आज के समय में खेती केवल मेहनत का काम नहीं रह गई है, बल्कि यह तकनीक और आधुनिक साधनों पर भी काफी हद तक निर्भर हो चुकी है। पहले किसान केवल ट्रैक्टर होने को ही काफी मान लेते थे, लेकिन अब यह समझ आ गया है कि ट्रैक्टर के साथ सही और उपयोगी ट्रैक्टर इम्प्लीमेंट होना भी उतना ही जरूरी है। ट्रैक्टर इम्प्लीमेंट वे औजार होते हैं, जो खेती के अलग-अलग कार्यों को आसान, तेज और कम खर्च में पूरा करने में मदद करते हैं। जुताई से लेकर बुवाई, निराई-गुड़ाई, ढुलाई और कटाई तक हर काम सही इम्प्लीमेंट से बेहतर ढंग से किया जा सकता है। इससे न केवल समय और श्रम की बचत होती है, बल्कि फसल की पैदावार और किसान की आमदनी दोनों में बढ़ोतरी होती है।
खेती में सबसे पहले जरूरत होती है खेत को तैयार करने की, और इसके लिए कल्टीवेटर का उपयोग सबसे अधिक किया जाता है। कल्टीवेटर को ट्रैक्टर का सबसे महत्वपूर्ण इम्प्लीमेंट माना जाता है। यह मिट्टी को उलट-पलट कर भुरभुरा बनाता है, जिससे जमीन में हवा का संचार बेहतर होता है और पौधों की जड़ें मजबूत बनती हैं। कल्टीवेटर खेत में मौजूद खरपतवार और पुराने फसल अवशेषों को मिट्टी में मिला देता है, जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है। आजकल बाजार में स्प्रिंग लोडेड और रिजिड दोनों प्रकार के कल्टीवेटर उपलब्ध हैं। हल्की मिट्टी के लिए एक प्रकार उपयुक्त होता है, तो भारी और सख्त मिट्टी के लिए दूसरा। सही चुनाव करने से किसान को बेहतर परिणाम मिलते हैं।
इसके बाद आधुनिक खेती में रोटावेटर का स्थान बहुत अहम हो गया है। रोटावेटरऐसा इम्प्लीमेंट है, जो एक ही बार में जुताई और मिट्टी को बारीक करने का काम कर देता है। पहले जहां किसान को खेत तैयार करने के लिए कई बार ट्रैक्टर चलाना पड़ता था, वहीं रोटावेटर से यह काम एक ही चक्कर में हो जाता है। इससे समय, डीजल और मेहनत तीनों की बचत होती है। रोटावेटर खासतौर पर धान, गेहूं, मक्का और सब्जियों की खेती के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ है। जो किसान कम समय में ज्यादा क्षेत्र में खेती करना चाहते हैं, उनके लिए रोटावेटर एक बेहतरीन विकल्प है।
बुवाई के लिए सीड ड्रिल का महत्व किसी से छिपा नहीं है। सीड ड्रिल की मदद से बीज सही गहराई और सही दूरी पर गिरते हैं, जिससे फसल की बढ़वार एकसमान होती है। जब बीज बराबर दूरी पर बोए जाते हैं, तो पौधों को पोषक तत्व, पानी और धूप बराबर मात्रा में मिलती है। इससे उत्पादन बढ़ता है और बीज की भी बचत होती है। आजकल फर्टिलाइजर कम सीड ड्रिल भी उपलब्ध हैं, जिनमें बीज के साथ-साथ खाद भी एक साथ डाली जा सकती है। इससे समय की बचत होती है और फसल को शुरुआती अवस्था में ही जरूरी पोषण मिल जाता है।
हल या प्लाऊ खेती का एक पारंपरिक लेकिन बेहद जरूरी औजार है। आज भी बहुत से किसान गहरी जुताई और मिट्टी पलटने के लिए हल का उपयोग करते हैं। हल मिट्टी की ऊपरी परत को नीचे और नीचे की परत को ऊपर लाकर जमीन को नई ताकत देता है। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और पुराने कीट, रोग तथा खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। आधुनिक समय में एमबी प्लाऊ और डिस्क प्लाऊ जैसे हल ट्रैक्टर के साथ आसानी से लगाए जाते हैं। ये मजबूत होते हैं और कम समय में गहरी जुताई करने में सक्षम होते हैं।
खेती में उत्पादन के बाद सबसे बड़ी जरूरत ढुलाई की होती है, और इसके लिए ट्रॉली का उपयोग किया जाता है। ट्रॉली के बिना खेती का काम अधूरा माना जाता है। कटाई के बाद अनाज, भूसा, खाद, बीज और अन्य कृषि सामग्री को खेत से घर या मंडी तक पहुंचाने में ट्रॉली बहुत काम आती है। ट्रॉली से समय और मजदूरी दोनों की बचत होती है। इसमें भारी वजन उठाने की क्षमता होती है और इसका उपयोग खेती के साथ-साथ अन्य व्यावसायिक कामों में भी किया जा सकता है। किसान अपनी जरूरत और ट्रैक्टर की क्षमता के अनुसार सिंगल एक्सल या डबल एक्सल ट्रॉली का चुनाव कर सकते हैं।
सही ट्रैक्टर इम्प्लीमेंट का चयन करना हर किसान के लिए बेहद जरूरी है। हर किसान की जमीन की बनावट, मिट्टी का प्रकार, फसल और बजट अलग-अलग होता है। ऐसे में बिना सोचे-समझे इम्प्लीमेंट खरीदना नुकसानदायक हो सकता है। गलत इम्प्लीमेंट न केवल खर्च बढ़ाता है, बल्कि ट्रैक्टर और जमीन दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए खरीद से पहले ट्रैक्टर की हॉर्स पावर, खेत की मिट्टी की किस्म और अपनी खेती की जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए।
आज के दौर में ट्रैक्टर इम्प्लीमेंट ने खेती को कहीं ज्यादा आसान और लाभकारी बना दिया है। कल्टीवेटर, रोटावेटर, सीड ड्रिल, हल और ट्रॉली ये ऐसे इम्प्लीमेंट हैं, जो लगभग हर किसान के लिए जरूरी माने जाते हैं। इनका सही समय पर और सही तरीके से उपयोग करने पर खेती में मेहनत कम होती है, लागत घटती है और उत्पादन बढ़ता है। आधुनिक कृषि का असली आधार ही सही ट्रैक्टर और सही इम्प्लीमेंट हैं। अगर किसान इनका समझदारी से चुनाव करें और सही तरीके से इस्तेमाल करें, तो खेती न केवल आसान बनेगी, बल्कि उनकी आमदनी में भी लगातार बढ़ोतरी होगी।
पुन्नि मिनी कंबाइन 313 हार्वेस्टर भारत के किसानों के लिए एक आधुनिक और भरोसेमंद कृषि मशीन है, जो गेहूँ और धान जैसी प्रमुख फसलों की कटाई में अत्यंत उपयोगी साबित हो रही है। यह मशीन खासतौर पर उन किसानों के लिए बनाई गई है, जो कम समय में अधिक उत्पादन चाहते हैं और श्रम लागत को कम करना चाहते हैं। अपनी बेहतरीन बनावट, मजबूत संरचना और उन्नत तकनीक के कारण यह हार्वेस्टर खेतों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है। पुन्नि मिनी कंबाइन 313 न केवल कटाई को आसान बनाता है, बल्कि फसल की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाए रखता है। यही कारण है कि यह मशीन भारत की सबसे पसंदीदा कृषि मशीनों में से एक बन चुकी है और तेजी से लोकप्रियता हासिल कर रही है।
जो किसान एकमुश्त भुगतान करने में असमर्थ हैं, उनके लिए पुन्नि मिनी कंबाइन 313 हार्वेस्टर को आसान किस्तों में खरीदने के लिए लोन और फाइनेंसिंग विकल्प भी उपलब्ध हैं। विभिन्न बैंक और फाइनेंस कंपनियाँ इस मशीन पर आकर्षक ब्याज दरों पर लोन प्रदान करती हैं। इससे किसानों पर आर्थिक बोझ कम पड़ता है और वे अपनी खेती को आधुनिक बनाने का सपना आसानी से पूरा कर सकते हैं। फाइनेंसिंग विकल्प किसानों को मशीन की लागत को छोटे-छोटे भागों में चुकाने की सुविधा देता है, जिससे उनकी नकदी प्रवाह की समस्या भी नहीं होती और वे खेती से होने वाली आय से ही किस्तें चुका सकते हैं।
पुन्नि मिनी कंबाइन 313 एक सेल्फ-प्रोपेल्ड मशीन है, जिसका अर्थ है कि इसे चलाने के लिए किसी अलग ट्रैक्टर या बाहरी वाहन की आवश्यकता नहीं होती। किसान इसे आसानी से स्वयं चला सकते हैं और नियंत्रित कर सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक ही बार में कटाई, थ्रेसिंग और भराई जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है। इससे न केवल समय की बचत होती है, बल्कि श्रम लागत भी काफी हद तक कम हो जाती है। पारंपरिक तरीकों की तुलना में यह मशीन खेती को अधिक कुशल, तेज और व्यवस्थित बनाती है।
पुन्नि मिनी कंबाइन 313 दो वेरिएंट में उपलब्ध है, जिसमें 76 एचपी और 101 एचपी इंजन शामिल हैं। यह विकल्प किसानों को अपनी जरूरत और खेत के आकार के अनुसार सही मशीन चुनने की सुविधा देता है। अधिक शक्ति वाला इंजन बड़े खेतों के लिए उपयुक्त होता है, जबकि कम एचपी वाला वेरिएंट छोटे और मध्यम किसानों के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा, इसमें ड्राई टाइप और हैवी-ड्यूटी क्लच दिया गया है, जो मशीन को लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन देने में मदद करता है। यह क्लच सिस्टम मशीन की कार्यक्षमता को बढ़ाता है और रखरखाव की लागत को भी कम करता है।
पुन्नि मिनी कंबाइन 313 हार्वेस्टर में 4 स्ट्रॉ वॉकर दिए गए हैं, जो भूसे से अनाज को प्रभावी ढंग से अलग करने का काम करते हैं। इससे अनाज की बर्बादी कम होती है और किसानों को अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। इसकी कटर बार चौड़ाई 7 से 9 फीट तक होती है, जिससे बड़े क्षेत्र में फसल की कटाई कम समय में की जा सकती है। चौड़ी कटर बार के कारण मशीन की कार्यक्षमता बढ़ जाती है और खेत का काम जल्दी पूरा हो जाता है। यह विशेषता खासतौर पर उन किसानों के लिए फायदेमंद है, जिन्हें कम समय में अधिक क्षेत्र में कटाई करनी होती है।
पुन्नि मिनी कंबाइन 313 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसे चलाना बेहद आसान है। इसमें सरल कंट्रोल सिस्टम और आरामदायक ऑपरेटर सीट दी गई है, जिससे लंबे समय तक काम करने पर भी थकान महसूस नहीं होती। इसकी किफायती कीमत इसे छोटे और मध्यम किसानों के लिए एक आदर्श विकल्प बनाती है। कम लागत में बेहतर प्रदर्शन देने वाली यह मशीन किसानों की आमदनी बढ़ाने में सहायक साबित होती है। कुल मिलाकर, पुन्नि मिनी कंबाइन 313 हार्वेस्टर एक भरोसेमंद, टिकाऊ और आधुनिक कृषि मशीन है, जो खेती को अधिक लाभदायक और सुविधाजनक बनाती है।
पुन्नि मिनी कंबाइन 313 हार्वेस्टर का मूल्य 2026 में भी किसानों के लिए किफायती और मूल्यवान माना जा रहा है। इसकी कीमत किसानों की बजट क्षमता को ध्यान में रखकर तय की गई है, जिससे छोटे और मध्यम वर्ग के किसान भी इसे आसानी से खरीद सकें। हालांकि इसकी ऑन-रोड कीमत अलग-अलग राज्यों में टैक्स, आरटीओ चार्ज और अन्य शुल्क के कारण थोड़ी भिन्न हो सकती है। किसान “ट्रैक्टरचॉइस” जैसे प्लेटफॉर्म पर सभी कृषि उपकरणों की ताजा कीमत, ऑफर्स और विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। किसान इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से मशीन की तुलना अन्य हार्वेस्टर से भी कर सकते हैं, जिससे उन्हें सही निर्णय लेने में मदद मिलती है।
भारत को ऐसे दूरदर्शी नेताओं का आशीर्वाद मिला है, जिनकी सोच ने देश की इंडस्ट्रीज़ को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। सोनालिका ट्रैक्टर्स इसी भावना का एक शक्तिशाली आधुनिक प्रतीक है। ‘जीतने का दम’ के विश्वास के साथ, यह ब्रांड किसानों के साथ भरोसे की साझेदारी के 30 साल पूरे कर रहा है। होशियारपुर (पंजाब) के एक छोटे से शहर से शुरू होकर, सोनालिका आज भारतीय उत्कृष्टता को वैश्विक मंच पर स्थापित कर चुकी है।
LIC से रिटायर होने के बाद, जब अधिकतर लोग आराम का जीवन चुनते हैं, तब श्री एल.डी. मित्तल ने एक नई शुरुआत की। अपने दो जोशीले बेटों डॉ. ए.एस. मित्तल और डॉ. दीपक मित्तल के साथ मिलकर उन्होंने एक ऐसी कंपनी बनाई, जो आज USD 1.1 बिलियन का ट्रैक्टर साम्राज्य बन चुकी है। यह कहानी साहस, दूरदर्शिता और भारतीय क्षमता पर अटूट विश्वास की मिसाल है।
आज सोनालिका भारत का नंबर 1 ट्रैक्टर एक्सपोर्ट ब्रांड है, भारत में तीसरा सबसे बड़ा ट्रैक्टर निर्माता है और दुनिया में 5वां सबसे बड़ा ट्रैक्टर ब्रांड बन चुका है। इसे भारत की सबसे बड़ी कंपनियों की फॉर्च्यून 500 इंडिया सूची में भी स्थान मिला है। यह उपलब्धि सोनालिका की इंजीनियरिंग क्षमता और किसानों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
सोनालिका का मूल मंत्र था – भारतीय किसानों को ‘जीतने का दम’ देना। अधिक शक्ति, अधिक विश्वसनीयता, अधिक सम्मान और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीक। 1996 में, जब अधिकतर कंपनियाँ एक जैसे ट्रैक्टर बना रही थीं, सोनालिका ने किसानों की ज़रूरतों के अनुसार अलग-अलग फसलों, मिट्टी और क्षेत्रों के लिए कस्टमाइज़्ड ट्रैक्टर बनाने का रास्ता चुना।
2011 से, वाइस चेयरमैन डॉ. ए.एस. मित्तल के नेतृत्व में सोनालिका ने इंजन, ट्रांसमिशन, गियरबॉक्स और अन्य मुख्य पार्ट्स को खुद बनाना शुरू किया। इस वर्टिकल इंटीग्रेशन से कंपनी ने हाई हॉर्सपावर ट्रैक्टर को आम बनाया और एंट्री-लेवल मॉडल्स में भी पावर स्टीयरिंग, ऑयल-इमर्स्ड ब्रेक और मल्टी-स्पीड ट्रांसमिशन जैसे एडवांस फीचर्स दिए।
सोनालिका आज धान की खेती के लिए महाबली, महाराष्ट्र के लिए छत्रपति और राजस्थान के लिए महाराजा जैसे क्षेत्र-विशिष्ट ट्रैक्टर बनाती है। साथ ही, 70 से अधिक कृषि उपकरणों की पूरी रेंज किसानों की उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर रही है। 30 वर्षों की यह यात्रा साबित करती है कि सोनालिका केवल ट्रैक्टर नहीं बनाती, बल्कि भारतीय किसान को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का सपना साकार करती है।
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ विभिन्न प्रकार की फसलों का काफी बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। सरसों भी भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों में से एक है। वर्तमान में भारत के बड़े रकबे में सरसों की फसल लहलहा रही है। भारत में इस वर्ष सरसों और रेपसीड की खेती का रकबा बढ़कर लगभग 87 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। रकबे में बढ़ोतरी के साथ ही सरसों की फसल पर माहू (एफिड) कीट का खतरा भी तेजी से बढ़ा है।
दिसंबर के अंतिम सप्ताह से जनवरी के दौरान जब मौसम में नमी अधिक होती है और बादल छाए रहते हैं, तब ये छोटे हरे रंग के कीट सरसों के फूलों और नई फलियों का रस चूसकर फसल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो इससे उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
माहू से बचाव के लिए अधिकतर किसान रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, लेकिन इससे खेती की लागत बढ़ जाती है और स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। इन जहरीले रसायनों के अवशेष खाद्य पदार्थों के जरिए मानव शरीर में पहुंचकर कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। साथ ही लगातार रसायनों के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण भी प्रभावित होता है। ऐसे में किसानों के लिए सुरक्षित, सस्ते और पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाना बेहद जरूरी हो गया है।
किसानों की इसी जटिल समस्या का समाधान स्टिकी ट्रैप जैसी बिना केमिकल वाली तकनीक है। स्टिकी ट्रैप पीले रंग की प्लास्टिक या कार्डबोर्ड शीट होती है, जिस पर चिपचिपा पदार्थ लगाया जाता है। माहू कीट पीले रंग की ओर आकर्षित होता है और उस पर चिपककर नष्ट हो जाता है। किसान इन ट्रैप को फसल से 1–2 फीट की ऊंचाई पर खेत में लगाते हैं। यह तरीका न केवल प्रभावी है, बल्कि पूरी तरह सुरक्षित भी है और इससे कीटों पर नियंत्रण बिना किसी रसायन के किया जा सकता है।
स्टिकी ट्रैप बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन किसान इन्हें घर पर भी कम खर्च में तैयार कर सकते हैं। पीली पॉलीथीन या टिन की शीट पर अरंडी का तेल या पुराना मोबिल ऑयल लगाकर ट्रैप बनाया जा सकता है। एक ट्रैप की लागत मात्र 15–20 रुपये आती है और एक एकड़ के लिए 10–15 ट्रैप पर्याप्त होते हैं। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर हर 20–25 दिन में ट्रैप बदलना चाहिए। इस तकनीक से किसान कीटनाशकों पर होने वाला खर्च कम कर सकते हैं, फसल की पैदावार सुरक्षित रख सकते हैं और उपभोक्ताओं को भी जहरमुक्त व सुरक्षित भोजन उपलब्ध करा सकते हैं।
किसानों को अपनी खेती से अच्छी आय कमाने के लिए सबसे पहले सही फसल का चयन करना पड़ेगा। किसानों को सबसे ज्यादा लाभ तभी होगा जब वह पारंपरिक फसल चक्र की जगह अधिक मुनाफे वाली फसलों का चयन करेंगे। ट्रैक्टरचॉइस के इस लेख में आज हम एक ऐसी ही अधिक मुनाफा देने वाली फसल के बारे में जानेंगे।
खजूर की खेती आज किसानों के लिए एक लाभकारी और भविष्य की फसल के रूप में उभर रही है। यह फल न केवल बाजार में अच्छी कीमत दिलाता है, बल्कि अपने उच्च पोषण मूल्य के कारण इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है।
खजूर में प्राकृतिक शर्करा, फाइबर, पोटेशियम, आयरन और मैग्नीशियम जैसे तत्व भरपूर होते हैं, जो इसे स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद उपयोगी बनाते हैं। यही वजह है कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में इसकी खपत तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर और स्थायी आमदनी का अवसर मिल रहा है।
खजूर की सफल खेती के लिए सही मिट्टी और खेत की तैयारी सबसे अहम मानी जाती है। बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो और pH स्तर 7 से 8 के बीच हो, खजूर के पौधों के लिए आदर्श रहती है।
खेत की तैयारी के समय रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद और गोबर की खाद का उपयोग करने से पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और उनकी वृद्धि तेज होती है। आधुनिक तकनीक जैसे टिश्यू कल्चर अपनाने से पौधे जल्दी फल देने लगते हैं, जिससे किसानों को कम समय में ही निवेश पर अच्छा रिटर्न मिलने लगता है।
अगर देखभाल और प्रबंधन सही तरीके से किया जाए तो खजूर का पेड़ कई वर्षों तक लगातार उत्पादन देता है। शुरुआती 10 वर्षों में एक पेड़ से करीब 80 किलो तक फल प्राप्त किया जा सकता है, जबकि 15 साल की उम्र तक यही उत्पादन 100 से 200 किलो तक पहुंच सकता है।
भारत के कई हिस्सों जैसे गुजरात का कच्छ क्षेत्र, राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, चूरू, साथ ही पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र का सोलापुर और बुंदेलखंड क्षेत्र खजूर की खेती के लिए उपयुक्त माने जाते हैं, जहां यह फसल शानदार पैदावार देती है।
कमाई के लिहाज से खजूर की खेती किसानों के लिए बेहद आकर्षक विकल्प बन रही है। एक पेड़ से सालाना लगभग 20 हजार से 50 हजार रुपये तक की आय संभव है। यदि एक एकड़ में करीब 70 पेड़ लगाए जाएं, तो कुल कमाई 6 लाख से 12 लाख रुपये तक हो सकती है। इस तरह खजूर की खेती कम लागत, लंबी अवधि की पैदावार और मजबूत बाजार मांग के कारण किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
रबी सीजन किसानों के लिए बेहद खास होता है, क्योंकि इस दौरान वे ऐसी फसलों की खेती करते हैं जिनसे अच्छी कमाई हो सके। इन्हीं में गेंदा फूल की खेती एक लाभकारी विकल्प के रूप में उभर रही है, जिसे सरकार भी बढ़ावा दे रही है।
बिहार सरकार ने बागवानी कृषि को प्रोत्साहित करने और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से ‘फूल (गेंदा) विकास योजना’ के तहत 8 करोड़ रुपये की राशि को मंजूरी दी है।
गेंदा फूल का उपयोग पूजा-पाठ, सजावट और इत्र उद्योग में बड़े पैमाने पर होता है और इसकी मांग सालभर बनी रहती है, जिससे किसानों को स्थायी बाजार मिलता है। इस योजना से राज्य में फूलों की खेती को नई दिशा मिलने के साथ-साथ किसानों को बेहतर मुनाफा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं आगे चलकर किसानों को इसमें मिलने वाली सब्सिडी का भी लाभ मिलेगा।
फूल (गेंदा) विकास योजना 2025–26 का लाभ बिहार के सभी 38 जिलों के किसान उठा सकते हैं और इसमें चयन “पहले आओ, पहले पाओ” के आधार पर किया जाएगा। इस योजना का फायदा वही किसान ले सकते हैं जिनके पास अपनी खुद की कृषि भूमि है और जिनके पास LPC (स्थानीय पहचान प्रमाण पत्र) तथा अपडेटेड राजस्व रसीद उपलब्ध हो।
जिन किसानों के पास अपनी जमीन नहीं है, वे एकरारनामा (लीज एग्रीमेंट) के आधार पर भी आवेदन कर सकते हैं। सरकार ने खेती के क्षेत्र की सीमा भी तय की है, जिसमें न्यूनतम 0.1 हेक्टेयर और अधिकतम 2 हेक्टेयर भूमि मान्य होगी, जिससे छोटे और बड़े दोनों तरह के किसान इस योजना का लाभ ले सकें।
बिहार सरकार इस योजना के तहत किसानों को 50 प्रतिशत तक की सब्सिडी प्रदान कर रही है। गेंदा फूल उत्पादन के लिए प्रति हेक्टेयर 80,000 रुपये की इकाई लागत तय की गई है, जिसमें से 50 प्रतिशत यानी 40,000 रुपये प्रति हेक्टेयर का अनुदान किसानों को दिया जाएगा।
गेंदा फूल कम समय में तैयार होने वाली फसल है और इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है, जिससे किसानों को अच्छा और स्थायी मुनाफा मिल सकता है। साथ ही, सरकार खेती और परिवहन दोनों में सब्सिडी देकर किसानों की लागत को और कम कर रही है, जिससे कम खर्च में अधिक लाभ संभव हो पाता है।
इस योजना में महिला किसानों को विशेष छूट दी जा रही है और सरकार ने 30 प्रतिशत महिला भागीदारी सुनिश्चित की है, जिससे महिलाओं को खेती के माध्यम से अच्छी आय अर्जित करने का अवसर मिलेगा। योजना की आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन रखी गई है, जिसके लिए किसान सरकारी कृषि या बागवानी की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर आवेदन कर सकते हैं।
चूंकि योजना का लाभ पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर दिया जाएगा, इसलिए समय पर आवेदन करने वाले किसानों को गेंदा फूल की खेती से अच्छी कमाई करने का सुनहरा मौका मिलेगा।
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किसान साथियों, किसान अपने खेत की मिट्टी को अपने खून पसीने की मेहनत से सींचकर फसल तैयार करता है। फसल को तैयार करने के सफर में किसान के सामने कितनी चुनौतियां आती हैं इस बात से आप खुद अनजान नहीं हैं। इसलिए किसानों को उनकी फसल का सही समय पर सही भाव मिलना बेहद जरूरी होता है। आज हम राजस्थान और हरियाणा की मंडियों में सरसों की वर्तमान कीमतों के बारे में जानेंगे।
देशभर की प्रमुख सरसों मंडियों में इस समय भाव मजबूत बने हुए हैं। राजस्थान और हरियाणा से प्राप्त ताज़ा आंकड़ों के अनुसार सरसों की कीमतें 6,200 से 7,100 रुपये प्रति क्विंटल के बीच दर्ज की जा रही हैं, जो न केवल पिछले वर्ष के एमएसपी से कहीं ऊपर हैं, बल्कि आगामी रबी मार्केटिंग सीजन (RMS) 2026–27 के नए MSP से भी बेहतर स्तर पर दिखाई दे रहे हैं। भावों में यह तेजी किसानों के लिए सीधा लाभ लेकर आ रही है और उनकी आय में मजबूत बढ़ोतरी की उम्मीद जगा रही है।
ई-नाम पोर्टल के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक 2 से 4 दिसंबर 2025 के बीच राजस्थान की प्रमुख मंडियों जैसे - बारां, मलपुरा, नदबई, नीवाई, खानपुर और हिण्डौन—में सरसों का मॉडल भाव 6,400 से 7,070 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में रहा, जहां आवक और खरीदी दोनों संतुलित और मजबूत दिखाई दीं। इस सीजन में किसानों को पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर दाम मिल रहे हैं।
वहीं हरियाणा की रेवाड़ी मंडी में सरसों के दाम और ज्यादा बढ़कर 9,578 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए, जिससे किसानों में खासा उत्साह है और यह दर्शाता है कि बाजार में सरसों की मांग तेज बनी हुई है तथा खरीदार उच्च कीमत चुकाने के लिए कतार में हैं।
भारत सरकार का हमेशा प्रयास किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का होता है। यही वजह है कि भारत सरकार प्रति वर्ष तिलहन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में इजाफा कर किसानों को आर्थिक मदद प्रदान करती है।
इसी कड़ी सरकार ने RMS 2026-27 के लिए सरसों के एमएसपी में 250 रुपए से बढ़ाकर 6,200 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। यानी किसानों को विगत वर्ष के मुकाबले में MSP में 250 रुपए अधिक का फायदा प्राप्त होगा।
सरकार के अनुसार सरसों की उत्पादन लागत लगभग 3,210 रुपये प्रति क्विंटल है, जिसके मुकाबले नए MSP पर किसानों को करीब 93% तक का लाभ मिल रहा है।
मौजूदा समय में बाजार भाव एमएसपी से अधिक चल रहे हैं, इसलिए किसानों को MSP से ऊपर मिलने वाली यह अतिरिक्त कमाई उनके वास्तविक मुनाफे को और भी बढ़ा देती है, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय सुधार होता है।
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बांस की खेती की ओर किसानों का रुझान बढ़ रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और रोजगार उत्पन्न करने में बांस की खेती का अहम योगदान है। बांस की खेती के महत्व के कारण ही इसे हरा सोना कहा जाता है। बांस, घास परिवार का पौधा है जो तेजी से बढ़ता है।
यह भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में बड़ी भूमिका अदा करता है। बांस की खेती कहीं भी की जा सकती है। यह विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में विकसित हो सकता है। बांस की फसल करीब 40 साल तक बांस देती रहती है। बांस को लेकर कहा जाता है, कि यह अद्वितीय विशेषताओं वाला एक अविश्वसनीय पौधा है।
पहली बात तो यह कि भारत में बांस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। भारत में इसका उपयोग सदियों से विभिन्न तरीकों से किया जाता रहा है। बांस में भारत की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख योगदानकर्ता बनने की क्षमता है।
भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांस उत्पादक देश है। ध्यातव्य है कि भारत में बांस के कई प्रकार पाए जाते हैं जैसे -बंबूसा बांस, बम्बूसा टुल्डा,मेलोकाना बैसीफेरा आदि। इसके अलावा बांस की खेती के लिए पानी की आवश्यकता भी होती है।
जबकि बांस की सिंचाई के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है जैसे -ड्रिप सिंचाई, बाढ़ सिंचाई, वर्षा जल सिंचाई आदि ।
आज हम जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना कर रहे हैं। वहीं बांस की खेती पर्यावरण के अनुकूल होती है। बांस को सदाबहार वनों के साथ-साथ शुष्क क्षेत्र में भी उगाया जा सकता है।
बांस की खेती बड़े पैमाने पर जल और मृदा प्रबंधन में भी सहायक होती है। इसकी जड़ें पृथ्वी को मजबूती से पकड़ती हैं जिससे मिट्टी बह जाने से बच जाती है। बांस की पत्ती के मिट्टी में गिरने से प्राकृतिक खाद का निर्माण भी होता है, जिससे अन्य फसलों के उत्पादन में वृद्धि होती है।
बांस की खेती ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में मदद करती है। आपको बता दें कि बांस दूसरे पौधों की तुलना में 33 प्रतिशत अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है।
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बांस की खेती किसानों के आर्थिक लाभ का भी बड़ा माध्यम है। बांस की खेती किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बना रही है। इस खेती में किसानों को लागत कम आती है।
इसमें एक लंबे समय तक निरंतर आमदनी होती है। साथ ही इसमें रखरखाव का खर्च भी कम होता है। किसान बांस की कटाई और बिक्री आसानी से कर सकते हैं। इसे हर साल दोबारा लगाने की ज़रूरत नहीं होती है। बांस की बाजार में मांग होने की कारण यह किसानों के लिए सरल आय का स्रोत है।
इसके अलावा बांस की खेती शिल्पकारों और उद्योगों के लिए बहुत उपयोगी है। बांस से निर्मित फर्नीचर, चटाई, और हस्तशिल्प की अन्य वस्तुओं की बाजार में बहुत मांग हैं। इस कारण बाजार में बांस की मांग बनी रहती है। कागज बनाने में भी इसका उपयोग होता है।
ध्यातव्य है कि प्लास्टिक का विकल्प होने के कारण भी बांस की मांग ज्यादा होती है। इसके अलावा इसका वास्तुकला में भी उपयोग बढ़ रहा है। बांस का आयुर्वेद चिकित्सा और औषधि के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।
भूकंप संभावित क्षेत्र में इसका उपयोग निर्माण कार्य में भी होता है। बांस की बढ़ती वैश्विक मांग उद्यमियों को बहुत लाभ दे रही है।
बांस की खेती किसानों का आर्थिक लाभ सुनिश्चित करने के साथ उन्हे आत्मनिर्भर बनाने में सहायक है। आज वक्त की मांग है कि बांस की खेती को लेकर जागरूकता को बढ़ावा दिया जाए। इससे जहां एक तरफ किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। वहीं पर्यावरण को भी समृद्ध किया जा सकता है।
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भारत में खेती एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है, जिससे लाखों किसान जबरदस्त आमदनी कर रहे हैं। इसकी वजह है, नई तकनीकों का आना, जिससे खेती ने रफ्तार पकड़ ली है। वहीं, कुछ किसान परंपरागत फसलों की खेती छोड़ फूल की खेती कर रहे हैं।
बतादें, कि गेंदा की फसल किसानों को कम समय में अच्छी उपज और अधिक मुनाफा दिला सकती है। जैसा कि आप जानते ही हैं, इस फूल की मांग बाजारों में 12 महीने बनी रहती है, जिससे किसान अच्छी आमदनी कर लेते हैं।
गेंदा के फूल की खेती करना किसानों के बाएं हाथ का काम है। सबसे पहले किसान इस फूल के बीजों की तैयारी नर्सरी में करें और उसके बाद अपने खेतों की अच्छे से जुताई कर लें, ताकि मिट्टी एकसार हो जाए। इसके बाद पौधों की रोपाई करें।
साथ ही यह ध्यान रखें कि इस फूल की रोपाई के बाद उसी समय सिंचाई करनी होती है। उसके बाद पौधे निकल आते हैं और करीब 55 से 60 दिनों के भीतर फूल निकलना शुरू हो जाते हैं। किसान रोजाना इन फूलों को तोड़कर बाजारों में बेच सकते हैं।
गेंदा फूल खास तौर पर मंदिरों, पूजा-पाठ में उपयोग किए जाते हैं और आजकल इन फूलों की इतनी मांग है कि शादियों में भी सजावट के लिए मार्केट में इनकी डिमांड बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि किसान इन फसलों की ओर बढ़ रहे हैं।
गेंदा की खेती की खासियत पर नजर डालें तो गेंदा फूल की फसल दो से तीन महीने में ही तैयार हो जाती है। इस फूल की खेती में अधिक खाद या महंगी मशीनरी की जरूरत नहीं होती, जिससे यह फसल किसानों के लिए मुनाफे का विकल्प बन गई है। किसान अगर इस फसल की खेती करते हैं, तो वे लगभग प्रति कट्ठा 14,000 रुपये का मुनाफा कमा सकते हैं।
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भारत के कई राज्यों में इस फूल की खेती की जाती है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि दुनियाभर में गेंदा की लगभग 50 प्रजातियां पाई जाती हैं। अगर किसान इस फसल की खेती करना चाहते हैं, तो उन्हें यह फसल 15 से 29 डिग्री सेल्सियस तापमान में करनी चाहिए।
अब जानें किन राज्यों के किसान इस फसल की खेती कर सकते हैं। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तराखंड शामिल हैं।
प्रश्न 1. गेंदा के फूल की खेती से फसल तैयार होने में कितना समय लगता है ?
उत्तर: 3 महीने
प्रश्न: गेंदा के फूल की खेती की शुरुआत किसान को किस प्रकार करनी चाहिए ?
उत्तर: बीजों की तैयारी नर्सरी में करके
प्रश्न: गेंदा की रोपाई के बाद तुरंत क्या करना आवश्यक होता है ?
उत्तर: सिंचाई
प्रश्न: गेंदा के फूल तोड़ने की शुरुआत रोपाई के कितने दिनों बाद होती है ?
उत्तर: 55-60 दिन
प्रश्न: गेंदा के फूलों की सबसे अधिक मांग किन कार्यों में होती है ?
उत्तर: पूजा-पाठ और सजावट दोनों में
काली मिट्टी भारत की सबसे उपजाऊ मिट्टियों में से एक है। यह महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक में ज्यादा पाई जाती है। इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं, जिससे फसलें जल्दी बढ़ती हैं और पैदावार अच्छी होती है। काली मिट्टी में कपास, धान, गेहूं, दलहनी, नकदी और बागवानी फसलें आसानी से उगाई जा सकती हैं।
काली मिट्टी भारत की सबसे उपजाऊ मिट्टियों में से एक है। यह मिट्टी अपने रंग और गुणों के कारण फसलों के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है। इसमें पौधों के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
इसी वजह से काली मिट्टी में फसलें जल्दी बढ़ती हैं और उनकी पैदावार भी अच्छी होती है। भारत में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों में काली मिट्टी ज्यादा पाई जाती है। किसान इस मिट्टी में कपास, धान, गेहूं, दलहनी, नकदी और बागवानी फसलें उगा कर अच्छी कमाई करते हैं।
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काली मिट्टी प्रमुख रूप से भारत के मध्य और पश्चिमी इलाकों में पाई जाती है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों में यह मिट्टी व्यापक रूप से फैली हुई है। इन राज्यों के किसान इसी मिट्टी में अनाज, फल, सब्जियां और अन्य फसलें उगाकर काफी शानदार उपज प्राप्त करते हैं।
काली मिट्टी में पौधों के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की संतुलित मात्रा होती है। इसके अलावा यह लौह तत्व, चूना, मैग्नीशियम और एलुमिना जैसे खनिजों से भी भरपूर होती है। यही वजह है, कि इस मिट्टी में फसलें कम उर्वरक के इस्तेमाल से भी अच्छी उगती हैं। चलिए जानते हैं, काली मिट्टी में कौन-कौन सी फसल उगाई जा सकती हैं ?
काली मिट्टी को कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसी कारण इसे ‘काली कपास मिट्टी’ के नाम से भी जाना जाता है।
धान, गेहूं, ज्वार, बाजरा जैसी अनाज की फसलें काली मिट्टी में अच्छी पैदावार देती हैं। इसमें पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में होने के कारण फसल तेजी से बढ़ती है।
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मसूर, चना और अन्य दलहनी फसलें भी इस मिट्टी में अच्छी तरह उगाई जा सकती हैं। इन फसलों के लिए ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती।
अलसी, सूरजमुखी, मूंगफली जैसी तिलहनी फसलें और गन्ना, तंबाकू जैसी नकदी फसलें भी काली मिट्टी में अच्छी तरह उगती हैं।
काली मिट्टी में आम, सपोटा, अमरूद, केला और खट्टे फल जैसी बागवानी फसलें भी उगाई जा सकती हैं। इसके अलावा सब्जियों का भी अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।
काली मिट्टी भारत की सबसे उपजाऊ मिट्टियों में से एक है। इसकी खासियत यह है, कि इसमें पौधों के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जिससे फसलों की पैदावार और गुणवत्ता दोनों काफी बढ़ जाती हैं।
कपास, धान, दलहनी, तिलहनी, नकदी और बागवानी फसलें सभी काली मिट्टी में उगाई जा सकती हैं। इस वजह से किसान इस मिट्टी को ‘संपन्न फसल की चाबी’ जैसी उपमा देते हैं।
प्रश्न: भारत के किन राज्यों में काली मिट्टी प्रमुख रूप से पाई जाती है ?
उत्तर: महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक
प्रश्न: काली मिट्टी को किस नाम से भी जाना जाता है ?
उत्तर: काली कपास मिट्टी
प्रश्न: काली मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं ?
उत्तर: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश
प्रश्न: काली मिट्टी किस फसल के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है ?
उत्तर: कपास
प्रश्न: काली मिट्टी में पौधों की वृद्धि तेज़ क्यों होती है ?
उत्तर: इसमें पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं
किसानों के लिए आज हम काले गेहूं की तीन किस्मों के बारे में जानकारी लेकर आए हैं। इन किस्मों की खेती करके किसान शानदार कमाई कर सकते हैं।
काले गेहूं की खेती आमतौर पर यूपी, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश में की जाती है। इसके अतिरिक्त, कुछ अन्य क्षेत्रों में भी इस गेहूं की किस्म की खेती होती है।
ये प्रमुख किस्में हैं:- नाबी एमजी (NABI MG), HI 8759 (पूसा तेजस), और ST 3236। ये किस्में क्षेत्र के हिसाब से किसानों को अच्छी पैदावार दे सकती हैं। साथ ही, इन किस्मों में विभिन्न औषधीय गुण पाए जाते हैं, जिसकी वजह से किसान इसकी बुवाई की तरफ अधिक बल दे रहे हैं।
गेहूं की इस किस्म को पंजाब के मोहाली में नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (NABI) ने विकसित किया है। इस किस्म की बुवाई किसान अक्टूबर से दिसंबर के बीच कर सकते हैं।
इस किस्म में उच्च गुणवत्ता वाले पोषक तत्व जैसे एंथोसायनिन, प्रोटीन, आहार फाइबर, आयरन और जिंक की अधिक मात्रा होती है, जो कई रोगों जैसे मोटापा, कैंसर, मधुमेह और हृदय संबंधी बीमारियों से बचाव करती है।
काले गेहूं की यह किस्म 130 से 140 दिनों में 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की बढ़िया पैदावार दे सकती है। काले गेंहू की नाबी एमजी किस्म मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में उगाई जाती है।
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काले गेहूं की यह किस्म किसानों के लिए एक बड़े मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है। इस किस्म को पकने में केवल 110 से 125 दिनों का समय लगता है और इसके लिए केवल 4 से 5 सिंचाई पर्याप्त होती हैं। इस किस्म का अधिक इस्तेमाल दलिया, सूजी, पास्ता, नूडल्स और मैकरोनी जैसे उत्पादों में किया जाता है।
अगर किसान इस किस्म की खेती करते हैं, तो प्रति हेक्टेयर लगभग 56.9 क्विंटल तक उपज प्राप्त कर सकते हैं। काले गेहूं की HI 8759 (पूसा तेजस) किस्म मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में उगाई जाती है। कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में भी इसका उत्पादन किया जाता है।
काले गेहूं की यह किस्म सामान्य गेहूं की तुलना में अधिक पौष्टिक है। इसे उच्च गुणवत्ता वाली किस्म माना जाता है। इस किस्म के सेवन से मधुमेह और हृदय संबंधी रोगों का खतरा कम हो जाता है क्योंकि इसमें आयरन, मैग्नीशियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं।
यदि इस किस्म की बुवाई की जाए, तो यह 57.5 से 79.60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज दे सकती है। यह किस्म करनाल बंट, पाउडरी मिल्ड्यू और लूज स्मट के लिए प्रतिरोधी है और 142 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
काले गेंहू की ST 3236 किस्म मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में उगाई जाती है। इसके अलावा उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों के लिए भी काले गेंहू की ST 3236 किस्म काफी उपयुक्त है।
अगर किसान काले गेहूं की इन किस्मों की रबी सीजन में बुवाई करते हैं, तो वे बंपर कमाई अर्जित कर सकते हैं। बाजार में इस गेहूं की कीमत सामान्य गेहूं की तुलना में अधिक है।
काले गेहूं की कीमत लगभग 4,000 रुपए से 6,000 रुपए प्रति क्विंटल है। यानि, सामान्य गेहूं की तुलना में दोगुना मुनाफा। यही वजह है, कि किसान काले गेहूं की इन किस्मों की ओर बढ़ रहे हैं और अधिक पैसा कमा रहे हैं।
भारत में गेहूं किसानों की सबसे अहम फसल है। हर किसान चाहता है कि उसकी फसल न सिर्फ अच्छी उपज दे, बल्कि रोगों और मौसम की मार से भी सुरक्षित रहे। ऐसे में ‘श्रीराम सुपर 303’ गेहूं की उन्नत किस्म किसानों के लिए एक बेहतरीन समाधान बनकर उभरी है।
‘श्रीराम सुपर 303’ एक रिसर्च-आधारित आधुनिक गेहूं किस्म है, जो अपनी बेहतरीन उपज के लिए जानी जाती है। प्रति हेक्टेयर 75–80 क्विंटल तक उत्पादन क्षमता, प्रति एकड़ लगभग 25–30 क्विंटल उपज संभव सही खेती तकनीक अपनाने पर यह किस्म किसानों को अधिक पैदावार और बेहतर आमदनी दोनों देती है।
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श्रीराम सुपर 303 किस्म की सबसे बड़ी खासियत है इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता। यह ब्राउन रस्ट, पत्ती के धब्बे और झुलसा जैसे प्रमुख रोगों से फसल को बचाती है। इससे किसानों को बार-बार दवाइयों का छिड़काव नहीं करना पड़ता, जिससे लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है।
‘श्रीराम सुपर 303’ को अगेती और पछेती दोनों तरह की बुवाई में लगाया जा सकता है। यह मध्यम अवधि की किस्म है, जो बुवाई के 125–130 दिनों में कटाई योग्य हो जाती है। इसके बालें 99 दिनों में निकल आती हैं, जिससे फसल का विकास संतुलित रहता है।
इस किस्म के दाने सुनहरे, चमकदार और ठोस होते हैं, जिनका वजन अच्छा होता है। इसलिए बाजार में इसका दाम भी बेहतर मिलता है। यह गेहूं आटा और मुलायम रोटियों के लिए बेहद उपयुक्त है, जिसकी वजह से उपभोक्ताओं में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है।
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‘श्रीराम सुपर 303’ के पौधे लगभग 90–100 सेंटीमीटर ऊँचे और तनों में बेहद मजबूत होते हैं। इससे आंधी या तेज हवा चलने पर फसल के गिरने का खतरा बहुत कम रहता है। एक पौधे में 15–20 मजबूत कल्ले निकलते हैं, जो पैदावार को बढ़ाते हैं।
यह किस्म भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, गुजरात और मध्य प्रदेश में बड़ी सफलता से उगाई जा रही है।
इसकी सहनशीलता और मजबूत संरचना इसे अलग-अलग जलवायु में भी स्थिर उत्पादन देती है।
अगर आप ऐसी गेहूं की किस्म चाहते हैं, जो ज्यादा उपज, कम रोग, बेहतर दाना गुणवत्ता और आंधी-तूफान से सुरक्षा पाए तो ‘श्रीराम सुपर 303’ आपके लिए सबसे समझदारी भरा विकल्प साबित हो सकता है। सही समय पर बुवाई और उचित देखभाल के साथ यह किस्म किसानों को बेहतरीन उत्पादन और शानदार मुनाफा दिला सकती है।
प्रश्न: ‘श्रीराम सुपर 303’ गेहूं की किस्म किसके लिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर: अधिक पैदावार के लिए
प्रश्न: ‘श्रीराम सुपर 303’ गेहूं की प्रति हेक्टेयर औसत उपज कितनी होती है ?
उत्तर: 75–80 क्विंटल
प्रश्न: यह किस्म किन प्रमुख रोगों से फसल की रक्षा करती है ?
उत्तर: ब्राउन रस्ट, पत्ती के धब्बे और झुलसा रोग
प्रश्न: ‘श्रीराम सुपर 303’ गेहूं की फसल बुवाई के कितने दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है ?
उत्तर: 125–130 दिन
प्रश्न: इस किस्म की बालें बुवाई के कितने दिनों में निकलती हैं ?
उत्तर: 99 दिन