग की बाजार मांग अच्छी होने से इसकी कीमत भी अच्छी मिल जाती है।
ग्रीष्मकाल में मूंग की खेती के लिए ज्यादा पैदावार हांसिल करने के लिए किसानों को बेहतरीन किस्मों का चयन करना चाहिए।
इससे कीट–रोग आदि का आक्रमण कम हो और उत्पादन भी अच्छा मिल सके। ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई का उचित समय 10 मार्च से 10 अप्रैल तक होता है।
किसान समय से मूंग की बुवाई करना करना चाहते हैं, वे 70 से 80 दिनों में तैयार होने वाली किस्मों का चयन कर सकते हैं।
वहीं, जहां किसान देरी से बुवाई कर रहे हैं उन किसानों को मूंग की 60–65 दिन में तैयार होने वाली किस्मों का चयन करना चाहिए। मूंग का बेहतर उत्पादन देने वाली उन्नत किस्में इस तरह से हैं।
ये भी पढ़ें: मूंग की खेती में लगने वाले रोग और कीट की सम्पूर्ण जानकारी
मूंग की पूसा 9531 किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) द्वारा विकसित किया गया है। यह किस्म पीत चित्ती रोग के प्रतिरोधी किस्म हैं और मध्य भारत के लिए उपयुक्त है।
यह किस्म 60 दिन के समयांतराल में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से औसत उत्पादन 9 क्विंटल प्रति हैक्टेयर के अनुरूप हांसिल किया जा सकता है।
मूंग की पूसा रत्न किस्म को आईएआरआई के जरिए तैयार किया गया है। यह किस्म पीला मोजेक वायरस के प्रति-सहनशील है। मूंग की यह किस्म 65 से 70 दिनों के समयांतराल पर पककर तैयार हो जाती है।
मूंग की पूसा रत्न किस्म से लगभग 12 से 13 क्विंटल तक पैदावार हांसिल की जा सकती है। इस किस्म को पंजाब व दिल्ली एनसीआर क्षेत्र के लिए सबसे अच्छा माना गया है।
मूंग की पूसा 672 किस्म भी बेहद शानदार किस्म है, जो 60 से 80 दिनों के समयांतराल में पककर तैयार हो जाती है। साथ ही, बेहतरीन उपज भी प्रदान करती है।
मूंग की इस पूसा 672 किस्म से लगभग 8 से 10 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
ये भी पढ़ें: मूंग की खेती की विस्तृत जानकारी
मूंग की पूसा विशाल किस्म को आईएआरआई की तरफ से विकसित किया गया है। इसके दाने ठोस और काफी चमकदार होते हैं। मूंग की यह किस्म पीला मोजेक वायरस के प्रति प्रतिरोधी है।
मूंग की यह किस्म गर्मियों में 60–65 दिनों के समयांतराल पर पककर तैयार हो जाती है। मूंग की इस किस्म से लगभग 12 से 13 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन हांसिल किया जा सकता है।
मूंग की केपीएम 409–4 (हीरा) किस्म को आईआईपीआर, कानपुर की तरफ से विकसित किया गया है। आइए जानते हैं, मूंग की केपीएम 409–4 (हीरा) किस्म के बारे में।
मूंग की वसुधा (आई.पी.एम. 312-20) किस्म को आईआईपीआर कानपुर की तरफ से विकसित किया गया है। आइए जानते हैं, मूंग की वसुधा (आई.पी.एम. 312-20) किस्म के बारे में।
मूंग की सूर्या (आई.पी.एम. 512-1) किस्म को आईआईपीआर कानपुर द्वारा 2020 में जारी किया गया था। यह किस्म सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट और एन्थ्रेक्नोज रोग के प्रति प्रतिरोधी किस्म है।
मूंग की यह किस्म 60 से 65 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से करीब 12–13 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इस किस्म को विशेषकर उत्तर प्रदेश के लिए उपयुक्त पाया गया है।
मूंग की कनिका (आई.पी.एम. 302-2) किस्म को आईसीएआर–आईआईपीआर की ओर से विकसित किया गया है। यह किस्म पीला मोजेक रोग के लिए अधिक प्रतिरोधी है।
इसके दाने बड़े आकर्षक हरे और चमकदार होते हैं। मूंग की इस किस्म से 12 से 14 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
मूंग की आईपीएम 205–7 (विराट) किस्म को आईआईपीआर कानपुर द्वारा 2014 में जारी किया गया था। आइए जानते हैं, इस किस्म से जुड़ी कुछ खास बातें।
उपरोक्त में बताई गई मूंग की टॉप 10 किस्में उपज और कीमत दोनों के मामले में बेहद अच्छी हैं। मूंग की इन शीर्ष 10 उन्नत किस्मों की बाजार में भी काफी मांग होने के चलते यह किसानों के लिए बेहद फायदे का सौदा है।
भारत में पशुपालन एक बेहद महत्वपूर्ण कारोबार है। गाय पालन से लोग दूध की बिक्री से अच्छी-खासी आमदनी कर सकते हैं।
दूध, जैविक खाद और अन्य दुग्ध उत्पादों की बढ़ती मांग की वजह से यह एक लाभदायक व्यवसाय बनकर उभरा है। गाय की उत्तम नस्ल का चयन करके डेयरी फार्मिंग से ज्यादा मुनाफा अर्जित किया जा सकता है।
कुछ भारतीय नस्लें बेहतरीन दुग्ध उत्पादन, बेहतर सहनशक्ति और कम देखभाल में भी शानदार लाभ प्रदान करती हैं। अगर आप भी डेयरी व्यवसाय प्रारंभ करना चाहते हैं, तो यह 5 भारतीय गाय की नस्लें आपकी आय बढ़ाने में सहयोग कर सकती हैं।
ये भी पढ़ें: भारत में पाई जाने वाली देशी गायों की प्रमुख नस्लें
ये भी पढ़ें: भारत की सबसे ज्यादा दूध देने वाली टॉप 4 भैसों की नस्लें
उपरोक्त में बताई गई नस्लों की गायें अच्छी खासी मात्रा में दूध देती हैं, जिससे कमाई काफी अच्छी होती है।
गाय की ये नस्लें कम बीमार पड़ती हैं, जिससे इनके इलाज और देखभाल का खर्च काफी कम आता है।
गोबर से जैविक खाद, बायोगैस और अन्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
दूध से घी, मक्खन, दही और पनीर जैसे उत्पाद बनाकर अतिरिक्त कमाई की जा सकती है।
पशुपालकों को सरकार की तरफ से अनुदान और ऋण जैसी सुविधाएं मिलती हैं।
उपरोक्त में बताई गई गाय की 5 बेहतरीन दुग्ध उत्पादक गाय की नस्लों का पालन कर किसान काफी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
किसान साथियों, जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारत एक कृषि समृद्ध देश है। यहां काफी बड़े पैमाने पर किसान अलग-अलग किस्मों की खेती करते हैं।
आज हम तारामीरा की खेती के बारे में बात करने वाले हैं। ट्रैक्टरचॉइस के इस लेख में हम जानेंगे तारामीरा की खेती से जुड़ी हर छोटी से बड़ी बात के बारे में।
तारामीरा की खेती सबसे ज्यादा बारानी इलाकों जैसे राजस्थान के नागौर, पाली, बीकानेर, बाड़मेर और जयपुर जैसे जनपदों में की जाती है।
नमी की उपलब्धता के आधार पर इसकी बुवाई 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के दौरान की जाती है।
तारामीरा की खेती के लिए हल्की दोमट मिट्टी सबसे ज्यादा अनुकूल होती है।
तारामीरा की खेती के लिए खेत की 2 बार गहरी जुताई करनी चाहिए।
ये भी पढ़े: बबूल: औषधीय गुण, फायदे और खेती की जानकारी
यह किस्म बारानी क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त हैं। इसकी औसत उपज 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा पकाव अवधि 150 दिन है। इसमें 35-36 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है व सूखे के प्रति सहनशील है।
यह किस्म बारानी क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त हैं। इसकी औसत उपज 12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा पकाव अवधि 130-140 दिन है। इसमें 36.9 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। इसके हजार दानों का वजन 3-5 ग्राम व इसकी शाखाएं फैली हुई होती है।
एक हैक्टेयर खेत के लिए 5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बिजाई से पहले 2.5 ग्राम मैंकोजेब प्रति किलो बीज की दर से बीज उपचारित करें।
बारानी क्षेत्र में तारामीरा की बुवाई का समय मिट्टी की नमी व तापमान के आधार पर किया जाता है। नमी के अनुसार तारामीरा की बुवाई 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक करनी चाहिए। तारामीरा के बीजों की बिजाई कतारों में करें और कतार से कतार का फासला 40-45 सेंटीमीटर तक रखें।
ये भी पढ़े: गेहूं की बुवाई से पहले किसानों के लिए इन बातों का जानना बेहद जरूरी
अगर किसान के पास सिंचाई के पर्याप्त साधन हैं तो 40 से 50 दिन में पहली सिंचाई करनी चाहिए। तारामीरा में जरूरत पडने पर दूसरी सिंचाई दाना बनने के समय करनी चाहिए।
तारामीरा की फसल में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए बुवाई के 20 से 25 दिन बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। यदि पौधों की तादात ज्यादा हो तो बुवाई 20 से 25 दिन बाद अनावश्यक पौधों को निकालकर पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सेन्टीमीटर कर दें।
तारामीरा की खेती किसानों के लिए अच्छी आमदनी करने का एक बेहतरीन विकल्प है। किसान अपनी जमीन और जलवायु के आधार पर तारामीरा की किस्म का चयन कर अच्छी उपज और मुनाफा दोनों कमा सकते हैं।
भारत में मेथी एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक मसाला फसल है, जिसे इसके बीज, कोमल अंकुर और ताजी पत्तियों के लिए बड़े पैमाने पर उगाया जाता है।
इसकी खेती पूरे देश में होती है, लेकिन मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब और उत्तर प्रदेश में अधिक होती है। मेथी पोषण से भरपूर होती है और इसमें प्रोटीन, विटामिन ए और विटामिन सी की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है।
मेथी की कुछ उन्नतशील किस्मों में पूसा अर्ली बंचिंग, कसूरी मेंथी, लेम सेलेक्शन-1, राजेंद्र क्रांति, हिसार सोनाली, पंत रागनी, एमएच-103, सीओ-1, आरएमटी-1 और आरएमटी-143 शामिल हैं।
खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए, इसके बाद दो-तीन बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरा व समतल बना लेना चाहिए। अंतिम जुताई के दौरान प्रति हेक्टेयर 100-150 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद मिलानी चाहिए।
ये भी पढ़ें: इस राज्य में धनिया और मेथी उत्पादन पर 15 हजार सब्सिडी की घोषणा
मेथी की बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 20-25 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है, जबकि कसूरी मेथी के लिए 20 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है।
बीज को थीरम (3 ग्राम/किग्रा), बेविस्टीन (2 ग्राम/किग्रा), सेरोसेन या केप्टान (2 ग्राम/किग्रा) से शोधित कर बुवाई करनी चाहिए।
बुवाई का समय सितंबर से अक्टूबर के बीच उपयुक्त होता है, हालांकि विलंब होने पर नवंबर के दूसरे सप्ताह तक बुवाई की जा सकती है।
लाइन में बुवाई अधिक फायदेमंद होती है, जिसमें लाइनों के बीच 25-30 सेमी और पौधों के बीच 5-10 सेमी की दूरी रखनी चाहिए।
खेत की तैयारी के समय 100-150 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद डालनी चाहिए। इसके अलावा, प्रति हेक्टेयर 40 किलोग्राम नत्रजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस और 50 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है।
फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के समय डालनी चाहिए, जबकि शेष नत्रजन को दो बार टॉप ड्रेसिंग के रूप में 25-30 और 40-45 दिन के अंतराल पर देना चाहिए।
ये भी पढ़ें: बबूल: औषधीय गुण, फायदे और खेती की जानकारी
मेथी की फसल को उकठा, डैम्पिंग ऑफ, पाउडरी मिल्ड्यू, लीफ स्पॉट, डाउनी मिल्ड्यू और ब्लाइट जैसी बीमारियां प्रभावित कर सकती हैं।
इनसे बचाव के लिए बीज शोधन आवश्यक है। पाउडरी मिल्ड्यू के लिए 5% सल्फर पाउडर का 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें, जबकि डाउनी मिल्ड्यू के नियंत्रण के लिए 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करें।
मेथी में पत्ती का गिडार, पॉड बोरर और माहू कीट लग सकते हैं। इनकी रोकथाम के लिए 0.2% कार्बेरिल, 0.05% इकोलेक्स या 1 मिलीलीटर मैलाथियान प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
यदि फसल केवल हरी पत्तियों के लिए उगाई जाती है, तो प्रति हेक्टेयर 90-100 क्विंटल उत्पादन होता है। यदि फसल पत्तियों और बीज दोनों के लिए उगाई जाती है, तो 15-20 क्विंटल पत्तियां और 8-10 क्विंटल बीज प्राप्त होता है।
केवल बीज उत्पादन के लिए उगाई गई फसल से 12-15 क्विंटल बीज की पैदावार होती है।
कटाई का सही समय तब होता है जब बीज पककर सूखने लगते हैं। कटाई के बाद मड़ाई कर बीजों को अलग कर लिया जाता है।
आजकल हर क्षेत्र की तरह भारतीय कृषि क्षेत्र में भी आधुनिक तकनीक और उपकरणों का इस्तेमाल दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
किसान अपने समय की बचत करने और खर्च को कम करने के लिए इन उपकरणों में सबसे अहम यंत्रों में से एक हार्वेस्टर है, जो किसानों के लिए फसल की कटाई और बुवाई को आसान और तेज बनाता है।
वर्तमान में यदि आप भी अपने खेतों के लिए एक दमदार और सुविधाजनक हार्वेस्टर खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो दशमेश 3100 मिनी कंबाइन हार्वेस्टर आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है।
ये भी पढ़ें: कंबाइन, रोटावेटर और कल्टीवेटर पर मिल रही है सब्सिडी, ऐसे करें आवेदन
भारत में दशमेश 3100 मिनी कंबाइन हार्वेस्टर की एक्स शोरूम कीमत 14.50 लाख से 16.00 लाख रुपए के बीच तय की गई है।
हालांकि, इस हार्वेस्टर का ऑन-रोड प्राइस विभिन्न राज्यों में आरटीओ रजिस्ट्रेशन और रोड टैक्स के अनुसार अलग हो सकता है।
ये भी पढ़ें: प्रीत 987 स्टेलर कंबाइन हार्वेस्टर – फीचर्स, इंजन, फसल कटाई और कीमत
दशमेश 3100 मिनी कंबाइन हार्वेस्टर छोटे और मध्यम किसानों के लिए कम लागत में अधिक कार्यक्षमता प्रदान करने वाला यंत्र है।
दशमेश 3100 मिनी कंबाइन हार्वेस्टर में लगे विभिन्न फीचर्स जैसे शक्तिशाली इंजन, बेहतर स्टीयरिंग, बड़ा कटर बार और उच्च क्षमता वाले टैंक इसे भारतीय कृषि के लिए एक शानदार निवेश बनाते हैं।
दशमेश 3100 मिनी कंबाइन हार्वेस्टर से किसानों की न केवल समय की बचत होती है, बल्कि कार्य की दक्षता भी काफी बढ़ती है।
अब किसानों को फसल कटाई के लिए अधिक मेहनत और समय खर्च नहीं करना पड़ेगा, जिससे उन्हें ज्यादा फसल उपज और मुनाफा दोनों मिलेगा।
हर क्षेत्र की तरह कृषि में भी आधुनिकता और तकनीकी का काफी बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है।
ट्रैक्टर रीपर (Tractor Reaper), रीपर कम बाइंडर (Reaper cum Binder), कंबाइन हार्वेस्टर (Combine Harvester) जैसी मशीनों का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।
इन सब मशीनों से अलग अब एक मशीन c (E-Reaper) आई है, जो बैटरी से चलती है और कम खर्च में ज्यादा क्षेत्रफल में खड़ी फसलों की कटाई कर सकती है।
बतादें, कि किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए इसको किफायती दर पर किराये पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
ई–रीपर एक ऐसी फसल कटाई की मशीन है, जिसको भोपाल स्थित कृषि यंत्र निर्माता कंपनी किसान मित्र ने लॉन्च करते हुए लघु व मध्यम किसानों के लिए तैयार किया है। यह ई–रीपर इलेक्ट्रिक बैटरी के माध्यम से चलता है।
यह कृषि यंत्र हर मौसम और हर फसल के लिए काफी अच्छा बताया जा रहा है। किसानों को अभी यह यंत्र किराये पर उपलब्ध कराया जा रहा है। यह यंत्र पर्यावरण रक्षक होने के साथ ही किसानों के लिए बड़े काम का सिद्ध हो सकता है।
ये भी पढ़ें: प्रीत 987 स्टेलर कंबाइन हार्वेस्टर – फीचर्स, इंजन, फसल कटाई और कीमत
खबरों के अनुसार, भोपाल स्थित कृषि यंत्र निर्माता कंपनी किसान मित्र द्वारा निर्मित ई–रीपर कंपनी की तरफ से किसानों को एक हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से किराए पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
कंपनी जल्द ही इसका प्रोडक्शन बढ़ाकर इसको बड़े पैमाने पर किसानों तक उपलब्ध कराएगी। कंपनी के संस्थापक आशीष गुप्ता के अनुसार फीड बैक में किसानों की ओर से रीपर के साथ बाइंडर की भी मांग की गई है, ताकि उनका काम और आसान हो जाए।
इस काम के लिए अनुसंधान किया जाएगा। इसके अलावा भविष्य में इलेक्ट्रिक थ्रेशर, सोलर पंप ओर मिनी ट्रैक्टर के निर्माण का भी विचार है, ताकि किसानों को और सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा सकें।
अग्रणी कृषि संस्थानों भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली और केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल का प्रमाणन किसान मित्र की कृषि दक्षता, विश्वसनीयता, नवप्रवर्तनशील और प्रभावी कृषि समाधानों के लिए प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
ई-रीपर फसल कटाई की मशीन से किसानों को अच्छा मुनाफा होने के साथ-साथ पर्यावरण भी कम दूषित होगा।
भारत एक कृषि समृद्ध देश होने की वजह से यहां कई तरह की फसलें और पेड़ उगाए जाते हैं और प्राकृतिक रूप से पाए भी जाते हैं।
देश के अंदर विभिन्न इलाकों में औषधीय पेड़ पौधों की भी बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। इन्हीं में से एक बबूल एक बेहद उपयोगी पेड़ है। बबूल को साधारण भाषा में लोग कीकर, बबूर, कारूबेल आदि नामों से पुकारते हैं।
बबूल के कई सारे औषधीय लाभ दस्त का इलाज, घावों को ठीक करना, बाल गिरना, दांत विकार और एक्जिमा जैसे रोगों को दूर करते हैं।
बबूल का व्यावसायिक रूप से भी काफी इस्तेमाल किया जाता है, जैसे कि फर्नीचर, सौंदर्य उत्पादों और ईंधन के लिए भी यह पेड़ अत्यंत उपयोगी है। साथ ही, किसान इसकी खेती करके काफी अच्छा खासा मुनाफा अर्जित कर सकते हैं।
बबूल के पेड़ों का बेहतरीन विकास करने के लिए जलोढ़ दोमट और काली कपास मिट्टी सबसे ज्यादा उपयुक्त होती है। इसके साथ ही भूमि का पीएच मान 7.9 से कम होना चाहिए।
ये भी पढ़ें: भारतीय किसान औषधीय गुणों से युक्त कुसुम की खेती कर मोटी आय कर सकते हैं
बबूल के पौधरोपण के लिए 30 सेंटीमीटर ऊँचे, लम्बे और गहरे गड्ढे तैयार किए जाते हैं।
इस दौरान पंक्ति से पंक्ति की दूरी 4 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 4 मीटर होनी चाहिए। बबूल की खेती के लिए प्रति एकड़ में पौधों की रोपाई के लिए 240 से 250 पौधे पर्याप्त होते हैं।
ये भी पढ़ें: कृषि वैज्ञानिकों द्वारा धान की रोपाई के समय इन बातों का ध्यान रखने से मिलेगी बंपर पैदावार
बबूल की गोंद में कई सारे पोषक तत्व मौजूद होते हैं, इनमें एंटीबैक्टीरियल, मैग्नीशियम, कैल्शियम, प्रोटीन, एंटीऑक्सीडेंट, फाइबर और एंटीकार्सिनोजेनिक शामिल हैं।
आयुर्वेद विशेषज्ञों का कहना है, कि बबूल गोंद एसिडिक फ्री होता है। यह दर्द को समाप्त कर हड्डियों को मजबूत बनाता है।
हड्डियों में काफी दर्द रहता है और जोड़ों के दर्द की समस्या रहती है, उनको बबूल गोंद और अखरोट एक साथ लेना चाहिए।
इसके लिए अखरोट को रात में भिगो कर रख दें। सुबह छिलका उतार दें। अखरोट का एक दाना, दो ग्राम गोंद और दो ग्राम मिश्री खाली पेट दूध के साथ लेने से जोड़ों के दर्द से निजात मिलती है।
गोंद का उपयोग करने से गर्मी के समय में शीतलता मिलती है। गर्मी से लोगों की डिहाइड्रेशन जैसी बुरी स्थिति हो जाती है।
ऐसे में गर्मी को शांत करने और शरीर को ठंडा रखने के लिए 2 ग्राम गोंद और मिश्री साथ में सुबह-शाम खाना लाभदायक होता है।
पुरुषों को दो ग्राम मिश्री और दो ग्राम बबूल गोंद को साथ में लेने से धातु रोगों से बचने की शक्ति मिलती है।
बबूल गोंद का सेवन करने से बालों के झड़ने, बालों के पतले होने और सिर में डैड्रफ होने जैसी परेशानियों से निजात मिलती है।
सिर्फ यही नहीं बबूल की पत्तियां और रीठा कंसंट्रेट को एक साथ लगाने से भी बालों की दिक्कत दूर और बढ़वार ज्यादा हो जाती है।
ये भी पढ़ें: सीढ़ीनुमा खेती के फायदे और नुकसान
बबूल गोंद का सेवन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी बढ़ जाती है। बबूल गोंद के लड्डू दूध के साथ खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। शारीरिक इम्यून सिस्टम को बढ़ाने के लिए बबूल काफी लाभदायक है।
बबूल गोंद के अंदर भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो कि कब्ज को दूर करने का कार्य करता है।
यदि आप गोंद और दही का सेवन एक साथ करते हैं, तो आपको इससे गर्मी के मौसम में पेट में दर्द, जलन, अफरा, कब्ज जैसी दिक्कतों से काफी लाभ मिलता है।
बबूल के गोंद का सेवन करने से कई सारे स्वास्थ्य लाभ होते हैं। बबूल के बहुत ही कम साइड इफैक्ट देखने को मिलते हैं। बबूल एक औषधीय गुणों से युक्त पेड़ है। इसके फल से लेकर छाल में कई लाभकारी गुण पाए जाते हैं।
पूसा के बीजों की बढ़ती मांग इस बात का संकेत है, कि किसान अब उन्नत कृषि तकनीकों को अपना रहे हैं। बासमती और नॉन-बासमती दोनों ही तरह की किस्मों को लेकर कृषकों में उत्साह देखने को मिलता है।
यदि आप भी धान की खेती करने जा रहे हैं, तो अच्छी गुणवत्ता के बीज वक्त रहते ऑनलाइन बुक करें और अपनी फसल को ज्यादा उत्पादक बनाएं।
किसानों ने धान की खेती की तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं। ऐसी स्थिति में उत्तम गुणवत्ता वाले बीजों की मांग काफी बढ़ गई है। साथ ही, किसान कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों से बेहतरीन गुणवत्ता के बीजों के लिए संपर्क कर रहे हैं।
विशेष रूप से भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा के बीज केंद्रों पर जबरदस्त भीड़ देखी जा रही है। बीते दिनों किसान मेले के दौरान 1.82 करोड़ रुपये के धान बीजों की बिक्री दर्ज की गई।
इसके अतिरिक्त ऑनलाइन माध्यम से भी बड़ी तादात में किसानों ने बीजों की खरीदारी की है।
हरियाणा के सिरसा और फतेहाबाद जिलों के किसानों ने पूसा बासमती 1401/ Pusa Basmati 1401 की अधिक खरीदारी की है।
बासमती के अलावा नॉन-बासमती धान की कुछ किस्में भी काफी लोकप्रिय रही हैं। बासमती की इन किस्मों की सबसे ज्यादा बिक्री दर्ज की गई है।
किसान खासतौर पर अगेती यानी जल्दी पकने वाली किस्मों की तलाश में थे, जिससे उनको कम समय में ज्यादा उपज हांसिल हो सके।
ये भी पढ़े: बासमती धान की सीधी बुवाई और उन्नत किस्मों से संबंधित आवश्यक जानकारी के बारे में जाने
पूसा द्वारा विकसित धान की किस्में ज्यादा पैदावार, कम पानी की जरूरत और कीट प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती हैं।
यही वजह है, कि हर वर्ष देशभर के किसान इन बीजों को प्राथमिकता प्रदान करते हैं। इस वर्ष भी किसानों ने बेहतर उत्पादन और उच्च गुणवत्ता वाले चावल के लिए पूसा की उन्नत किस्मों का चयन किया है।
अगर कोई किसान मेले में नहीं पहुंच पाया, तो वह अब भी पूसा की आधिकारिक वेबसाइट pusabeej.iari.res.in पर जाकर बीजों की ऑनलाइन बुकिंग कर सकता है।
किसानों के लिए बीजों की होम डिलीवरी का विकल्प भी उपलब्ध है। लेकिन, इसके लिए किसानों को अतिरिक्त शुल्क का भुगतान करना होगा। ऑनलाइन खरीदारी से किसान सीधे प्रामाणिक और उच्च गुणवत्ता वाले बीज प्राप्त कर सकते हैं।
बीजों की ऑनलाइन बुकिंग कर किसानों को समुचित कीमतों पर पूसा से मिलेंगे उन्नत किस्मों के बीज।
किसान साथियों, जैसा कि हम सब जानते हैं, कि किसान रबी सीजन की ककड़ी की खेती नकदी फसल के रूप में करते हैं। ककड़ी एक कद्दूवर्गीय फसल है, जो खीरे के बाद दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है।
यह भारतीय मूल की फसल है, जिसे जायद की फसल के साथ उगाया जाता है। ककड़ी के फल की एक फीट तक लंबाई होती है।
ककड़ी को प्रमुख रूप से सलाद और सब्जी के लिए समुचित मात्रा में उपयोग किया जाता है। अभी गर्मियों का मौसम शुरू होने में समय है और इसकी बुवाई का समय भी अभी अनुकूल है।
किसान साथियों आप ककड़ी की खेती कर काफी शानदार आय अर्जित कर सकते हैं। क्योंकि, जैसे ही गर्मियों का मौसम अपने चरम स्तर पर पहुंचेगा। वैसे-वैसे इसकी बाजारों में मांग बढ़ने लग जाएगी।
ये भी पढ़े: रबी फसलों की कटाई व इसके बाद उगाई जाने वाली फसलें
ककड़ी में दो मुख्य प्रजातियां होती हैं- पहली हलके हरे रंग के फल वाली और दूसरी में गहरे हरे रंग के फल वाली। अधिकांश लोग इनमें पहली प्रजाति को ही ज्यादा पसंद करते हैं।
ककड़ी के फलों की तुड़ाई कच्ची अवस्था में ही की जाती है। ककड़ी की इन उन्नत किस्मों से करीब 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज मिलती है।
ककड़ी की यह लखनऊ अर्ली किस्म काफी स्वादिष्ट और मुलायम होती है। उत्तर भारत के राज्यों में काफी बड़े पैमाने पर ककड़ी की खेती की जाती है। आइए जानते हैं, लखनऊ अर्ली किस्म की ककड़ी के बारे में।
दुर्गापुरी ककड़ी किस्म के फल हल्के पीले रंग के होते हैं, जिन पर नालीनुमा धारियां बनी होती हैं। आइए जानते हैं, दुर्गापुरी ककड़ी किस्म से जुड़ी खास बातें।
ये भी पढ़े: रबी फसलों की MSP 2024-25: किसानों के लिए नई कीमतें
पंजाब स्पेशल किस्म ककड़ी संकर किस्मों में सबसे लोकप्रिय किस्म है। इस किस्म को उत्तरी भारत के राज्यों के लिए काफी अच्छा माना जाता है। ककड़ी की पंजाब स्पेशल किस्म से जुड़ी कुछ खास बातें।
ककड़ी की अन्य उन्नत किस्मों के अंतर्गत निम्नलिखित किस्में हैं -
इस जायद सीजन में किसान ककड़ी की खेती कर काफी शानदार मुनाफा कमा सकते हैं। ककड़ी की गर्मियों में मांग और दाम अच्छा होने की वजह से किसानों के लिए यह बड़े लाभ का सौदा साबित हो सकता है।
रबी सीजन की फसलों की कटाई के लिए किसानों ने तैयारियाँ शुरू करदी हैं। आज हम आपको ऐसी कुछ फसलों के बारे में बताएंगे, जिनको जायद सीजन में उगाकर किसान काफी अच्छी उपज और मोटा मुनाफा कमा सकते हैं।
सूरजमुखी की खेती करना किसानों के लिए काफी फायदे का सौदा साबित होगा। क्योंकि, इसकी खेती करने से किसानों को सूरजमुखी का मन मोहक फूल मिलता है।
सूरजमुखी आकर्षक दिखने के साथ सेहत के लिए भी लाभकारी होता है। दुनियाभर के अलग अलग हिस्सों में उगाए जाने वाले इस सूरजमुखी का मुख सूर्य की तरफ होता है।
इसलिए इस फूल को सूर्यमुखी के नाम से भी कहा जाता है। सूरजमुखी का वानस्पतिक नाम हेलियनथस एनस है। सूरजमुखी की सम्पूर्ण जानकारी के लिए आप ट्रैक्टरचॉइस के इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।
भारत के अंदर गेंदा की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। गेंदा काफी ज्यादा मांग में रहता है। इसका उपयोग डेकोरेशन के तौर पर काफी ज्यादा किया जाता है।
गेंदा काफी आकर्षक और बेहद सुंदर फूल है। अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से बाजार में इसकी निरंतर मांग बनी रहती है। गेंदा की खेती से जुडी सम्पूर्ण जानकारी के लिए आप ट्रैक्टर चॉइस के इस लेख पर जा सकते हैं।
ये भी पढ़ें: इस राज्य में गेंदा के फूल की खेती पर मोटा अनुदान दिया जा रहा है
भारत के अंदर कई तरह की दलहन फसलें उगाई जाती हैं, इन्हीं में से एक मूंग की फसल है। भारत के कई हिस्सों में मूंग की फसल को काफी बड़े पैमाने पर उगाया जाता है।
मूंग की खेती करना काफी लाभप्रद साबित होता है। मूंग की खेती करना किसानों के लिए जायद सीजन में उगाई जाने वाली फसलों में अच्छा विकल्प है। मूंग की खेती से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी के लिए आप ट्रैक्टरचॉइस के इस लेख पर जा सकते हैं।
उपरोक्त में बताई गई फसलों की जायद के सीजन में खेती करने से किसानों को काफी ज्यादा लाभ मिलेगा। किसान भाई अपने क्षेत्र की जलवायु और मृदा को ध्यान में रखकर किसी एक फसल का चयन कर सकते हैं।
भारत में खेती बहुत बड़े पैमाने पर की जाती है। भारतीय किसान बेहद मेहनती और साहसी हैं। खेती-किसानी के क्षेत्र में भी बहुत सारे किसान अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।
ट्रैक्टरचॉइस के इस लेख में हम ऐसे ही एक किसान अजीत कुमार मंडल के बारे में आपको बताएंगे जो कि कृषि के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान और नाम बना रहा है।
दरअसल, किसान अजीत ने लीक से हटकर मिश्रित खेती में सेब, अंजीर, ड्रैगन फ्रूट, नाशपाती, बेर, परसीमन या जापानी फल, आंवला, टमाटर आदि।
किसान कृषि क्षेत्र में नए-नए बीजों और तरीको का इस्तेमाल कर अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
अब कश्मीर व हिमाचल की तरह बिहार के कटिहार जिले के कोढ़ा में सेब की खेती होने लगी है। अजीत यहां के किसानों के लिए एक उदाहरण बने हुए हैं।
उसने हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर से सेब के 230 पौधे लाकर एक एकड़ जमीन में लगाए हैं। पहले सेब के कुछ पौधों को लगाकर ट्रायल किया था। नालेज अच्छा मिलने पर साल 2021 में उसने इसकी खेती करने का निर्णय लिया।
ये भी पढ़ें: सफल किसान प्रकाश बणकार ने ड्रैगन फ्रूट की खेती से की तगड़ी कमाई
किसान अजीत अपने सेब के बागान में ही मिश्रित खेती कर रहे हैं। इसमें टेलिस मीटर के माध्यम से एक एकड़ में ड्रैगन फ्रूट व सेब की खेती कर रहे हैं।
खेत की मेड़ पर तरबूज के अलावा प्लांट इंटर क्रॉप के तहत स्ट्रॉबेरी, जापानी फल, अंजीर, नाशपाती, बेर, टमाटर की खेती भी कर रहे हैं।
ड्रैगन फ्रूट 300 रुपये से लेकर 400 रुपये तक प्रति किलो बिक जाता है। मिश्रित खेती के जरिए ये लगभग 5 लाख रुपये वार्षिक तौर पर कमा रहे हैं।
किसान साथियों, पिछले चार सालों के अंदर सेब की खेती और ड्रैगन फ्रूट की खेती कर अजीत अब तक लाखों रुपये का मुनाफा कमा चुके हैं।
अजीत करीब 25 एकड़ में मक्का, गेहूं, सरसों, दलहन व तिलहन, आलू की खेती भी किया करते हैं। इस प्रकार की खेती में मेहनत के मुकाबले मुनाफा काफी ज्यादा नहीं है।
परंतु, सेब व ड्रैगन फ्रूट की खेती में कम परिश्रम और अधिक मुनाफा है। इसलिए और लोगों को भी परंपरागत खेती को छोड़कर सेब, ड्रैगन फ्रूट, स्ट्रॉबेरी, ओल, तरबूज, अंजीर, नाशपाती, बेर, आंवला, टमाटर व जापानी फल परसीमन की खेती करनी चाहिए।
किसान अजीत का कहना है, कि ड्रैगन फ्रूट के पौधे की कीमत 180 से 200 रुपये प्रति पौधा है। टेलिस मीटर के माध्यम से खेती की जाती है।
हालांकि, इनमें सीमेंट के खंभे का भी इस्तेमाल किया जाता है। उनके प्लांट में 4 हजार पौधे ड्रैगन फ्रूट के रोपित किए गए हैं।
150 से भी ज्यादा सेब के पौधे, मेड़ पर तरबूज व सेब व ड्रैगन फ्रूट के बीच जगह में अंजीर, बेर, स्ट्रॉबेरी, ओल, टमाटर, नाशपाती, आंवला और जापानी फल परसीमन की खेती कर रहे हैं।
ड्रैगन फ्रूट के पौधे में फूल आने के बाद सवा से डेढ़ महीना में फल तैयार हो जाता है। एक फल का मिनिमम वजन 300 ग्राम से लेकर 500 ग्राम तक होता है। फल टूटने के बाद फिर फल आने शुरू हो जाते हैं। एक साल के अंदर तीन बार फलन होता है।
ये भी पढ़ें: अखरोट की खेती
बिहार कृषि विभाग के मुताबिक, "अजीत ने यूट्यूब से वीडियो देखकर सेब की खेती करना प्रारंभ किया था।
सेब की खेती में मुनाफा होने के पश्चात उसी खेत में अब वह मिश्रित खेती करने लगे हैं। वर्तमान में वह मिश्रित खेती के तौर पर ड्रैगन फ्रूट की खेती करने लग गए हैं।
हालांकि, उन्होंने अभी एक एकड़ में ड्रैगन फ्रूट की खेती की शुरुआत की है। इससे उन्हें अंदाजा लगा कि ड्रैगन फ्रूट की खेती कर आर्थिक समृद्धि की ओर बढ़ा जा सकता है।"
अगर किसान को अधिक मुनाफा कमाना है, तो उनको सफल किसान अजीत की तरह लीक से हटकर खेती करनी चाहिए। किसान इससे काफी अच्छी उपज और पारंपरिक फसलों की अपेक्षा बहुत शानदार मुनाफा कमा सकते हैं।
रबी सीजन की फसलों की कटाई का समय आ चुका है। किसान खेत में खड़ी फसल की कटाई करने के लिए तैयारियों में लगे हुए हैं।
फसल कटाई के समय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कृषि उपकरण थ्रेशर ही होता है। यह बहुत सारे कृषि यंत्रों में से एक फसल कटाई करने वाला कृषि उपकरण है।
आइए जानते हैं, स्वराज P-550 मल्टीक्रॉप थ्रेसर और जगतजीत मल्टीक्रॉप थ्रेशर के बारे में।
भारतीय किसान कई कंपनियों के थ्रेशर का इस्तेमाल करते हैं। इनमें सबसे पहले स्वराज P-550 मल्टीक्रॉप थ्रेशर का नाम आता है।
आइए जानते हैं इसकी उन खूबियों के बारे में जिनकी वजह से काफी बड़े पैमाने पर किसान स्वराज के इस मल्टीक्रॉप थ्रेशर को काफी पसंद करते हैं।
स्वराज P-550 मल्टीक्रॉप थ्रेसर 40 HP का थ्रेसर है, जो कि कम ईंधन खपत में शानदार कटाई करता है।
ये भी पढ़ें: स्वराज कंपनी ने लॉन्च किया स्वराज 8200 व्हील हार्वेस्टर, किसानों को होगा अब ज्यादा फायदा
भारतीय कृषि उपकरण बाजार में जगतजीत एक प्रतिष्ठित ब्रांड है। जगतजीत कंपनी किसानों के लिए किफायती कीमत पर मल्टी क्रॉप थ्रेसर तैयार करने वाली शानदार कंपनी है। आइए जानते हैं, 40 HP में आने वाले जगतजीत मल्टी क्रॉप थ्रेसर के बारे में।
उपरोक्त में बताए गए 2 प्रमुख मल्टीक्रॉप थ्रेसर काफी किफायती कीमत पर बाजर में उपलब्ध हैं। किसान इनका निजी कृषि कार्य या व्यापारिक कृषि कार्यों के लिए उपयोग कर सकते हैं।