गुलदाउदी को जाड़े की रानी भी कहा जाता है। अमेरिका में इसको सामान्यत: ‘ग्लोरी ऑफ़ ईस्ट’ या ‘मम’ भी संक्षिप्त रूप से कहा जाता है।
इसकी उत्पत्ति संभवत: चीन के अंदर मानी जाती है। यह बेहद विस्तृत रूप से बगीचे में उगाई जाती है और भारत में व्यावसायिक रूप से कृषि की जाने वाले पाँच फूलों में से एक होती है।
गुलदाउदी की प्रमुख खूबियों में मुख्यत: इसका इस्तेमाल माला बनाने के लिए, खुले फूलों के लिए, वेनी में लगाने, गुलदस्तों में सजाने एवं प्रदर्शनी के लिए तथा बगीचा सजाने में काफी बड़े पैमाने पर किया जाता है।
अपनी इन्हीं सभी खूबियों की वजह से गुलदाउदी को जापान में राजशाही का प्रतीक आज भी माना जाता है।
यह मुख्यत: तीन प्रकार की होती है। पहली जिसमें सबसे बड़ा फूल आता है और सिर्फ एक फूल आता है। दूसरा है छोटी गुलदाउदी। इसमें एक पौधे में कई फूल लगते हैं।
तीसरा है मिनी, इसको बिल्कुल छोटे गमले में लगाकर तैयार किया जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के फूल तैयार किए जाते हैं।
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यह लाल, पीले और सफेद रंगों में मिलती है। इसकी खासियत यह है कि इसे बगैर पिंचिंग किए हुए भी काफी फूल मिलेंगे। i
नेशनल बोटैनिकल रिचर्स इंस्टीट्यूट, लखनऊ द्वारा तैयार प्रजातियां हैं इंडियाना, कुसुम, लिटिल डार्लिंग, मिनी जेसी इत्यादि।
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इच्छुक कृषकों को गुलदाउदी के पौधरोपण की प्रक्रिया के बारे में जानकारी होना अनिवार्य है। गुलदाउदी के पौधे लगाने के लिए गोबर की खाद, कोकोपीट, मौरंग, धान की भूसी को बराबर मात्रा में मिलाकर गमले भर लें।
एक गमले के लिए सौ ग्राम नीम की खली, थोड़ा सा म्यूरेटा पोटाश पर्याप्त रहता है। इसे भी गोबर की खाद वाले मिश्रण में मिला दें। गुलदाउदी के पौधे को इसके माध्यम से काफी प्रचूर मात्रा में पोषण मिलता है।