वीएसटी टिलर्स ट्रैक्टर्स लिमिटेड ने गुजरात के किसानों के लिए अपनी नई FENTM कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर सीरीज लॉन्च कर एक बड़ा कदम उठाया है। इस सीरीज की शुरुआत कंपनी ने गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र से की है, जो खेती और बागवानी के लिए जाना जाता है।
VST पहले से ही भारत में कॉम्पैक्ट कृषि मशीनों के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बना चुकी है और अब इस नई सीरीज के जरिए वह छोटे व मध्यम किसानों की जरूरतों को और बेहतर तरीके से पूरा करना चाहती है। कंपनी का लक्ष्य किसानों को ऐसे ट्रैक्टर उपलब्ध कराना है जो ताकतवर, ईंधन की बचत करने वाले और चलाने में आसान हों। FENTM सीरीज आधुनिक तकनीक और व्यावहारिक डिजाइन का मेल है, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादकता मिल सके।
FENTM ट्रैक्टर सीरीज में कुल पांच मॉडल शामिल किए गए हैं, जिनमें 180 FENTM, 224 FENTM, 225 FENTM, 929 FENTM EX और 929 FENTM VX प्रमुख हैं। ये सभी मॉडल 19 HP से 30 HP की पावर रेंज में उपलब्ध हैं, जो छोटे और मध्यम आकार के खेतों के लिए आदर्श मानी जाती है।
किसानों को इसमें 2WD और 4WD दोनों विकल्प मिलते हैं, ताकि वे अपनी जमीन की बनावट, मिट्टी की स्थिति और खेती के प्रकार के अनुसार सही ट्रैक्टर का चयन कर सकें। इस विविधता के कारण FENTM सीरीज कई प्रकार के कृषि कार्यों जैसे जुताई, बुवाई, छिड़काव और ढुलाई के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
FENTM ट्रैक्टरों को खासतौर पर कॉम्पैक्ट फार्मिंग को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। इनका आकार छोटा और संतुलित रखा गया है, जिससे संकीर्ण खेतों, बागानों, कतार वाली फसलों और सब्जी उत्पादन वाले क्षेत्रों में इन्हें आसानी से चलाया जा सके।
छोटे आकार के बावजूद इनमें पर्याप्त ताकत दी गई है, जिससे ये भारी काम भी कुशलता से कर सकते हैं। इन ट्रैक्टरों में बेहतर कंट्रोल सिस्टम और आरामदायक संचालन की व्यवस्था है, जो किसानों की थकान कम करती है और काम की गति बढ़ाती है। इससे रोजमर्रा के कृषि कार्य कम समय और कम खर्च में पूरे हो पाते हैं।
VST टिलर्स ट्रैक्टर्स के CEO एंटनी चेरुकारा के अनुसार, कंपनी का मुख्य उद्देश्य ऐसे कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर तैयार करना है जो शक्तिशाली होने के साथ-साथ चलाने में सरल हों। उनका कहना है कि FENTM सीरीज किसानों को कम फ्यूल में ज्यादा काम करने की क्षमता देती है, जिससे उनकी उत्पादन लागत कम होती है।
ये ट्रैक्टर लंबे समय तक भरोसेमंद प्रदर्शन देने के लिए बनाए गए हैं और विभिन्न कृषि कार्यों में उपयोगी साबित हो सकते हैं। कंपनी चाहती है कि किसान तकनीक का लाभ उठाकर अपनी आय में बढ़ोतरी करें और खेती को अधिक लाभकारी बना सकें।
FENTM का पूरा अर्थ है “Fuel Efficient and Torque Max”, यानी कम ईंधन में अधिक ताकत। इस सीरीज में लोड सेंसिंग तकनीक का उपयोग किया गया है, जो ट्रैक्टर पर पड़ने वाले काम के दबाव को पहचानती है।
जब काम हल्का होता है, तब इंजन कम डीजल में चलता है और जब काम भारी होता है, तब जरूरत के अनुसार ज्यादा ताकत देता है। इससे न केवल डीजल की बचत होती है, बल्कि इंजन की कार्यक्षमता भी बेहतर बनी रहती है। यह तकनीक किसानों के लिए लागत कम करने और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा देने में सहायक है।
FENTM ट्रैक्टरों का एक बड़ा आकर्षण इनका बेहतर माइलेज और आसान संचालन है। कम ईंधन खपत के कारण किसानों को लंबे समय में बड़ी बचत होती है। साथ ही, इन ट्रैक्टरों में कंट्रोल सिस्टम को सरल और सहज बनाया गया है, जिससे नए किसान भी इन्हें आसानी से चला सकते हैं।
हल्का स्टीयरिंग, आरामदायक सीट और संतुलित डिजाइन इन्हें लंबे समय तक काम करने के लिए सुविधाजनक बनाते हैं। इस कारण ये ट्रैक्टर न केवल कार्यक्षमता बढ़ाते हैं, बल्कि किसानों के शारीरिक श्रम को भी कम करते हैं।
VST की FENTM ट्रैक्टर सीरीज को गुजरात की प्रमुख फसलों जैसे अनार, आम, बाजरा, कपास, मूंगफली, अरंडी, मक्का, गन्ना और विभिन्न सब्जियों की खेती के लिए उपयुक्त बताया गया है। इन ट्रैक्टरों की शक्ति और कॉम्पैक्ट डिजाइन इन्हें बागवानी और कतार वाली फसलों के लिए खास बनाती है।
गुजरात में इस सीरीज की शुरुआत को VST के लिए कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर सेगमेंट में अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे किसानों को आधुनिक, किफायती और भरोसेमंद तकनीक का लाभ मिलेगा।
ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार ने उनकी जरूरत के अनुसार ऋण सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है। यह ऋण आसान और लचीली किस्तों में चुकाने योग्य होगा, जिससे महिलाओं पर किसी प्रकार का आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। इस पहल का मुख्य उद्देश्य यह है कि महिलाएं बिना किसी डर या दबाव के अपने छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर सकें। सिलाई-कढ़ाई, डेयरी, मुर्गी पालन, सब्जी उत्पादन, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण जैसे कार्यों के जरिए वे अपनी आमदनी बढ़ा सकेंगी। जब महिलाओं को वित्तीय सहयोग मिलता है, तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह ऋण सुविधा उन्हें सिर्फ रोजगार ही नहीं देगी, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत और निर्णय लेने में सक्षम बनाएगी।
उत्तर प्रदेश सरकार स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को ग्रामीण विकास की रीढ़ के रूप में विकसित कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में इन समूहों को केवल बचत और ऋण तक सीमित न रखकर, उन्हें विकास के एक सशक्त माध्यम के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। स्टार्ट-अप फंड, रिवॉल्विंग फंड और कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड के माध्यम से महिलाओं को पूंजी उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे वे अपने व्यवसाय को शुरू करने और विस्तार देने में सक्षम हो सकें। स्वयं सहायता समूह महिलाओं को संगठित मंच प्रदान करते हैं, जहां वे आपस में अनुभव साझा करती हैं, नई योजनाएं बनाती हैं और एक-दूसरे का सहयोग करती हैं। इससे गांवों में सामूहिक विकास की भावना पैदा होती है और महिलाएं सामाजिक व आर्थिक रूप से अधिक सशक्त बनती हैं।
सरकार की योजना है कि पात्र गृहस्थी राशन कार्डधारक और अंत्योदय कार्डधारकों के करीब दो लाख परिवारों को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा जाए। इसके साथ ही वीबी जिरामजी कार्डधारकों और जीरो पावर्टी अभियान के तहत चिन्हित 6.67 लाख परिवारों की महिलाओं को भी इन समूहों से जोड़ने की प्रक्रिया तेज की जा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समाज का कोई भी कमजोर वर्ग विकास की मुख्यधारा से पीछे न रह जाए। जब अधिक से अधिक परिवार समूहों से जुड़ेंगे, तो उन्हें न केवल वित्तीय सहायता मिलेगी, बल्कि सरकारी योजनाओं की जानकारी और उनका लाभ भी सीधे प्राप्त होगा। यह पहल ग्रामीण समाज में समानता और समावेशी विकास को बढ़ावा देगी।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत महिलाओं को विभिन्न जिम्मेदार भूमिकाएं दी जाएंगी, जैसे समूह सखी, बैंक सखी, ड्रोन सखी और आजीविका सखी। ये भूमिकाएं महिलाओं को न केवल रोजगार के अवसर देंगी, बल्कि उन्हें गांव के विकास कार्यों में सक्रिय भागीदार भी बनाएंगी। बैंक सखी के माध्यम से महिलाएं बैंकिंग सेवाओं को गांव तक पहुंचाएंगी, जिससे वित्तीय लेन-देन आसान होगा। ड्रोन सखी खेती में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देंगी, जबकि आजीविका सखी ग्रामीण परिवारों को स्वरोजगार के नए अवसरों से जोड़ेंगी। इन सभी जिम्मेदारियों से महिलाओं की आमदनी बढ़ेगी और उनका सामाजिक सम्मान भी मजबूत होगा।
योगी सरकार ने महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है। इसका लक्ष्य है कि अधिक से अधिक ग्रामीण महिलाएं इस व्यवस्था का हिस्सा बनें और विकास की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं। गांव-गांव जाकर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएंगे, जिससे महिलाओं को समूहों की उपयोगिता और लाभों की जानकारी दी जा सके। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि वे सामाजिक रूप से भी अधिक जागरूक और सशक्त बनेंगी। यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।
प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों में महिलाओं को समूह से जोड़ने के लिए एक व्यापक मेगा कैंपेन चलाया जाएगा। इस अभियान के माध्यम से हर पंचायत में शिविर लगाकर महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों की जानकारी दी जाएगी और उन्हें इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाएगा। पंचायत स्तर पर इस तरह के प्रयासों से महिलाओं तक सीधी पहुंच बनेगी और योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन संभव होगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में संगठित महिला शक्ति का निर्माण होगा, जो सामाजिक और आर्थिक बदलाव की वाहक बनेगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का स्पष्ट मानना है कि जब महिला सशक्त होती है, तो पूरा परिवार मजबूत बनता है, और जब परिवार मजबूत होता है, तो गांव और प्रदेश अपने आप सशक्त हो जाते हैं। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को सीधे बाजार से जोड़ने की योजना है, ताकि स्थानीय उत्पादों को सही मूल्य मिल सके। इससे किसानों और महिलाओं को अपने परिश्रम का उचित लाभ मिलेगा। यह पहल न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देगी, बल्कि “विकसित उत्तर प्रदेश” के लक्ष्य को भी नई गति प्रदान करेगी। सशक्त महिला, सशक्त परिवार, सशक्त गांव और सशक्त प्रदेश—यही इस पूरी योजना की मूल भावना है।
बकरी पालन (Goat Farming) आज के समय में ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। कम लागत में शुरू होने वाला यह व्यवसाय कम समय में अच्छा मुनाफा देने की क्षमता रखता है। बकरी के दूध और खाद दोनों की बाजार में लगातार मांग बनी रहती है, जिससे यह एक स्थायी और सुरक्षित आय का स्रोत बन जाता है। बहुत से किसान और युवा बकरी पालन को अपनाकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं और अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं। बकरी पालन से किसानों की आय में बढ़ोतरी के साथ-साथ गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं। इन्हीं सभी फायदों को देखते हुए राज्य सरकार ने बकरी एवं भेड़ पालन को प्रोत्साहन देने के लिए एक विशेष योजना शुरू की है, जिसके तहत फार्म खोलने पर भारी सब्सिडी दी जा रही है। आइए जानते हैं इस योजना के उद्देश्य और लाभ के बारे में।
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और पशुपालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बिहार सरकार द्वारा “समेकित बकरी एवं भेड़ विकास योजना” चलाई जा रही है। इस योजना के तहत निजी क्षेत्रों में बकरी व भेड़ पालन फार्म की स्थापना को प्रोत्साहित किया जा रहा है। जो किसान या युवा स्वरोजगार शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए यह योजना एक सुनहरा अवसर है। सरकार ने इस योजना के लिए इस वर्ष कुल 1293.44 लाख रुपये का प्रावधान किया है। योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, पशुपालन क्षेत्र को विकसित करना और बेरोजगार युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। इसके अंतर्गत चयनित लाभार्थियों को सब्सिडी के साथ-साथ प्रशिक्षण की सुविधा भी दी जाती है, जिससे वे वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन कर सकें।
इस योजना के तहत बकरी एवं भेड़ पालन फार्म खोलने के लिए 60 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को इकाई लागत का 50 प्रतिशत अनुदान मिलता है, जबकि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लाभार्थियों को 60 प्रतिशत तक सब्सिडी का लाभ दिया जाता है। राज्य सरकार द्वारा तीन प्रकार के प्रोजेक्ट मॉडल तय किए गए हैं—20 बकरी व 1 बकरा, 40 बकरी व 2 बकरा और 100 बकरी व 5 बकरा। इन सभी मॉडल में लाभार्थियों को बैंक लोन की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है, जिससे वे आसानी से अपना फार्म शुरू कर सकें। सब्सिडी की राशि सीधे लाभार्थी के खाते में भेजी जाती है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है।
यदि कोई व्यक्ति छोटे स्तर पर बकरी पालन शुरू करना चाहता है, तो 20 बकरी और 1 बकरा का फार्म उसके लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है। इस मॉडल की इकाई लागत विभाग द्वारा 2.42 लाख रुपये निर्धारित की गई है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को इस पर 50 प्रतिशत यानी अधिकतम 1.21 लाख रुपये की सब्सिडी मिलेगी। वहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लाभार्थियों को 60 प्रतिशत या अधिकतम 1.45 लाख रुपये तक का अनुदान दिया जाएगा। यह मॉडल उन किसानों और युवाओं के लिए आदर्श है, जो सीमित संसाधनों में स्वरोजगार शुरू करना चाहते हैं और धीरे-धीरे अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
मध्यम स्तर के व्यवसाय के लिए 40 बकरी और 2 बकरा का फार्म एक बेहतर विकल्प माना जाता है। इस फार्म की अनुमानित लागत 5.32 लाख रुपये तय की गई है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को इसमें लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 2.66 लाख रुपये की सब्सिडी दी जाएगी। वहीं SC और ST वर्ग के लाभार्थियों को 60 प्रतिशत या अधिकतम 3.19 लाख रुपये तक का अनुदान मिलेगा। इस मॉडल से अच्छी आय की संभावना होती है और कम समय में निवेश की भरपाई संभव हो जाती है। यह उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो पशुपालन को मुख्य व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं।
बड़े स्तर पर व्यवसाय शुरू करने वालों के लिए 100 बकरी और 5 बकरा का फार्म मॉडल उपलब्ध है। इसकी अनुमानित लागत 13.04 लाख रुपये तय की गई है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को इसमें 50 प्रतिशत या अधिकतम 6.52 लाख रुपये का अनुदान मिलेगा, जबकि SC और ST वर्ग के लाभार्थियों को 60 प्रतिशत या अधिकतम 7.82 लाख रुपये तक की सब्सिडी दी जाएगी। भूमि की बात करें तो 20 बकरी और 1 बकरा के लिए चारा भूमि की अनिवार्यता नहीं है, लेकिन 40 बकरी और 2 बकरा के लिए 50 डिसमिल तथा 100 बकरी और 5 बकरा के लिए 100 डिसमिल भूमि होना जरूरी है। यह भूमि लीज पर भी ली जा सकती है, जिसके लिए 1000 रुपये के नॉन-ज्यूडीशियल स्टांप पर सात वर्षों की लीज अनिवार्य है।
यह योजना बिहार सरकार द्वारा संचालित की जा रही है, इसलिए केवल बिहार राज्य के निवासी ही इसमें आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के लिए आधार कार्ड की फोटो कॉपी, जाति प्रमाण पत्र (SC/ST के लिए), पासपोर्ट साइज फोटो, बैंक खाता विवरण, भूमि या लीज से संबंधित दस्तावेज और प्रशिक्षण प्रमाण पत्र आवश्यक होंगे। इच्छुक लाभार्थी state.bihar.gov.in/abh वेबसाइट पर जाकर आधार या वोटर आईडी से पंजीकरण कर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। सभी दस्तावेजों की स्कैन कॉपी ऑनलाइन अपलोड करनी होगी। एक व्यक्ति केवल एक ही आवेदन कर सकता है और सरकारी सेवा में कार्यरत व्यक्ति का आवेदन मान्य नहीं होगा। लाभार्थियों का चयन “पहले आओ, पहले पाओ” के आधार पर किया जाएगा, जिसमें स्व-लागत से फार्म खोलने और प्रशिक्षण प्राप्त आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी। अधिक जानकारी के लिए संबंधित पशुपालन अधिकारी के कार्यालय से संपर्क किया जा सकता है।
मध्यप्रदेश सरकार किसानों को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रधानमंत्री कुसुम-बी योजना को प्रदेश में “प्रधानमंत्री कृषक मित्र सूर्य योजना” के रूप में लागू किया गया है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों की बिजली पर निर्भरता को समाप्त करना, सिंचाई को आसान बनाना और उन्हें अतिरिक्त आय का अवसर देना है। इसके तहत 52 हजार किसानों के खेतों में सोलर पंप लगाए जाएंगे, जिससे वे न केवल अन्नदाता बल्कि ऊर्जादाता भी बन सकेंगे।
योजना के अंतर्गत अब तक 34,600 लेटर ऑफ अवार्ड जारी किए जा चुके हैं और लगभग 33 हजार कार्यादेश किसानों के खेतों में सोलर पंप स्थापना के लिए दिए जा चुके हैं। सोलर पंप लगने के बाद किसान सिंचाई के लिए बिजली बिल से मुक्त हो जाएंगे। साथ ही वे अपने खेतों में उत्पादित अतिरिक्त सौर ऊर्जा को सरकार को बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त पंप की स्थापना के बाद 5 वर्षों तक रखरखाव की जिम्मेदारी संबंधित कंपनी की होगी, जिससे किसानों को किसी प्रकार की तकनीकी चिंता नहीं रहेगी।
कुसुम-बी योजना के अंतर्गत 1 HP से 7.5 HP तक की क्षमता के सोलर पंप पर लगभग 90% तक अनुदान दिया जाएगा। किसान को कुल लागत का केवल लगभग 10% ही देना होगा। लगभग 60% राशि कृषक ऋण के रूप में होगी, जिसका ब्याज सहित भुगतान राज्य सरकार करेगी। शेष 30% राशि भारत सरकार द्वारा बेंचमार्क लागत के आधार पर अनुदान के रूप में दी जाएगी। यह सब्सिडी व्यवस्था सभी वर्गों SC, ST, OBC और सामान्य वर्ग के किसानों के लिए समान रूप से लागू होगी।
योजना के अंतर्गत 1 HP से लेकर 7.5 HP तक के विभिन्न प्रकार के सोलर पंप उपलब्ध कराए जाएंगे। उदाहरण के तौर पर 1 HP DC सरफेस पंप पर किसान को लगभग ₹12,427 देना होगा, वहीं 3 HP DC सबमर्सिबल (नॉर्मल कंट्रोलर) पंप पर ₹20,968 का अंशदान तय किया गया है। 5 HP DC सबमर्सिबल पंप के लिए किसान अंश ₹30,289 और 7.5 HP DC सबमर्सिबल पंप पर ₹41,537 देना होगा। यदि किसान USPC कंट्रोलर वाला पंप चुनते हैं, तो उनका अंशदान कुछ अधिक रहेगा। इससे किसानों को अपनी आवश्यकता और क्षमता के अनुसार पंप चुनने की सुविधा मिलेगी।
इस योजना का लाभ वही किसान उठा सकते हैं जो मध्यप्रदेश के स्थायी निवासी हों। किसान के पास कम से कम 3 हेक्टेयर भूमि होना अनिवार्य है और पंप की क्षमता 3, 5 या 7.5 HP होनी चाहिए। किसान के पास अस्थाई विद्युत कनेक्शन होना जरूरी है। जिस भूमि पर सोलर पंप लगाया जाएगा, वहां भविष्य में किसी भी प्रकार के विद्युत पंप पर अतिरिक्त अनुदान नहीं मिलेगा। इसके साथ ही किसान को स्व-प्रमाणीकरण देना होगा कि संबंधित खेत पर पहले से कोई विद्युत पंप चालू नहीं है। गलत जानकारी देने पर किसान को योजना से वंचित किया जा सकता है।
सोलर पंप के लिए आवेदन करने हेतु किसान को अस्थाई विद्युत कनेक्शन की रसीद, आधार कार्ड, जमीन के कागजात, बैंक पासबुक, मोबाइल नंबर और पासपोर्ट साइज फोटो की आवश्यकता होगी। आवेदन पूरी तरह ऑनलाइन माध्यम से https://cmsolarpump.mp.gov.in वेबसाइट पर किया जा सकता है। आवेदन के बाद संबंधित विभाग द्वारा खेत का निरीक्षण किया जाएगा। स्वीकृति मिलने पर सोलर पंप स्थापित किया जाएगा और अनुदान की राशि सीधे किसान के बैंक खाते में DBT के माध्यम से भेजी जाएगी।
इस योजना से किसानों को बिजली बिल से मुक्ति मिलेगी, सिंचाई के लिए स्वतंत्रता मिलेगी और अतिरिक्त ऊर्जा बेचकर आय बढ़ाने का अवसर प्राप्त होगा। खेतों में स्वच्छ और स्थायी ऊर्जा प्रणाली उपलब्ध होगी, जिससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। 5 साल तक मुफ्त रखरखाव से किसानों को तकनीकी परेशानियों से राहत मिलेगी। योजना की अधिक जानकारी के लिए किसान मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड की वेबसाइट https://cmsolarpump.mp.gov.in पर विजिट कर सकते हैं या अपने नजदीकी बिजली निगम कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।
सोनालीका ने असंभव भारतीय सफलता के शानदार 30 साल पूरे कर लिए हैं - कैसे पंजाब के छोटे से शहर होशियारपुर के एक रिटायर्ड LIC प्रोफेशनल ने रिटायरमेंट के बाद की 'जीतने का दम' की भावना से सभी परंपराओं को चुनौती दी। दूरदर्शी सोच और अपने दो उत्साही बेटों की आजीवन प्रतिबद्धता द्वारा, उन्होंने 1.1 अरब डॉलर की विश्व स्तर पर सम्मानित ट्रैक्टर कंपनी खड़ी की, जो फॉर्च्यून 500 इंडिया की देश की 500 सबसे बड़ी कंपनियों की सूची में भी शामिल है।
भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जिसे दूरदर्शी लीडर्स का मार्गदर्शन मिला है, जिनकी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता ने उद्योगों को रूपांतरित किया है और भारतीय उत्कृष्टता को वैश्विक मंच पर पहुंचाया है। सोनालीका ट्रैक्टर्स इसी भावना का सशक्त आधुनिक प्रतीक है और ब्रांड किसानों के साथ साझेदारी के 30 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है, जो 'जीतने का दम' के अटूट विश्वास से प्रेरित है।
सोनालीका की तीन दशकों की उल्लेखनीय यात्रा एक असंभव भारतीय सफलता की कहानी है - जिसकी शुरुआत होशियारपुर जैसे छोटे शहर से हुई और यह 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर के वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध ट्रैक्टर बिज़नेस में तब्दील हो गई। आज सोनालीका को भारत की सबसे बड़ी कंपनियों की फॉर्च्यून 500 सूची में भी स्थान प्राप्त है। साथ ही, सोनालीका भारत से ट्रैक्टर एक्सपोर्ट में नंबर 1 ब्रांड, भारत में तीसरा सबसे बड़ा ट्रैक्टर निर्माता और वैश्विक स्तर पर पांचवां सबसे बड़ा ट्रैक्टर ब्रांड है।
सोनालीका की कहानी एक परिवार के नेतृत्व वाली सोच है जो एक सरल लेकिन दमदार विश्वास पर आधारित है। भारतीय किसानों को और अधिक मिलना चाहिए - अधिक ताक़त, अधिक विश्वसनीयता, अधिक सम्मान और भारतीय परिस्थितियों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की गई तकनीक। एल आई सी से रिटायर होने के बाद, जब अधिकांश लोग आराम करना पसंद करते हैं, श्री एल. डी. मित्तल ने आगे बढ़ने का विकल्प चुना। भारत की कृषि क्षमता में उनका दृढ़ विश्वास उनके पुत्रों, डॉ. ए. एस. मित्तल और डॉ. दीपक मित्तल में भी झलकता था। उन्होंने मिलकर सोनालीका की नींव रखी - जो बोर्डरूम से परे, खेतों, कार्यशालाओं और किसानों की वास्तविकताओं के अनुसार बनी। यह यात्रा कृषि इम्प्लीमेंट से शुरू हुई, जहां सोनालीका के थ्रेशर ने भरोसे और प्रदर्शन को नई परिभाषा दी। किसानों ने विश्वास जताया और जल्द ही उसी दमदार ताक़त से निर्मित ट्रैक्टरों की मांग करने लगे।
1996 में, जब ट्रैक्टर उद्योग में एकरूपता का बोलबाला था, तब सोनालीका ने एक अलग राह चुनी। उन्नत आर एंड डी केंद्रों की कमी के बावजूद, कंपनी ने एक साहसिक संकल्प लिया: ट्रैक्टरों को भारत की विविध फसलों, मिट्टी और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाएगा। जहाँ अन्य कंपनियां बाज़ार के लिए ट्रैक्टर बनाती थीं, वहीं सोनालीका किसानों के लिए ट्रैक्टर बनाती रही।
किसान-प्रथम की इस विचारधारा और ऋणमुक्त रहने के दृढ़ निश्चय ने सोनालीका के मूल सिद्धांतों को आकार दिया। मित्तल परिवार का मानना था कि भारतीय किसान एक वर्ग नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों, जलवायु, संस्कृतियों और आकांक्षाओं वाला एक समूह हैं। सोनालीका की इंजीनियरिंग और विश्वसनीयता इतनी सशक्त है कि कंपनी द्वारा 30 वर्ष पूर्व निर्मित पहला ट्रैक्टर आज भी इंजन के पहले ही क्रैंक में आसानी से स्टार्ट हो जाता है - जो अटूट विश्वास का जीता-जागता प्रतीक है।
हैवी-ड्यूटी, अनुकूलित ट्रैक्टरों की बढ़ती मांग के कारण, विक्रेताओं ने कम उत्पादन मात्रा के चलते शुरुआत में संशोधन करने में हिचकिचाहट दिखाई। वाइस चेयरमैन डॉ. ए.एस. मित्तल के नेतृत्व में, सोनालीका ने 2011 से ही इंजन, ट्रांसमिशन, गियरबॉक्स, शीट मेटल और प्रमुख पार्ट्स का आंतरिक निर्माण करके इस चुनौती का समाधान किया।
इस वर्टिकल इंटीग्रेशन ने सोनालीका को उच्च हॉर्स पावर वाले ट्रैक्टरों का निर्माण करने और प्रवेश स्तर के मॉडलों में बड़ा इंजन, पावर स्टीयरिंग, ऑयल-इमर्स्ड ब्रेक और मल्टी-स्पीड ट्रांसमिशन जैसे फीचर को शामिल करने में सक्षम बनाया। ब्रांड ने कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट अनुकूलित ट्रैक्टर लॉन्च किए: जिसमें भारत के दक्षिणी क्षेत्रों के लिए महाबली, महाराष्ट्र के लिए छत्रपति और राजस्थान के लिए महाराजा शामिल है एवं 70 से अधिक कृषि उपकरणों की एक ज़बरदस्त श्रृंखला भी तैयार की।
बढ़ती मांग को देखते हुए, सोनालीका ने अपने होशियारपुर प्लांट की उत्पादन क्षमता को 50,000 ट्रैक्टर से बढ़ाकर 1 लाख ट्रैक्टर प्रति वर्ष कर दिया। लेकिन मित्तल परिवार की परिकल्पना इससे भी कहीं बड़ी थी। 2017 में, सोनालीका ने विश्व के सबसे बड़े पूर्णतः एकीकृत ट्रैक्टर निर्माण प्लांट की स्थापना की, जो रोबोटिक और ऑटोमेटेड, मल्टी-फ्लेक्स असेंबली लाइनों के माध्यम से हर दो मिनट में एक ट्रैक्टर का उत्पादन करने में सक्षम है।
आज, सोनालीका 20-120 एच पी रेंज में 2,000 से अधिक मॉडल विकसित करती है, जो घरेलू और वैश्विक दोनों बाजारों की ज़रूरतों को पूरा करते हैं। कंपनी ने होशियारपुर के आसपास एक समृद्ध एम एस एमई इकोसिस्टम को भी बढ़ावा दिया है, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित हुआ है और एक वैश्विक औद्योगिक केंद्र का निर्माण हुआ है।
सोनालीका का बड़ा डीलर और सर्विस नेटवर्क भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है-जो साझा समृद्धि, क्षमता विकास और बिक्री के बाद उत्कृष्ट सेवा पर आधारित है तथा खरीद से लेकर लाइफसाइकिल सेवा तक किसानों को निर्बाध सहायता सुनिश्चित करता है।
मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. दीपक मित्तल के नेतृत्व में, सोनालीका की अनुकूलनशीलता की नीति ने वैश्विक स्तर पर विस्तार किया। कंपनी ने 2004 में अपना पहला ट्रैक्टर निर्यात किया, 2011 में यूरोप को ट्रैक्टर निर्यात करने वाला पहला भारतीय ब्रांड बना और एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य देशों में लगातार विस्तार किया।
वित्त वर्ष 2019 में, सोनालीका भारत से ट्रैक्टर एक्सपोर्ट में नंबर 1 ब्रांड बनकर उभरा, और लगातार सात वर्षों से इस स्थान पर बना हुआ है। आज, 30% की ज़बरदस्त एक्सपोर्ट मार्किट शेयर के साथ, भारत से निर्यात होने वाले प्रत्येक तीसरे ट्रैक्टर का निर्माण सोनालीका के होशियारपुर प्लांट में होता है, जो 150 से अधिक देशों में फैले छह अंतरराष्ट्रीय असेंबली प्लांट को सी के डी किट द्वारा आपूर्ति भी करता है, और 15 से अधिक बाजारों में प्रमुख ब्रांड बना हुआ है।
भारत से ट्रैक्टर एक्सपोर्ट में नंबर 1 ब्रांड के रूप में सोनालीका तरक्की के साथ-साथ,अपने मूल्यों पर हमेशा अडिग रहा है। श्री मित्तल के मूल्यों से प्रेरित होकर, सोनालीका ने भारतीय कृषि में पारदर्शिता के एक नए युग की शुरुआत की। 2022 में अपनी वेबसाइट पर ट्रैक्टर की कीमतें प्रदर्शित करके और 2025 में ट्रैक्टर सर्विस ख़र्च का खुलासा करके, कंपनी भारत में पारदर्शिता का उदाहरण पेश करने वाली पहली ट्रैक्टर कंपनी बनकर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इसने द्वारा कंपनी ने किसानों के बीच अपना विश्वास और मज़बूत किया है।
सोनालीका अपने अगले युग में प्रवेश कर रहा है, और इसके संस्थापकों की समझदारी, मूल्य और विश्वासों से प्रेरित नेतृत्व की एक नई पीढ़ी भविष्य को आकार देने के लिए प्रतिबद्ध है। कंपनी अपनी उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 3 लाख ट्रैक्टर प्रति वर्ष करने के लिए तैयार है, जिससे सोनालीका एकीकृत पैमाने पर उत्पादन करने वाले चुनिंदा वैश्विक निर्माताओं में से एक बन जाएगी।
उत्पादों के अलावा, सोनालीका डिजिटल प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड डायग्नोस्टिक्स और व्यक्तिगत खुदरा सहभागिता के माध्यम से किसानों के अनुभव को बदल रही है - हर संपर्क बिंदु पर एक निर्बाध समाधान इकोसिस्टम का निर्माण कर रही है।
मजबूत नेतृत्व, संस्थागत अखंडता और किसान-प्रथम सोच के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के साथ, सोनालीका के अगले 30 वर्ष वैश्विक नेतृत्व, तकनीकी उन्नति और दुनिया भर के किसानों को 'जीतने का दम' पहुंचाने की निरंतर विरासत का वादा करते हैं।
1996 में स्थापित, सोनालीका ट्रैक्टर्स भारत से ट्रैक्टर एक्सपोर्ट में नंबर 1 ब्रांड और देश के अग्रणी प्रमुख ट्रैक्टर ब्रांडों में से एक है। 'जीतने का दम' से प्रेरित होकर, सोनालीका ने पंजाब के होशियारपुर से इम्पॉसिबल इंडियन सक्सेस स्टोरी का रूप धारण किया है, जिसे वैश्विक स्तर पर सम्मान प्राप्त है और 150 से अधिक देशों में इसकी उपस्थिति है। सोनालीका विश्व के सबसे बड़े एकीकृत ट्रैक्टर प्लांट का संचालन करता है, जो विभिन्न कृषि कामों और परिस्थितियों के लिए डिज़ाइन किए गए उच्च-प्रदर्शन वाले ट्रैक्टरों का उत्पादन करता है।
सोनालीका भारत की शीर्ष 500 कंपनियों में से एक है और इसे मैन्युफैक्चरिंग उत्कृष्टता, तकनीकी नेतृत्व और किसान-प्रथम दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। यह ब्रांड ट्रैक्टर उद्योग में किसानों के लिए मूल्य पारदर्शिता लाने में प्रमुख है, जिसके तहत इसके द्वारा ट्रैक्टर की कीमतों और सर्विस ख़र्च को सार्वजनिक रूप से अपनी वेबसाइट पर घोषित किया गया है। सोनालीका 2026 में किसानों को सशक्त बनाने, ग्रामीण समृद्धि को मज़बूत करने और वैश्विक कृषि मशीनीकरण क्षेत्र में भारत के नेतृत्व को बढ़ाने के 30 गौरवशाली वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है।
साल 2026 की शुरुआत के साथ ही देशभर के किसानों, खासकर बिहार के किसान बहन-भाइयों को पीएम किसान सम्मान निधि की 22वीं किस्त का बेसब्री से इंतजार है। इस योजना के तहत पात्र किसानों के खाते में 2000 रुपये की राशि सीधे डीबीटी के माध्यम से भेजी जाती है।
लेकिन इस बार किस्त पाने के लिए एक जरूरी शर्त जोड़ दी गई है, और वह है फार्मर आईडी का होना। अगर किसी किसान ने समय रहते अपनी फार्मर आईडी नहीं बनवाई, तो उसके खाते में पीएम किसान सम्मान निधि की 22वीं किस्त का पैसा नहीं आएगा।
बिहार में उम्मीद है कि फरवरी माह में 22वीं किस्त जारी की जाएगी, लेकिन उससे पहले सभी किसानों को अपना फार्मर रजिस्ट्रेशन पूरा करना होगा। सरकार का साफ निर्देश है कि फार्मर आईडी के बिना न केवल पीएम किसान योजना, बल्कि राज्य सरकार की अन्य कृषि योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाएगा।
इसलिए किसानों के लिए यह बेहद जरूरी हो गया है कि वे इस काम को प्राथमिकता पर पूरा करें और किसी भी तरह की लापरवाही न करें।
बिहार सरकार ने किसानों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए फार्मर आईडी बनवाने के लिए विशेष कैंप लगाने का फैसला किया है। ये कैंप 6 जनवरी से 9 जनवरी तक आयोजित किए गए हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान आसानी से अपनी आईडी बनवा सकें। इन कैंपों में जाकर किसान सीधे आवेदन कर सकते हैं और वहीं पर उनका फार्मर रजिस्ट्रेशन पूरा किया जाएगा।
सरकार और कृषि विभाग की कोशिश है कि पंचायत स्तर पर ही यह सुविधा उपलब्ध हो जाए, जिससे किसानों को दूर-दराज के दफ्तरों में जाने की परेशानी न हो। किसान अपने नजदीकी किसान सलाहकार, कृषि समन्वयक या हल्का कर्मचारी से संपर्क करके कैंप की सही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
प्रशासन ने किसानों से अपील की है कि वे इन तिथियों का पूरा लाभ उठाएं और समय रहते अपना रजिस्ट्रेशन करवा लें, ताकि फरवरी में आने वाली 22वीं किस्त में किसी भी तरह की बाधा न आए।
फार्मर आईडी केवल पीएम किसान सम्मान निधि योजना के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि यह किसानों के लिए एक स्थायी पहचान पत्र के रूप में काम करेगी। इसके जरिए किसान केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे कर्पूरी ठाकुर किसान सम्मान निधि, फसल बीमा योजना, सब्सिडी आधारित योजनाएं और अन्य कृषि कल्याण कार्यक्रमों का लाभ आसानी से ले सकेंगे।
बिना फार्मर आईडी के किसान सरकारी योजनाओं से वंचित रह सकते हैं। यही वजह है कि सरकार इसे एक अनिवार्य दस्तावेज के रूप में लागू कर रही है। साथ ही हर पंचायत में विशेष अभियान के तहत कैंप लगाए जा रहे हैं, ताकि कोई भी किसान इस प्रक्रिया से बाहर न रह जाए।
फार्मर आईडी से सरकार को भी किसानों का सही और सटीक डाटा मिलेगा, जिससे योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू किया जा सकेगा और फर्जीवाड़े पर भी रोक लगेगी।
फार्मर आईडी बनवाने के लिए किसानों को कुछ जरूरी दस्तावेज अपने साथ ले जाने होंगे। इनमें आधार कार्ड, आधार से लिंक मोबाइल नंबर, जमीन से संबंधित दस्तावेज और ऑनलाइन जमाबंदी का प्रमाणपत्र शामिल है, जो किसान के नाम पर पंजीकृत होना चाहिए।
इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर फार्मर रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। बिहार एग्रीस्टैक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्य में अभी तक केवल 6.81% किसानों ने ही फार्मर रजिस्ट्रेशन कराया है। bhfr.agristack.gov.in की रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक लगभग 4 लाख 14 हजार किसानों ने ही अपनी फार्मर आईडी बनवाई है। यह आंकड़ा बेहद कम है, जबकि बिहार में किसानों की संख्या करोड़ों में है।
अगर बाकी किसान समय रहते रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं, तो उन्हें न केवल पीएम किसान की 22वीं किस्त, बल्कि राज्य सरकार की कई अन्य योजनाओं का लाभ लेने में भी परेशानी हो सकती है।
जो किसान कैंप में नहीं जा सकते, उनके लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी दी गई है। इसके लिए उन्हें अपने नजदीकी CSC (कॉमन सर्विस सेंटर) में जाकर फार्मर आईडी के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना होगा। CSC लॉगिन के माध्यम से पूरी प्रक्रिया आसानी से पूरी की जा सकती है।
इसके अलावा, अगर किसी किसान को यह पता करना हो कि उसकी फार्मर आईडी बनी है या नहीं, तो वह Bihar Agristack की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर अपना स्टेटस चेक कर सकता है। इसके लिए केवल आधार नंबर या रजिस्ट्रेशन नंबर डालना होगा और पूरी जानकारी स्क्रीन पर आ जाएगी।
यह सुविधा किसानों के लिए बेहद फायदेमंद है, क्योंकि अब उन्हें बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कुल मिलाकर, फार्मर आईडी बनवाना अब हर किसान के लिए अनिवार्य और बेहद जरूरी हो गया है, ताकि वे समय पर सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें और अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सकें।
किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के उद्देश्य से केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने अपने स्तर से कल्याणकारी कदम उठाती आ रही हैं। इसी कड़ी में राज्य के गन्ना किसानों और छोटे गुड़ उत्पादकों के लिए बिहार सरकार ने बड़ी राहत देने वाले फैसले लिए हैं।
बिहार के गन्ना उद्योग विभाग के अपर मुख्य सचिव के. सेंथिल कुमार ने समीक्षा बैठक में निर्देश दिया कि सभी पात्र किसानों को गन्ना यंत्रीकरण योजना का लाभ सुनिश्चित किया जाए और छोटे गुड़ उत्पादकों को गुड़ प्रोत्साहन योजना से जोड़ा जाए। सरकार का उद्देश्य गन्ना खेती और गुड़ उत्पादन को बढ़ावा देकर किसानों की आय में स्थायी वृद्धि करना है।
बैठक में गन्ना खेती के विस्तार को लेकर ठोस कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया गया। इसके तहत बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा शुरू करने, नई चीनी मिलों की स्थापना और किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने की रणनीति बनाई जाएगी। सरकार का मानना है, कि इन कदमों से राज्य में गन्ना उत्पादन बढ़ेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
गन्ने की बेहतर उपज और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए किसानों को प्रशिक्षण देना भी सरकार की प्राथमिकता है। इसी क्रम में करीब तीन हजार गन्ना किसानों को अन्य राज्यों में प्रशिक्षण के लिए भेजा जाएगा, जहां वे प्रगतिशील किसानों से गन्ना और गुड़ के मूल्य संवर्धन की आधुनिक तकनीकें सीखेंगे।
इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के बाद विभाग को सामूहिक रिपोर्ट सौंपी जाएगी, ताकि अन्य राज्यों की उन्नत तकनीकों को बिहार में लागू किया जा सके।
किसानों को सब्सिडी, फसल बीमा और समय पर मुआवजा देने पर भी विशेष जोर दिया गया है। राज्य में गन्ना महोत्सव आयोजित कर किसानों को नई किस्मों, आधुनिक यंत्रों और उन्नत खेती तकनीकों की जानकारी दी जाएगी।
वहीं, सकरी और रैयाम की बंद चीनी मिलों को सहकारिता मॉडल के तहत फिर से शुरू करने की तैयारी भी चल रही है, जिससे किसानों को सीधा लाभ और रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। इन फैसलों से बिहार के गन्ना किसानों और गुड़ उत्पादकों में नई उम्मीद जगी है।
हरियाणा सरकार ने महिला सशक्तिकरण को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से दीन दयाल लाडो लक्ष्मी योजना का दायरा बढ़ाने का अहम फैसला लिया है। इस विस्तार के तहत योजना में तीन नई श्रेणियां जोड़ी गई हैं, जिससे प्रदेश की एक लाख से अधिक नई महिलाएं इससे जुड़ सकेंगी। योजना के अंतर्गत पात्र महिलाओं को हर महीने 2100 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। सरकार का मानना है, कि इस कदम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी और उनके परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएगा। यह फैसला खास तौर पर महिलाओं की भागीदारी को शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जोड़ने के लिए किया गया है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है, कि जो महिलाएं पहले से लाडो लक्ष्मी योजना का लाभ ले रही हैं, उनके लिए किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है। वे पहले की तरह हर महीने 2100 रुपये की सहायता प्राप्त करती रहेंगी और उनका लाभ किसी भी स्थिति में बंद नहीं होगा। जिन महिलाओं की पारिवारिक वार्षिक आय 1 लाख रुपये तक थी, वे पहले की तरह योजना के अंतर्गत लाभार्थी बनी रहेंगी। इस घोषणा से मौजूदा लाभार्थियों को पूरी तरह राहत मिली है और उनके मन में किसी भी प्रकार की असमंजस की स्थिति नहीं रहेगी।
योजना के विस्तार के तहत सरकार ने आय सीमा बढ़ाकर 1 लाख 80 हजार रुपये कर दी है और इसके साथ तीन नई श्रेणियां जोड़ी हैं। इन श्रेणियों में अधिकतम तीन बच्चों तक ही योजना का लाभ मान्य होगा। पहली श्रेणी में ऐसे परिवार शामिल हैं जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और 10वीं या 12वीं कक्षा में 80 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त करते हैं। दूसरी श्रेणी निपुण मिशन से जुड़ी है, जिसमें कक्षा 1 से 4 तक ग्रेड लेवल प्रोफिशिएंसी हासिल करने वाले बच्चों की माताओं को योजना का लाभ मिलेगा। तीसरी श्रेणी बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य से संबंधित है, जिसमें कुपोषण या एनीमिया से बाहर आकर ग्रीन जोन में पहुंचे बच्चों की माताओं को सहायता दी जाएगी।
सरकार ने योजना को और प्रभावी और दूरदर्शी बनाने के लिए आर्थिक सहायता के साथ सुरक्षित बचत की व्यवस्था भी शुरू की है। अब मिलने वाली 2100 रुपये की राशि को दो हिस्सों में बांटा जाएगा, जिसमें 1100 रुपये सीधे लाभार्थी महिला के बैंक खाते में जमा होंगे, जबकि 1000 रुपये राज्य सरकार की ओर से फिक्स्ड डिपॉजिट या रिकरिंग डिपॉजिट के रूप में सुरक्षित रखे जाएंगे। यह राशि ब्याज सहित महिला को मिलेगी और यदि किसी कारणवश महिला की असमय मृत्यु हो जाती है, तो यह पूरी जमा राशि उसके नामित व्यक्ति को तुरंत प्रदान की जाएगी। इससे महिलाओं को भविष्य के लिए आर्थिक सुरक्षा भी मिलेगी।
कुल मिलाकर, लाडो लक्ष्मी योजना में किया गया यह विस्तार हरियाणा में महिला सशक्तिकरण को मजबूत आधार प्रदान करता है। यह योजना न केवल महिलाओं को तात्कालिक आर्थिक सहायता देती है, बल्कि उन्हें शिक्षा, बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए भी प्रेरित करती है। सुरक्षित बचत की व्यवस्था के साथ यह पहल महिलाओं के भविष्य को अधिक सुरक्षित बनाती है और परिवारों की समग्र स्थिति को बेहतर करने में सहायक साबित होगी। इस तरह यह योजना हरियाणा की महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत और सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
नया साल 2026 किसानों के लिए बड़ी राहत और नई उम्मीदें लेकर आ सकता है। MSP, किसान सम्मान निधि, फसल बीमा, डिजिटल किसान कार्ड, सस्ती बिजली और बीज कानून जैसे फैसलों से खेती को मजबूती मिलने की संभावना है।
केंद्र सरकार किसानों की आय बढ़ाने और खेती-किसानी को सुरक्षित बनाने के लिए अहम नीतिगत सुधारों पर काम कर रही है। महंगाई, बढ़ती खेती लागत और मौसम के जोखिम को देखते हुए सरकार का फोकस सीधी आर्थिक मदद और तकनीकी समाधान पर है। अगर ये प्रस्तावित योजनाएं समय पर लागू होती हैं, तो 2026 किसानों की जिंदगी में बड़ा सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
इस साल केंद्र सरकार पीएम किसान सम्मान निधि योजना के तहत मिलने वाली राशि बढ़ाने पर विचार कर सकती है। फिलहाल किसानों को सालाना ₹6,000 की सहायता दी जाती है, लेकिन 2026 के बजट में इसे बढ़ाकर ₹8,000 से ₹10,000 किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
बढ़ती खेती लागत, खाद, बीज और डीजल के बढ़ते खर्च को देखते हुए यह प्रस्ताव पारित हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो इससे खासतौर पर छोटे और सीमांत किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा और उनकी खेती से जुड़ी जरूरतों में राहत मिलेगी।
2026 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था को और अधिक मजबूत किए जाने की संभावना है, जिससे किसानों को उनकी फसलों का बेहतर मूल्य मिल सके। सरकार गेहूं और धान की गारंटीड खरीद बढ़ा सकती है, जबकि दालों की सरकारी खरीद के दायरे को भी विस्तार देने की उम्मीद है। इसके साथ ही तिलहनों पर MSP समर्थन को और सख्त किया जा सकता है, ताकि बाजार में कीमत गिरने की स्थिति में किसानों को नुकसान से बचाया जा सके। इन उपायों से फसल बेचते समय किसानों को अधिक सुरक्षा और बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ेगी।
2026 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में बड़े सुधार किए जाने की संभावना है, जिससे किसानों को समय पर राहत मिल सके। बीमा क्लेम सेटलमेंट प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है ताकि किसानों को भुगतान के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।
इससे बाढ़, सूखा और ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं में नुकसान की भरपाई जल्दी हो सकेगी। नुकसान का आकलन डिजिटल तकनीक के जरिए किया जाएगा, जिससे क्लेम भुगतान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनेगी। इसके साथ ही मौसम आधारित बीमा मॉडल को और मजबूत करने पर भी जोर दिया जाएगा, ताकि किसानों को बेहतर सुरक्षा मिल सके।
खेती सुधारों के तहत नया बीज कानून लाए जाने की संभावना है, जिसका उद्देश्य किसानों को नकली बीज और खाद से होने वाले नुकसान से बचाना होगा। सरकार नकली बीज और नकली खाद की बिक्री पर सख्त कार्रवाई की तैयारी कर सकती है, जिससे बाजार में गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत होगा। इसके चलते किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध होंगे, जिससे फसल उत्पादन बढ़ने की उम्मीद बनेगी और खेती में होने वाला आर्थिक नुकसान भी कम होगा।
सरकार का फोकस किसानों की सिंचाई लागत घटाने पर है और इसके लिए फ्री या सस्ती बिजली योजनाओं के दायरे को बढ़ाया जा सकता है। “हर खेत को पानी” लक्ष्य को तेजी से आगे बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा, जिससे सिंचाई सुविधाओं में सुधार होगा। इसके साथ ही ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा, जिससे पानी की बचत के साथ-साथ कृषि उत्पादन में भी वृद्धि होने की संभावना है।
2026 में किसानों को डिजिटल किसान कार्ड मिलने की उम्मीद है, जिसमें जमीन और फसल से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ एक ही कार्ड में उपलब्ध होंगी। इस कार्ड के जरिए बीमा और सब्सिडी से संबंधित विवरण डिजिटल रूप में मिलेगा, जिससे सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे किसानों तक पहुँच सकेगा। इसके परिणामस्वरूप बिचौलियों की भूमिका काफी हद तक कम होगी और व्यवस्था अधिक पारदर्शी व प्रभावी बनेगी।
सरकार दलहन आत्मनिर्भरता मिशन पर अपना फोकस और बढ़ा सकती है, जिसके तहत तुअर, उड़द और मसूर जैसी दालों की 100% MSP पर खरीद संभव मानी जा रही है। इससे किसानों को दालों के बेहतर दाम मिलेंगे और देश की दालों के आयात पर निर्भरता घट सकती है।
2026 किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आ सकता है, क्योंकि इन कदमों से खेती को मजबूती और स्थिरता मिलेगी तथा किसानों की आर्थिक सुरक्षा बढ़ेगी। यह पहल किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है और 2026 को आत्मनिर्भर किसान का साल बनाया जा सकता है।
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस (FADA) के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2025 में ट्रैक्टरों की रिटेल बिक्री बढ़कर 1,15,001 यूनिट पर पहुंच गई, जो दिसंबर 2024 की 99,306 यूनिट की तुलना में 15.80% सालाना वृद्धि (YoY) को दर्शाती है। इस मजबूती के पीछे ग्रामीण क्षेत्रों से आई बेहतर मांग, कृषि गतिविधियों में तेजी और स्थिर फाइनेंसिंग स्थितियों का अहम योगदान रहा। हालांकि, जहां कई OEMsयानी ट्रैक्टर निर्माता कंपनियों ने मजबूत प्रदर्शन किया, वहीं कुछ कंपनियों की बिक्री में आई गिरावट ने ट्रैक्टर बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बदलते रुझानों को भी उजागर किया।
महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के ट्रैक्टर डिवीजन ने दिसंबर 2025 में शानदार प्रदर्शन करते हुए 29,475 यूनिट की रिटेल बिक्री दर्ज की और बाजार में शीर्ष स्थान बनाए रखा। यह आंकड़ा दिसंबर 2024 की तुलना में 21.32% की मजबूत सालाना वृद्धि को दर्शाता है। बेहतर उत्पाद पोर्टफोलियो, व्यापक डीलर नेटवर्क और ग्रामीण मांग में मजबूती के चलते कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 24.46% से बढ़कर 25.63% हो गई, यानी 1.17% का उल्लेखनीय इजाफा हुआ।
स्वराज ब्रांड ने भी दिसंबर 2025 में मजबूत प्रदर्शन जारी रखा और 22,213 यूनिट की बिक्री दर्ज की, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 18,232 यूनिट था। यह 21.84% की सालाना वृद्धि को दर्शाता है, जो किसानों के बीच ब्रांड की मजबूत पकड़ और भरोसे को दिखाता है। इसके साथ ही स्वराज की बाजार हिस्सेदारी 18.36% से बढ़कर 19.32% हो गई, यानी इसमें 0.96% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सोनालीका ने दिसंबर 2025 में 13,933 यूनिट की बिक्री की, जो दिसंबर 2024 की 12,781 यूनिट की तुलना में 9.01% अधिक है। हालांकि बिक्री में वृद्धि के बावजूद कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में हल्की गिरावट देखने को मिली। इसकी हिस्सेदारी 12.87% से घटकर 12.12% रह गई, यानी 0.75% की कमी आई, जो बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अन्य ब्रांड्स के आक्रामक प्रदर्शन की ओर इशारा करती है।
एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड ने दिसंबर 2025 में सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए 13,098 यूनिट की बिक्री दर्ज की, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 9,257 यूनिट था। यह 41.49% की शानदार सालाना वृद्धि को दर्शाता है, जो नए प्रोडक्ट लॉन्च और बेहतर मांग का नतीजा माना जा रहा है। इस मजबूत प्रदर्शन के चलते कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 9.32% से बढ़कर 11.39% हो गई, यानी 2.07% का बड़ा उछाल देखने को मिला।
टैफे लिमिटेड के लिए दिसंबर 2025 अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण रहा। कंपनी ने इस अवधि में 11,483 यूनिट की बिक्री की, जो दिसंबर 2024 की 11,562 यूनिट से 0.68% कम है। बिक्री में मामूली गिरावट के साथ-साथ इसकी बाजार हिस्सेदारी भी 11.64% से घटकर 9.99% रह गई, यानी 1.65% की गिरावट दर्ज की गई, जो प्रतिस्पर्धी दबाव को दर्शाती है।
जॉन डियर इंडिया ने दिसंबर 2025 में मजबूत रिकवरी दिखाते हुए 8,450 यूनिट की बिक्री दर्ज की, जो पिछले साल की 6,321 यूनिट की तुलना में 33.68% अधिक है। कंपनी के बेहतर प्रदर्शन से इसकी बाजार हिस्सेदारी 6.37% से बढ़कर 7.35% हो गई, यानी 0.98% का इजाफा हुआ, जो प्रीमियम और मिड-सेगमेंट ट्रैक्टरों में बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।
आयशर ट्रैक्टर्स की दिसंबर 2025 की बिक्री 6,909 यूनिट रही, जो दिसंबर 2024 की 6,972 यूनिट से 0.90% कम है। बिक्री में मामूली गिरावट के साथ-साथ कंपनी की बाजार हिस्सेदारी भी 7.02% से घटकर 6.01% रह गई, यानी 1.01% की कमी आई। यह संकेत देता है कि ब्रांड को प्रतिस्पर्धी बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए नई रणनीतियों की जरूरत हो सकती है।
न्यू हॉलैंड ने दिसंबर 2025 में सकारात्मक रुझान दिखाते हुए 4,921 यूनिट की बिक्री दर्ज की, जबकि पिछले साल इसी महीने में 4,054 यूनिट बिकी थीं। यह 21.39% की सालाना वृद्धि को दर्शाता है। इस सुधार के साथ कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 4.08% से बढ़कर 4.28% हो गई, यानी 0.20% का सीमित लेकिन स्थिर इजाफा हुआ।
अन्य छोटे और क्षेत्रीय ट्रैक्टर ब्रांड्स ने मिलकर दिसंबर 2025 में 4,519 यूनिट की बिक्री की, जो दिसंबर 2024 की 5,832 यूनिट की तुलना में 22.51% कम है। इन ब्रांड्स की संयुक्त बाजार हिस्सेदारी भी 5.87% से घटकर 3.93% रह गई, यानी 1.94% की तेज गिरावट देखने को मिली। यह रुझान ट्रैक्टर बाजार में कंसॉलिडेशन और बड़े खिलाड़ियों की बढ़ती पकड़ को साफ तौर पर दर्शाता है।
दिसंबर 2025 में ट्रैक्टर रिटेल सेक्टर ने साल-दर-साल आधार पर मजबूती के संकेत दिए। कृषि कार्यों में तेजी, ग्रामीण इलाकों से बेहतर मांग और फाइनेंसिंग माहौल के स्थिर रहने से ट्रैक्टर बिक्री को सहारा मिला। महिंद्रा एंड महिंद्रा, एस्कॉर्ट्स कुबोटा और जॉन डियर जैसे प्रमुख खिलाड़ियों के मजबूत आंकड़ों ने शीर्ष कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा को और तीखा बना दिया है।
वहीं कुछ अन्य OEM कंपनियों के प्रदर्शन में आई गिरावट से यह संकेत मिलता है कि बाजार धीरे-धीरे कंसॉलिडेशन के दौर में प्रवेश कर रहा है। आने वाली तिमाही में ट्रैक्टर बाजार की चाल काफी हद तक फसलों की स्थिति और ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी प्रवाह पर निर्भर रहने वाली है।
महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड भारत की अग्रणी ऑटोमोबाइल और ट्रैक्टर निर्माण कंपनियों में से एक है। कंपनी भारतीय ट्रैक्टर बाजार में कई वर्षों से नंबर-1 पोजीशन बनाए हुए है। महिंद्रा के ट्रैक्टर मजबूत इंजन, बेहतर माइलेज और टिकाऊ बनावट के लिए जाने जाते हैं। यह ब्रांड किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर आधुनिक तकनीक वाले ट्रैक्टर पेश करता है। भारत के साथ-साथ महिंद्रा ट्रैक्टरों की मांग विदेशी बाजारों में भी लगातार बढ़ रही है।
भारतीय ट्रैक्टर उद्योग में महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड ने दिसंबर 2025 में एक बार फिर अपने मजबूत बाजार नेतृत्व को साबित किया है। कंपनी के फार्म इक्विपमेंट बिजनेस (FEB) ने घरेलू और निर्यात—दोनों ही मोर्चों पर बेहतरीन प्रदर्शन किया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार, खेती से जुड़ी गतिविधियों में तेजी और किसानों की बढ़ती मांग का सीधा असर महिंद्रा की ट्रैक्टर बिक्री पर देखने को मिला, जिससे कंपनी ने साल के अंत में मजबूत स्थिति दर्ज की।
दिसंबर 2025 में महिंद्रा ने घरेलू बाजार में 30,210 ट्रैक्टरों की बिक्री की, जो दिसंबर 2024 की तुलना में 37 प्रतिशत की सालाना वृद्धि को दर्शाता है। बेहतर मानसून, खरीफ फसल की अच्छी पैदावार, जलाशयों में पर्याप्त जल स्तर और रबी सीजन के लिए अनुकूल हालात ने किसानों की आय और खरीद क्षमता को मजबूत किया। इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों की कृषि-हितैषी नीतियों, सब्सिडी योजनाओं और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास ने भी ट्रैक्टरों की मांग को बढ़ावा दिया है।
निर्यात बाजार में भी महिंद्रा का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। दिसंबर 2025 में कंपनी ने 1,649 ट्रैक्टरों का निर्यात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 924 यूनिट था, यानी निर्यात में 78 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई। किफायती कीमत, मजबूत डिजाइन और कम मेंटेनेंस लागत के चलते महिंद्रा ट्रैक्टरों की अफ्रीका, एशिया और अन्य उभरते बाजारों में लगातार मांग बनी हुई है, जिससे कंपनी की वैश्विक मौजूदगी और मजबूत हुई है।
घरेलू और निर्यात बिक्री को मिलाकर दिसंबर 2025 में महिंद्रा की कुल ट्रैक्टर बिक्री 31,859 यूनिट रही, जो सालाना आधार पर 39 प्रतिशत की ग्रोथ को दर्शाती है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भी कंपनी का प्रदर्शन मजबूत बना हुआ है, जहां अप्रैल से दिसंबर तक कुल बिक्री में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बेहतर मानसून, ग्रामीण विकास परियोजनाएं और खेती के साथ-साथ गैर-कृषि कार्यों में ट्रैक्टरों के बढ़ते उपयोग से आने वाले महीनों में भी ट्रैक्टर बाजार में सकारात्मक रुझान बने रहने की उम्मीद जताई जा रही है।
दिसंबर 2025 में भारतीय घरेलू ट्रैक्टर उद्योग ने मजबूत थोक बिक्री के साथ साल का समापन किया। इस दौरान कुल 69,890 ट्रैक्टर यूनिट्स की बिक्री दर्ज की गई, जबकि दिसंबर 2024 में यह आंकड़ा 50,986 यूनिट्स था। इस तरह सालाना आधार पर 37.08 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली। ग्रामीण इलाकों में बेहतर मांग, अनुकूल कृषि परिस्थितियां और सरकार की लगातार नीतिगत सहायता ने ट्रैक्टर बाजार को मजबूती प्रदान की।
ब्रांड-वाइज आंकड़ों पर नजर डालें तो महिंद्रा एंड महिंद्रा दिसंबर 2025 में भी बाजार की अगुआ बनी रही। कंपनी ने 30,210 ट्रैक्टर बेचकर 43.23 प्रतिशत मार्केट शेयर हासिल किया। वहीं जॉन डियर इस महीने सबसे तेज बढ़ने वाला ब्रांड रहा, जिसकी बिक्री में 69.26 प्रतिशत की उछाल दर्ज की गई और बाजार हिस्सेदारी बढ़कर 12.57 प्रतिशत हो गई। यह दर्शाता है कि किसान अब वैकल्पिक ब्रांड्स की ओर भी तेजी से रुख कर रहे हैं।
TAFE ग्रुप ने 11,033 यूनिट्स की बिक्री के साथ 33.75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, हालांकि इसका मार्केट शेयर थोड़ा घटा। सोनालिका और एस्कॉर्ट्स कुबोटा (फार्मट्रैक व पावरट्रैक) ने भी अच्छी बिक्री दर्ज की, लेकिन कुल उद्योग वृद्धि के मुकाबले इनके बाजार हिस्से में हल्की गिरावट देखने को मिली। यह संकेत देता है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ बाजार का विस्तार सभी ब्रांड्स में समान रूप से नहीं बंट रहा।
छोटे और मिड-सेगमेंट ब्रांड्स में VST और कैप्टन ट्रैक्टर्स ने मजबूत प्रदर्शन किया। VST ने 59.15 प्रतिशत की ग्रोथ के साथ बाजार हिस्सेदारी बढ़ाई, जबकि कैप्टन ट्रैक्टर्स ने 46.88 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की। प्रीत, इंडो फार्म और न्यू हॉलैंड की बिक्री में भी वृद्धि हुई, लेकिन उनके मार्केट शेयर में दबाव बना रहा।
दिसंबर 2025 में ACE ट्रैक्टर्स ऐसा एकमात्र ब्रांड रहा, जिसकी बिक्री में गिरावट दर्ज की गई। कंपनी की बिक्री 18.26 प्रतिशत घटी और इसका बाजार हिस्सा भी कम हुआ, जो प्रतिस्पर्धी माहौल में ब्रांड के लिए चुनौती का संकेत है।
कुल घरेलू ट्रैक्टर उद्योग के आंकड़े यह साफ दर्शाते हैं कि दिसंबर 2025 में बाजार ने व्यापक और मजबूत वृद्धि दर्ज की। जहां महिंद्रा, जॉन डियर, VST और कैप्टन जैसे ब्रांड्स ने अपनी स्थिति मजबूत की, वहीं कुछ कंपनियों को बिक्री बढ़ने के बावजूद मार्केट शेयर के मोर्चे पर चुनौती झेलनी पड़ी। यह रुझान बताता है कि भारतीय ट्रैक्टर बाजार अब तेजी से प्रतिस्पर्धी और विविध होता जा रहा है।
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